विपक्ष है सन्न!

हिंदुस्थान में महाभारत हो गया। ताजा चुनाव महाभारत ही था लेकिन पीछले चुनावों से भिन्न था। महाभारत का युद्ध भी प्राचीन इतिहास से भिन्न था। महाभारत में भी मर्यादा का चीरहरण हुआ था। इस चुनाव में भी संवैधानिक संस्थाओं का चीरहरण शीलहरण हुआ। प्रधानमंत्री हिंदुस्थानी राष्ट्र राज्य का प्रधान सेवक होता है। नरेंद्र मोदी को इसी देश की जनता ने संविधान के अनुरूप जनादेश दिया था लेकिन विपक्षी राजनेताओं ने प्रधानमंत्री को चोर कहा। प्रधानमंत्री के पद, प्राधिकार व जनादेश का अपमान किया। व्यक्तिगत आरोप लगाए। हिंदुस्थान का निर्वाचन आयोग संवैधानिक संस्था है। इस आयोग की प्रशंसा सारी दुनिया ने की लेकिन इस संस्था पर भी तमाम आरोप लगाए गए। महाभारत युद्ध का परिणाम पहले से ही स्पष्ट था। गीता के अंतिम अध्याय के अंतिम श्लोक का पाठ विजय परिणाम से जुड़ा है। संजय ने धृतराष्ट्र को घर बैठे ही महाभारत युद्ध का किस्सा सुनाया था। गीता के अंतिम अध्याय के अंतिम श्लोक का पाठ विजय परिणाम से ही जुड़ा है। संजय ने धृतराष्ट्र को बताया ‘जिस पक्ष में योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और धनुर्धर अर्जुन हैं, उसी पक्ष में श्री, शक्ति और विजय है। ऐसा मेरा मत है।’ चुनावी महाभारत में भी विजय सुस्पष्ट थी। अनुमान विश्वास बन चुके थे। जिस पक्ष का नेतृत्व कर्मठ नरेंद्र मोदी कर रहे थे और जिस पक्ष में भारत का जन-गण-मन पहले से ही उल्लासबद्ध था, विजय उसी की। वही हुआ। हिंदुस्थान प्रसन्न है और विपक्ष सन्न। अब कार्यकारण के विश्लेषण का समय है।
महाभारत का तत्वज्ञान है गीता। गीता का सबसे बड़ा तत्वज्ञान है कर्म। गीता के कृष्ण निरंतर कर्मरत रहे। इसीलिए विजयसूत्र उनके हाथ रहे। कृष्ण बताते हैं ‘मुझे दुनिया की कोई भी वस्तु अप्राप्य नहीं है फिर भी मैं कर्म में लगा रहता हूं (३.२२) वे पूरी मानवता को भी संदेश देते हैं ‘विद्वानों को चाहिए कि वे दूसरों को भी कर्मयोगी बनाएं। (३.२६) कृष्ण ने जनक आदि ऋषियों का उदाहरण देकर भी कर्म महत्ता बताई थी। विजयश्री का आधुनिक कथानक वही है। मोदी ने पूरे ५ वर्ष निरंतर अथक श्रमतप किया। उन्हें विजयश्री मिली।
ऋग्वेद का जोर भी सतत कर्म पर है। ऋग्वेद के देवता पुरुषार्थ के कारण ही उच्च पदस्थ हुए हैं सो पुरुषार्थी को ही लाभान्वित करते हैं। ऋग्वेद में सबसे ज्यादा स्तुतियां इंद्र की हैं। लेकिन इंद्र भी ‘कर्मभिर्महभ्यिद सुश्रुतो भूत-कर्म के कारण ही यशस्वी हुए हैं।’ (३.३६.१) इसलिए ‘इंद्र कर्मठ को ही ऐश्वर्यशाली बनाते हैं।’ (१०.४२.८ और १.१३३.७) इंद्र पुरुषार्थी हैं, जमकर कर्म करते हैं। उन्होंने ‘अपने पुरुषार्थ से शत्रुओं को दूर भगाया है।’ (१.१००.१०) इंद्र के दाहिने हाथ में कर्म कुशलता है। (वही, मंत्र ९) पुरुषार्थी इंद्र शत्रुओं को हरा देता है। (१०.२९.८) इसीलिए ‘इंद्र ने अकर्मण्य और आलसी प्रजाजनों को निंदनीय बनाया’ (४.२८.४) अग्नि भी पुरुषार्थी हैं, आलस्य नहीं करते, ‘वे यज्ञ आहुतियां देवों तक पहुंचाने का काम करते हैं।’ (४.१.४) सभी कर्म अच्छे ही नहीं होते कुछ अच्छे होते हैं तो कुछ बुरे भी। इसकी जांच-पड़ताल का भी काम बहुत जरूरी है। यह काम वरुण करते हैं, लेकिन सूर्य भी करते हैं ‘वामदेव के रचे एक सुंदर सूक्त (४.१.१७) में ‘उषा काल के समय से ही मनुष्यों के अच्छे-बुरे काम देखने के लिए सूर्य देव ऊपर प्रकट होते हैं।’ सूर्य भी शुभ कर्मठ का साथ देते हैं। आम चुनाव का जनोदश सुस्पष्ट है। यह कर्मठता के पक्ष में है। जाति विभाजन के विरोध में है। मोदी के नेतृत्व में जातियों के बाड़े टूट गए हैं। छद्म सेकुलरवाद की पिटाई हुई है। समाजतोड़क मजहबी अलगाववाद को जनता ने खारिज कर दिया है। हिंदुस्थान की अपनी मूल प्रकृति और संस्कृति का जयघोष हुआ है। मोदी का विजयरथ परिवारवादी, जातिवादी राजनीति को रौंदता हुआ हिंदुस्थान के मन का संकल्प बना है। लोकतंत्री इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है। लोकसभा की सभी सीटों पर मोदी का नाम और मोदी का काम सिर चढ़कर बोला है। विपक्ष को जनता की ओर से सांत्वना भी नहीं मिली। मोदी ने ठीक कहा था कि अब नया हिंदुस्थान है। वाकई नया हिंदुस्थान कृति आकार ले रहा है। जातिविहीन, संप्रदायविहीन राष्ट्र सर्वोपरिता वाला हिंदुस्थान। आमजनों ने मोदी को गले लगाया। हिंदुस्थान को भारत की नियति प्रकृति और संस्कृति में विकसित होने का अवसर है। विपक्ष आत्मचिंतन करे या ईवीएम को गाली दे। यह उसकी स्वतंत्रता है लेकिन उसे जनादेश का सम्मान करना चाहिए इसी स्वीकार में भारतीय लोकतंत्र की मजबूती है।