" /> वाह-रे-जिंदगी

वाह-रे-जिंदगी

कहां रही अब वो तन्मयता,
किसी का वृतांत सुनने की।
कहां गए वो हर्ष उल्लास?
किसी के सम्मान में बुनने की।।
नहीं सजती कोई शोक सभा,
अब अपनों से दूर होने की।
सिद्धांतों के जो कायल थे,
वो दफ्न दफ्न हो गए कहीं पे।।
दिन-प्रतिदिन मरती हूवी
संजिदिगियों में,
महज माटी के पुतले हैं हम।
अब तो खुद से खुद का,
रह गया न नाता कोई।।
रह चीज की देखो यहां,
बदली हूई परिभाषा है।
सफलता का मापदंड,
रुपयों में गिना जाता है।।
रिश्ते की बागडोर को चंद,
कागज के टुकड़ों ने संभाला है।
कैद रखा तिजोरी में लक्ष्मी जी
को उसी का बोलबाला है।।
-नताशा गिरि ‘शिखा’, मुंबई