" /> वृद्धि योग में मनेगी जन्माष्टमी, जन्माष्टमी पर नहीं होगा रोहिणी नक्षत्र

वृद्धि योग में मनेगी जन्माष्टमी, जन्माष्टमी पर नहीं होगा रोहिणी नक्षत्र

जन्माष्टमी यानी भगवान कृष्ण का जन्म भक्तों के लिए हमेशा ही खास होता है। इस बार जन्माष्टमी पर एक विशेष योग बन रहा है। वृद्धि योग। ऐसी मान्यता है कि इस वृद्धि योग में जो भी कार्य किए जाते हैं, उनमें सफलता जरूर मिलती है। लेकिन इस बार जन्माष्टमी रोहिणी नक्षत्र के बगैर ही मनाई जाएगी। जैसा कि हम जानते हैं कि श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। ऐसे में नक्षत्र और तिथि का यह संयोग इस बार एक दिन पर नहीं बन रहा है।
श्रीमद्भागवत दशम स्कंध में कृष्ण जन्म प्रसंग में उल्लेख मिलता है कि अर्धरात्रि में जिस समय पृथ्वी पर कृष्ण अवतरित हुए थे, उसी समय ब्रज में घनघोर बादल छाए थे। लेकिन चंद्रदेव ने अपनी दिव्य दृष्टि से अपने वंशज को जन्म लेते हुए देखा था। यही कारण है कि श्री कृष्ण का जन्म अर्धरात्रि में चंद्रमा उदय के साथ होता है। लेकिन गत वर्ष की तरह इस बार भी ऐसी स्थिति बन गई है कि अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र दोनों एक ही दिन नहीं आ रहे हैं। इस बार भी कृष्ण जन्म की तिथि और नक्षत्र एक साथ नहीं मिल रहे हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार इस वर्ष ११ अगस्त को सुबह ९ बजकर ०७ मिनट के बाद अष्टमी तिथि का आरंभ हो जाएगा, जो १२ अगस्त को ११ बजकर १७ मिनट तक रहेगी, वहीं रोहिणी नक्षत्र का आरंभ १३ अगस्त को सुबह ०३ बजकर २७ मिनट से ०५ बजकर २२ मिनट तक रहेगा। अर्थात भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि की शुरुआत ११ अगस्त को सुबह ९:०७ से होगी और १२ अगस्त को दिन में ११:१६ मिनट तक रहेगी। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, १२ अगस्त पर कृतिका नक्षत्र लगेगा। यही नहीं, चंद्रमा मेष राशि और सूर्य कर्क राशि में रहेंगे। कृतिका नक्षत्र और राशियों की इस स्थिति वृद्धि योग बना रही है। ऐसे में अगर बुधवार की रात को बताए गए मुहूर्त में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाए तो उससे दोगुना फल प्राप्त होगा, वहीं अगर रोहिणी नक्षत्र की बात करें तो इसकी शुरुआत १३ अगस्त को तड़के ०३:२७ मिनट से होगी और इसका समापन ०५:२२ मिनट पर होगा।
दो दिन मनाई जाएगी जन्माष्टमी
जन्माष्टमी का त्योहार इस बार दो दिन यानी ११ और १२ अगस्त मनाया जा रहा है। इसमें १२ अगस्त को जन्माष्टमी मनाना श्रेष्ठ है। मथुरा और द्वारिका में १२ अगस्त को जन्मोत्सव मनाया जाएगा। शास्त्रों में इस तरह की उलझनों के लिए एक आसान सा उपाय बताया गया है कि गृहस्थों को उस दिन व्रत रखना चाहिए, जिस रात को अष्टमी तिथि लग रही है। पंचांग के अनुसार, ११ अगस्त दिन मंगलवार को गृहस्थ आश्रम के लोगों को जन्माष्टमी का पर्व मनाना सही रहेगा क्योंकि ११ की रात को अष्टमी है। गृहस्थ लोग रात में चंद्रमा को अर्घ्य दें, दान और जागरण कीर्तन करें और १२ अगस्त को व्रत का पारण करें और कृष्ण जन्मोत्सव धूमधाम से मनाएं, जो कि श्रेष्ठ एवं उत्तम रहेगा, वहीं जो लोग वैष्णव व साधु संत हैं उनको १२ अगस्त को व्रत रख सकते हैं। १२ अगस्त को सुबह ११ बजकर १७ मिनट तक अष्टमी तिथि रहेगी और उसके बाद नवमी तिथि लग जाएगी।
ऐसे करें कान्हा की मूर्ति का चुनाव
देवकीनंदन भगवान श्रीकृष्ण को सृष्टि के पालनहार श्रीहरि विष्णु का ८वां अवतार माना जाता है और उनके जन्मोत्सव को पूरे देश में धूमधाम के साथ जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने से संतान प्राप्ति, आयु तथा समृद्धि की प्राप्ति होती है। यही नहीं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाकर व्यक्ति अपनी हर मनोकामनाओं को पूरा कर सकता है। और तो और जिन लोगों का चंद्रमा कमजोर है वह इस शुभ दिन पूजा करके विशेष लाभ की प्राप्ति कर सकता है।
जन्माष्टमी के लिए श्री कृष्ण की मूर्ति का
चुनाव ऐसे करें –
यूं तो जन्माष्टमी के दिन बालकृष्ण की स्थापना की जाती है पर आप अपनी आवश्यकता और मनोकामना के आधार पर जिस स्वरूप को चाहें उसे स्थापित कर सकते हैं। जैसे कि प्रेम और दांपत्य जीवन के लिए राधाकृष्ण की, संतान के लिए बालकृष्ण की और सभी मनोकामनाओं के लिए बंशीवाले कृष्ण की स्थापना करें। आप चाहें तो इस शुभ दिन शंख और शालिग्राम की स्थापना भी कर सकते हैं।
श्री कृष्ण के श्रृंगार की क्या व्यवस्था करें –
भगवान श्री कृष्ण के श्रृंगार में फूलों का महत्व सबसे अधिक माना जाता है इसलिए अलग-अलग तरीके के फूलों की व्यवस्था करें, वैजयंती के फूल मिल जाएं तो सबसे ज्यादा उत्तम होगा। पीले रंग के वस्त्र, गोपी चंदन और चंदन की सुगंध की व्यवस्था भी जरूर करें। इन तमाम चीजों से भगवान का श्रृंगार अच्छे से करें और कृष्ण जन्म के बाद उनको झूले में बैठाकर झुलाएं अतः सुंदर से झूले की व्यवस्था अवश्य करें।
जन्माष्टमी पर भगवान श्री कृष्ण को
क्या लगाएं भोग –
अगर आप जन्माष्टमी के विशेष दिन भगवान श्रीकृष्ण की कृपा चाहते हैं तो पंचामृत जरूर बनाएं और उसमें तुलसी दल भी याद से डालें। साथ ही आप मेवा, माखन और मिसरी की व्यवस्था भी कर सकते हैं। कहीं-कहीं धनिए की पंजीरी भी लोग अर्पित करते हैं। बता दें कि पूर्ण सात्विक भोजन, जिसमें कई तरह के व्यंजन हों, इस दिन भगवान श्री कृष्ण को आप अर्पित कर सकते हैं।

