" /> वाराणसी में जोरशोर से हुई ललही छठ की पूजा

वाराणसी में जोरशोर से हुई ललही छठ की पूजा

भगवान श्रीकृष्ण के अग्रज बलदाऊ जी का हलषष्ठी के रूप में मना जन्मोत्सव,
महिलाओ ने व्रत रख पुत्र के लंबी आयु व सुख समृद्धि की कामना की

सात वार और नौ त्योहार वाली काशी कोरोना काल के बाद भी रविवार को ललही छठ पूजा पूरे श्रद्धा भाव के साथ मनाया गया। प्रकृति और पर्यावरण पर आधारित ललही छठ पर काशी के कुंड और तालाब पर प्रातःकाल से ही महिलाएं इकट्ठा हो गयी थी। महिलाओं ने पुत्रों की लंबी उम्र, सुख, सौभाग्य के साथ ही अचल सुहाग की कामना से व्रत रखा और हलषष्ठी माता का पूजन किया। इस दौरान इन महिलाओं ने सोशल डिस्टेंस का पूरा ध्यान रखा और अपने परिवार की महिलाओं के साथ ही इस पूजा पाठ को निपटाया। पूजन-अर्चन के बाद महिलाओं ने तिन्नी के चावल और दही का प्रसाद ग्रहण किया।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्री कृष्ण के जन्म से दो दिन पूर्व भाद्रपद के कृष्णपक्ष की षष्ठी को उनके भाई बलराम जी का जन्म हुआ था। इसलिए इस दिन भी व्रत और पूजा करने की परंपरा है। हलषष्ठी का व्रत विशेषकर पुत्रवती महिलाएं करती हैं। यह पर्व हलषष्ठी, हलछठ , हरछठ व्रत, चंदन छठ, तिनछठी, तिन्नी छठ, ललही छठ, कमर छठ, या खमर छठ के नामों से भी जाना जाता है। यह व्रत महिलाएं अपने पुत्र की दीर्घायु और उनकी सम्पन्नता के लिए करती हैं। इस दिन विशेष रूप से हल की पूजा की जाती है।

रविवार को सुबह महिलाएं सिर पर पूजा की थाली रखकर आसपास के कुंडों व तालाब पर पहुंची। थाली में सजे हुए महुए के पत्ते, दूध, गंगाजल, फल, मिष्ठान्न, नारियल, दही को पूजन के लिए रखा गया था। कुंडों पर महिलाओं ने गोबर से स्थान को लीपकर छोटे तालाब की आकृति उकेरी। उस पर फूल, गूलर, कुश और साफा बांधकर तैयार किया। इसके उपरांत ललही महारानी का पूजन किया गया। माता को भुना हुआ चना, गेहूं, धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, जौ चढ़ाया गया। सुहागिन महिलाओं ने हल्दी से रंगा हुआ वस्त्र व सुहाग की सामग्री अर्पित की। कुश और महुआ के पत्ते का पूजन कर इस पर महुआ, तिन्नी के चावल, गुड़ और दही का प्रसाद महिलाओं ने पुत्र की लंबी उम्र की कामना के साथ वितरित किया। महिलाओं ने पुत्रों की दीर्घायु के साथ ही अचल सुहाग की कामना की। इसके उपरांत दोपहर बाद महिलाओं ने तिन्नी के चावल और दही को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया।