विश्वव्यापी है गणेश पूजा

भगवान गणेशको सिर्फ हिंदुस्थान में ही नहीं विदेशों में भी अलग-अलग नाम से पूजा जाता है। बौद्ध धर्म की प्रधानतावाले देश जापान के क्योटो शहर के एक मंदिर में भगवान गणेश की मूर्ति है, वहां गणेश को ‘शोसेन’ नाम से पूजा जाता है। जापान में कई हिंदू देवी-देवताओं की पूजा की जाती है, जिनमें ब्रह्मा, देवी सरस्वती, लक्ष्मी, वरुण, वायु, इंद्र, यम और गरुड़ देव शामिल हैं, इन्हें वहां दूसरे नामों से पूजा जाता है। माना जाता है कि दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान छठी शताब्दी में प्रारंभ हुआ था, जब जापान में बौद्ध धर्म का प्रसार हो रहा था।

जापान में गणेश जी को एक और नाम कंगनितन से भी जाना जाता है, जो कि जापानी बुद्ध धर्म का हिस्सा हैं। कंगनितन का जापान में कई स्वरूप हैं लेकिन सबसे ज्यादा प्रचलित है, दो शरीरों वाला स्वरूप। इसके अलावा जापान में ४ हाथों वाले गणेशजी का स्वरूप भी प्रचलित है। ऐसा माना जाता है कि जापान में ८ वीं-९वीं सदी में गणेशजी का पूजन शुरू हुआ। हिरोशिमा के पास मियाजिमा के एक गणेश मंदिर में सरस्वती के साथ बुद्ध भी हैं। इस मंदिर में बीच में गणेश बैठे हैं।

जापान के कोयसान संतसुजी विहार में गणेश की चार चित्रवलियां रखी गर्इं हैं, जिनमें युगम गणेश, षड्भुज, गणेश, चतुर्भुज गणेश तथा सुवर्ण गणेश प्रमुख हैं। तिब्बत के हरेक मठ में भी गणेश पूजन की परंपरा काफी पुरानी है। यहां गणपति अधीक्षक के रूप में पूजे जाते हैं। नौवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में ही तिब्बत के अनेक स्थानों में गणेश पूजा का प्रचलन शुरू हो गया था। हिंदुस्थानी बौद्ध भिक्षु अतिसा दीपंकर श्रीजना और गयाधरा ने ग्यारहवीं सदी में तिब्बती बौद्ध धर्म में गणेशजी को प्रचारित किया। इन्हें ही तिब्बत में गणेश पंथ को शुरू करनेवाला माना जाता है। गयाधरा कश्मीर से थे, जिन्होंने तिब्बत में गणेश पंथ को प्रचारित किया। तिब्बत में गणेशजी को दुष्टात्माओं के दुष्प्रभाव से रक्षा करनेवाला देवता माना जाता है। यहां गणेशजी बौद्ध विहारों एवं मंदिरों के द्वार के ऊपर स्थापित हैं। तिब्बत में कहा जाता है कि भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों से गणपति हृदय नामक मंत्र जपवाया था। यहां बुद्ध का एक चिह्न हाथी है और गणपति का मस्तक भी हाथी, जो कुछ समानता बताता है। नेपाल में गणेश मंदिर की स्थापना सर्वप्रथम सम्राट अशोक की पुत्री चारूमित्रा ने की तथा उन्हें बौद्धों के सिद्धिदाता के रूप में माना गया है।

