" /> विरोधियों का आंगन; सरकार का रणांगण!, काले कौवों की फड़फड़ाहट

विरोधियों का आंगन; सरकार का रणांगण!, काले कौवों की फड़फड़ाहट

महाराष्ट्र में विपक्ष ने ‘ठाकरे सरकार’ के खिलाफ आंदोलन शुरू किया है। जहां पूरा देश कोरोना के खिलाफ लड़ाई में जुटा हुआ है, वहीं महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी निरर्थक आंदोलन की फिराक में है। इस आंदोलन की हालत ‘मेरा आंगन, मेरा रणांगण’ जैसी हो गई है। ये लोग इस आंदोलन के माध्यम से महाराष्ट्र को बचाना चाहते हैं। राज्य के भाजपा अध्यक्ष चंद्रकांत पाटील ने एक फतवा जारी किया है, जिसमें कहा गया है ‘राज्य के लोगों को शुक्रवार को अपने घरों से बाहर निकलना चाहिए। सामाजिक दूरी को ध्यान में रखते हुए काले मास्क, काली शर्ट, काले रिबन और बोर्ड लेकर राज्य सरकार का विरोध किया जाना चाहिए।’ चंद्रकांत पाटील और कई अन्य भाजपा कार्यकर्ताओं के सिर के बाल सफेद होकर चांदीनुमा हो गए हैं। तो क्या अब वे बालों पर काला रंग लगाकर आंगन से रणांगण (युद्ध के मैदान) में जाएंगे? क्योंकि महाराष्ट्र भाजपा का आदेश है कि सब-कुछ काला करो। यह सब-कुछ पागलों का मेला है। पाटील और उनकी पार्टी का कहना है कि महाराष्ट्र की स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है और अत्यंत गरीबों को भोजन नहीं मिल रहा है। महाराष्ट्र और केरल की तुलना करते हुए पाटील ने दुख जताते हुए कहा है कि कोरोना पर नियंत्रण पाने में जिस प्रकार केरल ने सफलता पाई, वैसा महाराष्ट्र में क्यों नहीं हो पाया? लगता है कि पाटील ने ‘केरल मॉडल’ का ठीक से अध्ययन नहीं किया है। केरल के मुख्यमंत्री विजयन केंद्र के निर्देशों का पालन नहीं कर रहे और प्रधानमंत्री मोदी के साथ वीडियो बैठकों में शामिल होना वे समय की बर्बादी मानते हैं। उनकी सरकार का कहना है कि विजयन पीएम की वीडियो चर्चा में शामिल नहीं होते क्योंकि मोदी के साथ बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकलता। इसलिए चंद्रकांत पाटील और श्री फडणवीस को महाराष्ट्र की बजाय केरल जाना चाहिए और वहां ‘रणांगण’ मचाना चाहिए। महाराष्ट्र का आंगन साफ ​​है और युद्ध के मैदान में कोरोना योद्धा लड़ रहे हैं। देश में स्वास्थ्य संबंधी आपातकाल है। महाराष्ट्र सरकार ‘केरल मॉडल’ नहीं अपितु प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री शाह के समन्वयन में काम कर रही है। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने पहले ही साफ कर दिया है कि कोरोना युद्ध का नेतृत्व प्रधानमंत्री मोदी के पास है और रहेगा। यदि यह महाराष्ट्र के भाजपा नेताओं को नहीं पच रहा है तो वे बेशक आंदोलन करें। हालांकि उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि यह आंदोलन उनके अपने ही नेताओं के खिलाफ होगा। महाराष्ट्र में विपक्ष पर तनाव अधिक हो गया है। लोगों ने उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया है और अगर भाजपा कुछ करती है या बात करना शुरू करती है, तो लोग मुस्कुराते हुए उनसे पूछते हैं, ‘मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है?’ इन सबसे निराश होना स्वाभाविक है। महाराष्ट्र में कोरोना के कारण नई चुनौतियां पैदा हो गई हैं और यह सच है कि सरकार उन चुनौतियों से जूझ रही है। यदि विपक्ष के नेताओं को महाराष्ट्र राज्य उनका अपना लगता है, तो उन्हें इस मुद्दे को हल करने में राज्य सरकार का सहयोग करना चाहिए। राज्यपाल के ‘आंगन’ में लोटने की बजाय विपक्ष को मुख्यमंत्री के घर आना चाहिए और राज्य के मुद्दों पर चर्चा करनी चाहिए। क्या विपक्ष को मुख्यमंत्री के साथ राज्य के मुद्दों पर चर्चा करने में शर्म आती है या उसने आत्मविश्वास खो दिया है? महाराष्ट्र में हर कोई कोरोना की लड़ाई पर काम कर रहा है। मरीज बढ़ रहे हैं लेकिन कोरोना के मरीज ठीक भी हो रहे हैं। अब तक १० हजार मरीज कोरोना से मुक्त हो चुके हैं। ये किस बात का सूचक है? कोरोना योद्धाओं पर विश्वास न जताकर भाजपा क्या साबित करना चाहती है? प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं कि यह बहस करने का समय नहीं है लेकिन महाराष्ट्र भाजपा प्रधानमंत्री मोदी के कहने के ठीक विपरीत काम कर रही है। यह किस तरह का अनुशासन है? ऐसा तो लगता नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा के सुझाव पर पाटील-फडणवीस महाराष्ट्र में अपना ही मुंह काला करनेवाला आंदोलन कर रहे हैं। इस आंदोलन की बवासीर ने उन्हें ही परेशान किया हुआ है। प्रदेश भाजपा का ‘महाराष्ट्र बचाओ आंदोलन’ क्या है? लोगों को लगता है कि ठाकरे सरकार के हाथों में महाराष्ट्र सुरक्षित है। इसलिए अब ऐसा कहने की नौबत आन पड़ी है कि महाराष्ट्र को उखड़ी हुई पार्टी से बचाओ। पाटील-फडणवीस ने जो भी सवाल उठाए हैं, वे सारे सवाल केंद्र से संबंधित हैं। मुख्यमंत्री एक काम करें कि सर्वपक्षीय प्रतिनिधिमंडल को विरोधी दल नेता के नेतृत्व में दिल्ली भेजें और दिल्ली से मंजूर की जानेवाली कार्यों की सूची सौंप दें। पाटील-फडणवीस जोकि महाराष्ट्र के बारे में इतने चिंतित हैं, इन सभी कार्यों और योजनाओं के लिए उन्हें महाराष्ट्र के हिस्से का पांच-पचास हजार करोड़ रुपए ले आना चाहिए। महाराष्ट्र किसी एक या दो दलों का नहीं है। यह रचनात्मक कार्य महाराष्ट्र में ‘कलमुंहे’ आंदोलन को अंजाम देने से बेहतर है। जहां महाराष्ट्र को उज्जवल और तेजस्वी बनाने की जंग चल रही है, वहीं राज्य को ‘काला’ बनाने के लिए आंदोलन शुरू हो गया है। हमें कोई संदेह नहीं है कि काले कौवों का यह फड़फड़ाना थोड़ी देर का ही साबित होगा। पाटील-फडणवीस सजग होकर बोलें और व्यववहार करें। बुद्धिमानों के लिए शब्दाघात ही पर्याप्त हैं, लेकिन क्या विपक्ष में बुद्धिमानी बची है?