" /> वर्चुअल रैली में अग्निपरीक्षा!, नेताओं का बढ़ा सिरदर्द

वर्चुअल रैली में अग्निपरीक्षा!, नेताओं का बढ़ा सिरदर्द

कोरोना वायरस महामारी के बीच नवंबर में बिहार विधानसभा चुनाव होने जा रहा है। कोविड-१९ संकट के बीच देश में यह पहला चुनाव होगा। इस दौरान चुनाव बूथ पर सामाजिक दूरी के कड़े नियमों का पालन किया जाएगा, वहीं कोरोना के चलते राजनीतिक रैलियों के आयोजन पर पाबंदी लगी है, इसे ध्यान में रखते हुए बिहार में राजनीतिक पार्टियों ने वर्चुअल माध्यम का सहारा लिया है। वो वीडियो कॉन्प्रâेंसिंग के जरिए लोगों को संबोधित करने में जुटी हैं।

हालांकि संबोधन के इस माध्यम की वजह से राजनीतिक पार्टियों के सामने कई चुनौतियां आ खड़ी हुई हैं। इसमें सबसे बड़ी चुनौती राज्य की टेली-डेनसिटी का कम होना, इंटरनेट तक कम पहुंच और संचार के माध्यमों तक लोगों की पहुंच का कम होना है। ये तीनों माध्यम अभियान में संभावित मतदाताओं तक पहुंचने में एक चुनौती हैं और उन तक पहुंचना अप्रत्यक्ष संचार और डिजिटल उपकरणों पर निर्भर करेगा। ये चुनौतियां कोरोना से पहले होनेवाले चुनावों के दौरान पैदा होनेवाली समस्याओं से भी ज्यादा बड़ी हैं।

पहले राजनीतिक पार्टियों को रैलियों के साइज, प्रचार अभियान, डोर-टू-डोर अभियान के लिए सामान और उम्मीदवारों के चयन जैसी चुनौतियों से निपटना होता था लेकिन कोरोना के चलते अब इन्हें नई परेशानियों से निपटना होगा। इन सब चीजों को देखते हुए बिहार में होनेवाले चुनाव किसी परीक्षा से कम नहीं है।

बिहार में टेली-डेनसिटी (किसी दिए गए क्षेत्र में प्रति १०० लोगों पर टेलीफोन कनेक्शन की संख्या) सबसे कम है। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के आंकड़ों के अनुसार बिहार में टेली-डेनसिटी ५९ है जबकि देश में यह संख्या ८९ है।
ट्राई के डाटा के अनुसार बिहार में इंटरनेट की पहुंच २०१९ के अंत तक प्रति १०० लोगों पर ३२ ग्राहक है जबकि देशभर का औसत ५४ है। ये भारत के २२ दूरसंचार सेवा क्षेत्रों में सबसे कम है, वहीं बिहार के ग्रामीण इलाकों में प्रति १०० लोगों पर केवल २२ इंटरनेट ग्राहक हैं। ग्रामीण इलाकों में राज्य की ८९ फीसदी आबादी रहती है। संचार के माध्यमों तक पहुंच के मामले में भी बिहार की स्थिति बहुत दयनीय है। २०१५-१६ में किए गए चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार बिहार में ६१ फीसदी महिलाओं और ३६ फीसदी पुरुषों की जनसंचार माध्यमों तक पहुंच नहीं थी। सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की तुलना में बिहार में जनसंचार माध्यमों की पहुंच नहीं रखनेवाली महिलाओं की संख्या सबसे अधिक है१ जबकि पुरुषों की हिस्सेदारी के मामले में बिहार झारखंड से पीछे है। इन सब चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि बिहार विधानसभा चुनाव राजनीतिक पार्टियों के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। अब ऐसे में देखना होगा कि कौन सी पार्टी इस परीक्षा में सफल होती है और सत्ता की चाबी को अपनी मुट्ठी में करती है।

सीएम नीतीश की रैली को सिर्फ ४.५ हजार लोगों ने ही देखा
बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहली वर्चुअल रैली उतनी सफल नहीं हो पाई, जितनी मानी जा रही थी। दावा किया जा रहा था कि सीएम की वर्चुअल रैली को २६ लाख लोग देखेंगे। हालांकि सीएम की रैली के बाद ये दावे धरे के धरे रह गए। तकनीकी कारणों के चलते इस रैली की लाइव स्ट्रीमिंग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नहीं हो पाई। इस रैली का आयोजन एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर किया गया, जिसमें अधिकतम रियल टाइम ४.५ के (साढ़े चार हजार) लोग ही देखते हुए पाए गए।