…वह सच्चा मुसलमान नहीं हो सकता!

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा का नाम आते ही मन में एक टीस उठती है, दिल भारी हो जाता है, दिमाग सुन्न हो जाता है, क्रोध से रक्त प्रवाह बढ़ जाता है और रगों में दौड़ता लहू खौलने लगता है। ज्ञात हो कि १४ फरवरी को कश्मीर के पुलवामा में आतंकवादियों ने सीआरपीएफ के जवानों पर कायराना हमला कर दिया था जिसमें देश ने अपने ४० से अधिक वीर सपूतों को खो दिया। पुलवामा में सीआरपीएफ जवानों पर हुए कायराना हमले को लेकर देशभर में लोग अपने तरीके से भावनाओं का इजहार कर रहे हैं। सराहनीय बात यह है कि लोगों का हुजूम किसी धर्म से वाबस्ता नहीं है बल्कि एक सुर में शहीदों को श्रद्धांजलि दे रहा है और आतंकवाद की निंदा कर रहा है। इस हमले को लेकर पूरे देश में गम और गुस्से का माहौल है और लोग चाहते हैं कि सरकार इस कायराना हमले के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे। मुस्लिम तबका भी तीखे शब्दों में इस आतंकवादी हमले की निंदा कर रहा है। देश के सुर में सुर मिलाते हुए वह भी पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगा रहा है। हमले के बाद देश के सभी राजनीतिक दलों ने इसकी निंदा की है और सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आतंक के खिलाफ लड़ाई में साथ खड़े होने की बात कही है। इन शहीदों के घर मातम है और दिलों में बदले की आग भी धधक रही है। इस कायराना हमले के बाद से ही पूरा देश सकते में है और जानना चाह रहा है कि आखिर यह क्या, क्यों और वैâसे हुआ?
पुलवामा हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने ली है। जाहिर है इस आतंकी संगठन को पाकिस्तान की पुश्तपनाही प्राप्त है। पुलवामा हमले के बाद मसूद अजहर और पाकिस्तान को लेकर मुस्लिम समाज का गुस्सा भी सामने आ रहा है। उल्लेखनीय है कि पुलवामा के शहीदों के सम्मान में देशभर में जारी विरोध प्रदर्शन और श्रद्धांजलि सभाओं, बैठकों और कार्यक्रमों के बीच मुंबई के संवेदनशील माने जानेवाले भिंडी बाजार में भी व्यापारियों ने विरोधस्वरूप सभी दुकानें बंद रखीं। इसके साथ ही स्थानीय मुस्लिम समाज से जुड़े जिम्मेदारों के साथ आम मुसलमानों ने पूरे इलाके में घूम-घूमकर तिरंगा लहराया और पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाए। यह वही भिंडी बाजार है जहां कभी क्रिकेट मैच में पाकिस्तान की जीत पर पटाखे फोड़े जाते थे। परिस्थितियों और पाकिस्तान की नापाक करतूतों ने यहां के मुसलमानों का जेहन खोल दिया है। धर्म के नाम पर पाकिस्तान का समर्थन करनेवाली आंखों पर लगी पट्टी अब उतर गई है। सिर्फ मुंबई ही क्यों, दिल्ली सहित देशभर के आम और खास आतंकी हमले में शहीद जवानों की शहादत का बदला लेने की मांग करते हुए सड़कों पर उतर रहे हैं। खास बात यह है कि इन प्रदर्शनों में बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं और युवा भी शामिल हो रहे हैं।
मुस्लिम समाज का स्पष्ट मत है कि पुलवामा में हुआ आतंकी हमला यह साबित करने के लिए काफी है कि पाकिस्तान आतंकवादियों का देश है। मुस्लिम समाज शहीदों के परिजनों और देश के साथ है और देश की एकता और अखंडता पर बुरी नजर डालनेवालों को करारा सबक सिखाने की मांग कर रहा है। यहां तक कि उत्तर प्रदेश के बागपत में मुस्लिम समाज के लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सेना में मुस्लिम रेजिमेंट बनाने की मांग भी की है, ताकि मुस्लिम समाज के युवा भी सेना में भर्ती होकर देश के दुश्मन गद्दारों और नापाक पाकिस्तान को सबक सिखा सकें। गुस्सा इस कदर कि इस हमले की तर्ज पर ही उत्तर प्रदेश स्थित चंदौली के कुछ मुस्लिम युवक मानव बम बनने के लिए तैयार हैं। ये युवक सरकार से इस बात की इजाजत चाहते हैं कि वे मानव बम बनकर पाकिस्तान जाएं और वहां आतंकवादियों को मुंहतोड़ जवाब दें। शामली के वैâराना में मुस्लिम युवकों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने खून से चिट्ठी लिखकर सेना में भर्ती करने की मांग की है। विरोध में शामिल लोग एक सुर में सरकार से एक बार फिर सर्जिकल स्ट्राइक की मांग कर रहे हैं। मुस्लिम तबके की तरफ से यह भी आवाज उठी कि जो भी मौलाना मसूद अजहर का सिर कलम करेगा उसे एक करोड़ का इनाम दिया जाएगा।
