विरपुर का जलाराम मंदिर अनवरत अन्न दान

परमपूज्य गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है- ‘तुलसी पंछी के पीये, घटै न सरिता नीर। दान किए न धन घटे, जो सहाय रघुबीर।’ दान की बड़ी महिमा है। लोग देशभर के मंदिरों में बड़ी मात्रा में दान करते हैं। कई मंदिरों में तो यह दान करोड़ों रुपयों तक पहुंच चुका है। कुछ मंदिरों के ट्रस्टी राजनीति में पहुंच गए हैं। कुछ दान के मामले में विवादों में फंसे हैं। कहीं भ्रष्टाचार की चर्चा है। लेकिन उन सभी से अलग विरपुर का जलाराम बाप्पा का एक ऐसा मंदिर है, जहां बिना दान लिए अन्नदान यानी महाभंडारा अनवरत चलता रहता है।
संतों की भूमि कहे जानेवाले सौराष्ट्र में राजकोट तथा जैतपुर के पास विरपुर गांव है। इस गांव में जलाराम बाप्पा का मंदिर है। जहां रोजाना ५ से ७ हजार भक्त भंडारा का प्रसाद लेकर ही वहां से लौटते हैं। यह भंडारा सन् १८२० से अनवरत चलता आ रहा है। कहते हैं कि जलाराम बाप्पा ने विरपुर में भगवान की कठिन तपस्या कर भगवान को प्रसन्न किया था। उन्होंने भगवान से एक झोली और एक लकड़ी का डंडा मांगा था। उनका गुरुमंत्र था- ‘देने को टुकड़ो भलो, लेने को हरिनाम।’ यह मंत्र उन्हें उनके गुरु संत भोजलराम ने दिया था। तभी से विरपुर में अन्नदान यानी भंडारे की शुरुआत हुई। ४ नवंबर, १७९९ को माता राजबाई तथा पिता प्रज्ञान ठक्कर के घर पैदा हुए जलाराम बचपन से ही भगवत भजन में लीन हो गए थे। कहते हैं कि उनके भजन से प्रसन्न होकर १९०१ में जामनगर के महाराज रणमलजी ने जब बाप्पा को वस्त्र दान दिया तो वह कम पड़ गया। यह चर्चा पूरे देश में पैâल गई। कहते हैं कि सन् १९३४ में जब जलाराम बाप्पा गाजोल गांव के जीवराज के घर पहुंचे तो वे गरीबी के कारण असमर्थ होकर बाप्पा को भोजन न करा पाया। बाप्पा ने उसकी वस्तुस्थिति समझकर जब अपने डंडे से उसके खाली घर को स्पर्श किया तो उसका घर अनाजों से भर गया। अपनी मां के निधन के ३ साल बाद २३ फरवरी, १८८१ में जलाराम बाप्पा भी भजन गाते-गाते चल बसे। उनकी स्मृति में उनका एक मंदिर बनाया गया, जो जलाराम मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। जलाराम का मंदिर गुजरात का ही नहीं दुनिया का प्रसिद्ध मंदिर है। यहां आनेवाले भक्तों के मन में बस एक ही प्रश्न उठता है कि बिना किसी से दान लिए यह भंडारा अनवरत यहां वैâसे चलता रहता है? जानकारों का कहना है कि भंडारे के जिस ट्रक से सामान वहां पहुंचता है, वहां भेजनेवाला जलाराम तथा पानेवाले का नाम भी जलाराम होता है। यहां के भक्त एक-दूसरे को ‘जय जलाराम’ कहकर संबोधित करते हैं। कहा जाता है कि बाप्पा जलाराम के वंशज जयसुखराम ने ९ फरवरी, २००० में जलाराम भक्तों की एक बैठक बुलाई। वहां चर्चा हुई कि मंदिर में १०० वर्ष तक चलनेवाले महाप्रसाद (भंडारे) का भंडार है इसलिए कोई भी भक्त यहां दान न करे। मंदिर प्रबंधन मानवसेवा को ही अपना धर्म समझता है। जलाराम बाप्पा की झोली और उनकी लकड़ी में क्या चमत्कार है, यह उनके भक्तों की समझ से परे है। यही कारण है कि आज उनके माननेवालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है।