ईसा से २३६ वर्ष पूर्व मिस्र में श्री गणेश के कई मंदिर थे। उस समय इन्हें कृषि रक्षक के नाम से पूजा जाता था। किसान अपने खेत में ऊंचे स्थान पर गणेश प्रतिमा स्थापित करते थे, जिससे फसलें रोगमुक्त रहें तथा पैदावार अच्छी हो। विद्वानों का मानना है कि हिंदुस्थान के बाहर गणेश पूजन का प्रसार बौद्ध धर्म के साथ ही हुआ है। पश्चिम में रोमन देवता ‘जेनस’ को गणपति के समकक्ष माना जाता है, ऐसा माना जाता है कि जब भी इतालवी व रोमन पूजा अर्चना करते थे तो वे अपने इष्ट ’जेनस’ का नाम लेते थे। १८ वीं शताब्दी के संस्कृत के प्रकांड विद्वान विलियम जोन्स ने जेनस व गणपति की पारस्परिक तुलना करते हुए माना है कि गणेश में जो विशेषताएं पाई जाती है, वे सभी जेनस में भी हैं। यहां की रोम व संस्कृत शब्दों के उच्चारण में भी इतनी समानता है कि दोनों देवों में अंतर नहीं किया जा सकता। हिंदुस्थान से बाहर विदेशों में बसनेवाले हिंदुस्थानियों ने हिंदुस्थानी संस्कृति की जड़ों को काफी गहराई तक फैलाने का प्रयास किया और इन पर भारतीय देवताओं की पूजा-उपासना का स्पष्ट प्रभाव था, जो आज भी है। विदेशों में प्रकाशित पुस्तक गणेश-ए-मोनोग्राफ आफ द एलीमेंट फेल्ड गॉड’ में जो तथ्य उजागर किए गए हैं, उससे इस बात का स्पष्ट प्रमाण मिलता है कि विश्व के कई देशों में गणेश प्रतिमाएं बहुत पहले से पहुंच चुकी हैं और विदेशियों में भी गणेश के प्रति श्रद्धा और अटूट विश्वास रहा है। विदेशों में पाई जानेवाली गणेशजी की प्रतिमाओं में इनके विभिन्न स्वरूप अलग-अलग देखे गए हैं। जावा में गणेश की मूर्तियों में वे पालथी मारकर बैठे दिखाए गए हैं। उनके दोनों पैर जमीन पर टिके हुए हैं व उनके तलुए आपस में मिले हुए हैं। हमारे देश में गणेशजी की मूर्तियों में उनकी सूड़ प्राय: बीच में दाहिनी या बांई ओर मुड़ी होती है किंतु विदेशों में वह पूर्णत: सीधी, सिरे से मुड़ी हुई है। यहां पर बनी गणेशजी की मूर्तियों में दो या चार हाथ दिखाए गए हैं। सन् ८०४ में जब जापान का कोबोदाइशि धर्म की खोज करने हेतु चीन गया तो वहां वङ्काबोधि और अमोधवज नामक हिंदुस्थानी आचार्य विद्वानों द्वारा मूल ग्रंथों का चीनी अनुवाद करने का मौका मिला तो चीन की मंत्र विद्या प्रणाली में गणेशजी की महिमा को भी वर्णित किया गया। सन् ७२० में चीन की राजधानी लो-यांग अमोध्वज पहुंचा, जो हिंदुस्थानी मूल का ब्राह्मण था, जिसे चीन के कुआंग-फू मंदिर में पुजारी के रूप में नियुक्त किया गया था। बाद में अमोध्वज से एक चीनी धर्म परायण व्यक्ति हुई-कुओ ने पहले दीक्षा ली, फिर उसने कोषोदाइशि को दीक्षा दी, जिसने वहां के विभिन्न मठों से संस्कृत की पांडुलिपियां एकत्र की व सन् ८०६ में जब वह जापान लौटा तो वङ्का धातु के महत्त्वपूर्ण सूत्रों के साथ गणेश के चित्र भी साथ ले गया, जिसे सुख-समृद्धि पर परब्रह्म की जानमयी शक्ति के रूप में माना गया।

गणेश हिमाल मध्योत्तर नेपाल में स्थित हिमालय का एक खंड है। इसके अधिकतर पर्वत नेपाल में हैं लेकिन कुछ नेपाल व तिब्बत की सीमा पर भी स्थित हैं। इसके पूर्व में स्थित त्रिशूल गंडकी घाटी इसे लांगटांग हिमाल से अलग करती है। कहते हैं यह वही क्षेत्र है, जहां माता पार्वती ने गणेश का विग्रह बनाकर उसमें प्राण फूंके थे और शिवजी के त्रिशूल से गणेश का शिरोच्छेदन हुआ था, बाद में उन्हें हाथी के बच्चे का सिर लगाया गया था।

मॉरीशस के ला पॉइंट डी लास्कर, रिविएर डु रेमपार्ट में पंचमुखी गणपति मंदिर है। इसको बचाए और विकसित करने के लिए एक कोष स्थापित किया गया है। यह मंदिर मॉरीशस द्वीप के सभी हिस्सों से हिंदुओं के लिए तीर्थयात्रा का एक संदर्भ और स्थान बन गया है।

चीन के तुन-हू-आग में एक पहाड़ी पर ये मूर्तियां सन् ६४४ में स्थापित की गई थी। गणेश की मूर्ति के नीचे चीनी भाषा में लिखा हुआ है कि ये हाथियों के अमानुष राजा हैं। चीन में गणपति कांतिगेन कहलाते हैं। कंबोडिया की प्राचीन राजधानी अंगकोरवाट में जो मूर्तियों का खजाना मिला है, उसमें भी गणेश के विभिन्न रंग-रूप पाए गए हैं, वैसे यहां कांसे की मूर्तियों का प्रचलन है। स्याम देश, जहां पर बसे हिंदुस्थानियों ने वैदिक धर्म की कई सौ वर्ष पूर्व ही प्रचारित कर दिया था, के कारणवश यहां पनपी धार्मिक आस्था के फलस्वरूप यहां निर्मित की गई गणेश की मूर्तियां, ‘आयूथियन’ शैली में दिखाई देती हैं। स्याम देश में वैदिक धर्म ‘राजधर्म’ के रूप में प्रसिद्ध था, जिसके कारण यहां आज भी धार्मिक अनुष्ठान वैदिक रीति से ही संपन्न होते हैं। अमेरिका में तो लंबोदर गणेश की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं।