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विजय दिलाता है रक्षाबंधन!

सोमवार- रक्षाबंधन पर्व
श्रावण मास शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि को रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है। आज के दिन भद्रा को त्याग देना चाहिए। भद्राकाल में बहनों को अपने भाइयों की कलाई पर राखी नहीं बांधना चाहिए। भद्रा दिन में ८:२८ तक है। इसके बाद ही बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षासूत्र बांध सकती हैं। शास्त्रसम्मत है कि भद्रा में श्रावणी और फाल्गुनी दोनों वर्जित है क्योंकि श्रावणी से राजा का और फाल्गुनी से प्रजा का अनिष्ट होता है। व्रत करनेवालों को चाहिए कि आज के दिन प्रातः सविधि स्नान करके देवता, पितर और ऋषियों का तर्पण करें। दोपहर के बाद ऊनी, सूती या रेशमी पीतवस्त्र लेकर उसमें सरसों, स्वर्ण, केसर, चंदन, अक्षत और दुर्वा रखकर बांध लें। फिर गोबर से लिपे स्थान पर कलश स्थापना करके उस पर रक्षासूत्र रखकर उसका यथाविधि पूजन करें, उसके बाद विद्वान ब्राह्मण से रक्षा सूत्र को दाहिने हाथ में बंधवा लेना चाहिए। इससे आयु की वृद्धि होती है। रक्षाबंधन के संदर्भ में एक कथा प्रचलित है जो इस प्रकार है –
प्राचीन काल में एक बार १२ वर्षों तक देवासुर संग्राम होता रहा, जिसमें देवताओं का पराभव हुआ और असुरों ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। दुखी, पराजित और चिंतित इंद्रदेव देवगुरु बृहस्पति के पास गए और उनसे कहने लगे कि इस समय न तो मैं यहां सुरक्षित हूं और न ही स्वर्ग में सुरक्षित हूं। ऐसी दशा में मेरा युद्ध करना ही अनिवार्य है जबकि अब तक युद्ध में हमारा पराभव ही हुआ है। इस वार्तालाप को इंद्राणी भी सुन रही थी। उन्होंने कहा कि कल श्रावण शुक्ल पूर्णिमा है। मैं विधानपूर्वक रक्षासूत्र तैयार करूंगी, उसे आप स्वस्तिवाचनपूर्वक ब्राह्मणों से बंधवा लीजिएगा इससे आप अवश्य विजयी होंगे। दूसरे दिन इंद्र ने रक्षाविधान और स्वस्तिवाचनपूर्वक रक्षासूत्र बंधवा लिया। जिसके प्रभाव से उनकी विजय हो गई। तब से यह पर्व मनाया जाने लगा है। बहने आज के दिन अपने भाइयों की कलाई में भी रक्षासूत्र (राखी) बांधती हैं और भाइयों के दीर्घायु की कामना भी करती हैं।
श्रावणी कर्म – श्रावण मास शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि श्रावणी कर्म का प्रसिद्ध काल माना गया है। पूर्णिमा यदि पहले दिन सूर्योदय से दो घड़ी बाद आरंभ हो और दूसरे दिन दो घड़ी बाद या उससे अधिक समय तक हो तो यह कर्म दूसरे दिन ही करना चाहिए। श्रावणी विशेषकर ब्राह्मणों अथवा पंडितों का पर्व है। वेद पारायण के शुभारंभ को उपाकर्म कहते हैं। इस दिन यज्ञोपवीत के पूजन का भी विधान है। ऋषि पूजन तथा पुराने यज्ञोपवीत को उतारकर नूतन यज्ञोपवीत धारण करना पर्व का विशेष कृत्य है। प्राचीन समय में यह कर्म गुरु अपने शिष्यों के साथ किया करते थे। यह उसी के वेद अध्ययन का और आश्रमों की उस पवित्र जीवन का स्मारक है। अतः इसकी रक्षा ही नहीं अपितु इसे यथार्थ रूप में मानना हमारा परम धर्म होना चाहिए। इस कर्म में सर्वप्रथम तीर्थ को प्रार्थना के अनंतर वर्षभर जाने अनजाने में हुए पापों के निराकरण के लिए ‘हिमाद्रिस्नानसंकल्प’ करके दशविध स्नान करने का विधान है। इसके अनंतर ऋषिपूजन, नूतन यज्ञोपवीत धारण करने की विधि है।

सोमवार ३ अगस्त- श्रावण मास शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि रात्रि ८:२० तक, रक्षाबंधन, श्रावणी कर्म, भद्रा दिन में ८:२८ तक।
मंगलवार ४ अगस्त- भाद्रपद मास कृष्णपक्ष की प्रतिपदा तिथि रात्रि ८:३६ तक।
बुधवार ५ अगस्त- भाद्रपद मास कृष्णपक्ष की द्वितीया तिथि रात्रि ९:२४ तक, कजली ( रतजगा )।
बृहस्पतिवार ६ अगस्त- भाद्रपद मास कृष्णपक्ष की तृतीया तिथि रात्रि १०:३८ तक, कजली ३, गोपूजा ३, विशालाक्षी यात्रा, भद्रा दिन में १०:०१ से रात्रि १०:३८ तक।
शुक्रवार ७ अगस्त- भाद्रपद मास कृष्णपक्ष की चतुर्थी की रात्रि १२:१७ तक, संकष्टी (बहुला) श्री गणेश चतुर्थी व्रत।
शनिवार ८ अगस्त- भाद्रपद मास कृष्णपक्ष की पंचमी तिथि रात्रि २:११ तक, रक्षापंचमी (ओडीशा), श्री माधवदेव तिथि (असम)।
रविवार ९ अगस्त- भाद्रपद मास कृष्णपक्ष की षष्ठी तिथि रात्रि ४:१४ तक, ललहीछठ, भद्रा रात्रि ४:१४ से प्रारंभ।