इतना सबकुछ यूं ही नहीं हो रहा। मुसलमानों की समझ में आने लगा है कि आतंक की राह पर चलकर कश्मीर की क्या स्थिति हो गई है? आतंक की राह पर चलनेवाले मुल्कों का क्या हश्र हुआ है? वह इराक, सीरिया, अफगानिस्तान की स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ है। आतंकवादियों के परिजनों की क्या हालत है? यह भी मुस्लिम समाज से छिपी नहीं है। जिहाद के नाम पर खून खराबा करनेवाले और जन्नत की आस में बेकसूरों का खून बहानेवाले आतंकवादियों की मौत के बाद उनके परिजन दाने-दाने ़को मोहताज हो जाते हैं और ये सिरफिरे न जाने किस जन्नत के ख्वाब देखते हैं? फिदायीन बनते हैं, फिदायीन बनकर हमला करते हैं और फिदायीन हमले में जान गंवाते हैं। फिदायीन हमला दरअसल खुदकश हमला होता है। यह खुदकुशी ही तो है और खुदकुशी तो इस्लाम में हराम है। यह बात तो सही है कि मौत एक अटल हकीकत है, और एक दिन हर जिंदा वजूद को मौत की आगोश में जाना है। लेकिन मुस्लिम समाज से जुड़े आतंकवादियों को यह कब समझेगा कि इस्लाम को तुम अगर अपना सच्चा धर्म मानते हो तो यह भी मानना होगा कि जान लेने का हक सिर्फ अल्लाह को है। उसी ने पैदा किया है और वही मौत देगा। इंसान को सिर्फ जीने का इख्तियार दिया गया है, मौत का नहीं। यही वजह है कि इस्लाम ने खुदकुशी को हराम करार दिया है और उलमा-ए-कराम ने उसे कबीरा गुनाहों में शुमार किया है।
इस्लामी शिक्षा की रोशनी में अगर देखा जाए तो खुदकुशी एक ऐसा गुनाह है जिसको करनेवाला न तो तौबा कर सकता है और न ही उस पर दीन के लिहाज से कोई कार्रवाई की जा सकती है। खुदकुशी करने के बाद वह इस काबिल ही नहीं रहता कि तौबा करके अपना गुनाह माफ करा सके। पवित्र कुरआन में कहा गया है, ‘खुदा की राह में खर्च करो और अपने हाथ जान हलाकत में न डालो और नेकी करो। बेशक खुदा नेकी करनेवालों को दोस्त रखता है।’- (अल-कुरआन २:१९५) यानी खुद की जान को हलाक करने से सीधे तौर पर मना किया गया है, फिर चाहे वैâसी भी स्थिति हो। अनेक हदीसों के हवाले से मुहद्दिसीन और उलेमा ने साबित किया है कि पैगंबर मोहम्मद साहब को खुदकुशी से सख्त नफरत थी और वे इसे नापसंद फरमाते थे। एक हदीस में है कि किसी शख्स ने जख्मों की शिद्दत से बेचैन होकर खुद को तलवार से हलाक कर लिया। पैगंबर मोहम्मद साहब ने इरशाद फरमाया कि वो शख्स जहन्नुमी है और उस पर जन्नत हराम है। तो फिर जैश के आतंकवादी किस इस्लाम की बुनियाद पर जन्नत की ख्वाहिश में खुदकश हमले करते हैं। इसका मतलब है उनका इस्लाम, कुरआन और पैगंबर से कोई वास्ता नहीं है। उनका इस्लाम कुछ और कहता है। बेकसूरों के कत्ल से जन्नत मिलने की ख्वाहिश पर ही समझ जाना चाहिए कि आतंकवादियों का सही इस्लाम की तालीम से कोई वास्ता नहीं है और वे इस्लाम की हदों से बाहर हैं। दरअसल यही लोग इस्लाम के असली दुश्मन हैं। इसलिए जैश, हिज्बुल और ऐसे ही कई आतंकी संगठनों और इस्लामिक हुकूमत के स्वघोषित अलमबरदार पाकिस्तान को इस्लाम से खारिज करने का फतवा निकल जाना चाहिए।
आर्थिक बदहाली से गुजर रहे पाकिस्तान को भी अब समझ जाना चाहिए कि उसके नापाक इरादे कभी अंजाम तक नहीं पहुचेंगे। कश्मीर के आतंकियों को यह बात अब समझ जाना चाहिए कि उनके मंसूबे अब नाकाम हो चुके हैं। पाकिस्तान जिस इस्लाम की बात करता है, उसमें इस तरह के कायराना हमलों के लिए कोई जगह नहीं है। हकीकत यह है कि पाकिस्तान में मुस्लिम समुदाय की हालत बेहद खराब है। हमारे देश का मुस्लिम समुदाय पाकिस्तान से कहीं ज्यादा खुशहाल और संतुष्ट है। उसे अपने वतन से प्यार है। कायराना और बुजदिलाना हमले करवाकर पाकिस्तान मुसलमानों की नजरों से उतरता जा रहा है। सीधी जंग की हिम्मत नहीं तो पीठ पीछे वार कर वह इस्लाम का नाम ही खराब कर रहा है। इस्लाम और जिहाद के नाम पर पाकिस्तान की गोद में बैठे संगठनों को हमारे देश का मुसलमान घृणा की दृष्टि से देखता है और जो ऐसा नहीं करता वह सच्चा मुसलमान नहीं हो सकता।