वर्जित है श्रीकृष्ण की पीठ के दर्शन
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व हिंदुओं का एक प्रमुख त्योहार है। इस साल यह त्यौहार १२ अगस्त को मनाया जाएगा। इस मौके पर आप जान लें कि भक्तों के लिए भगवान गणेश की तरह भगवान श्रीकृष्ण की पीठ का दर्शन भी वर्जित है। अर्थात कभी भूल से भी श्री कृष्ण की पीठ नहीं देखनी चाहिए। ऐसा करने से इंसान पाप का भागीदार बन जाता है क्योंकि श्रीकृष्ण की पीठ पर अधर्म का वास होता है इसलिए पीठ के दर्शन से हमारे पुण्य क्षीण हो जाते हैं।
दरअसल भगवान श्रीकृष्ण की पीठ के दर्शन न करने के पीछे एक प्रचलित कथा है, जो आज हम आपको बताने जा रहे हैं। पौराणिक कथा के अनुसार जब श्रीकृष्ण जरासंध से युद्ध कर रहे थे तब जरासंध का एक साथी असुर कालयवन भी भगवान से युद्ध करने आ पहुंचा। जब कालयवन श्रीकृष्ण के सामने पहुंचकर ललकारने लगा, तब श्रीकृष्ण वहां से भाग निकले और इस तरह रणभूमि से भागने के कारण ही उनका नाम रणछोड़ पड़ गया। कृष्ण के वहां से भागने की भी एक वजह थी। श्रीकृष्ण जानते थे कि उनका सुदर्शन कालयवन का कुछ नहीं बिगाड़ सकता। कालयवन के पिछले जन्मों के पुण्य बहुत अधिक थे। दूसरा कृष्ण किसी को भी तब तक सजा नहीं देते जब कि पुण्य का बल शेष रहता है। जब कृष्ण रण छोड़कर भागने लगे तो कालयवन उनकी पीठ देखते हुए भागने लगा और इसी तरह उसका अधर्म बढ़ गया। ऐसा कहा जाता है कि भगवान की पीठ पर अधर्म का वास होता है और उसके दर्शन करने से अधर्म बढ़ता है। कालयवन के पुण्य का प्रभाव खत्म हो गया तो कृष्ण एक गुफा में चले गए, जहां मुचुकुंद नामक राजा निद्रासन में था। मुचुकुंद को देवराज इंद्र का वरदान था कि जो भी व्यक्ति राजा को नींद से जगाएगा और वो उनकी नजर पड़ते ही भस्म हो जाएगा। कृष्ण ने गुफा में जाकर अपनी एक पोशाक मुचुकुंद को ओढ़ा दी। इसके बाद कालयवन ने मुचुकुंद को कृष्ण समझकर उठा दिया और राजा की नजर पड़ते ही राक्षस वहीं भस्म हो गया। इस वजह से कहते हैं कि भगवान कृष्ण के पीठ के दर्शन नहीं करने चाहिए क्योंकि इससे पुण्य कम होते हैं और अधर्म बढ़ने लगता है।

ऐसे करें केशव को प्रसन्न
जन्माष्टमी के दिन भगवान कृष्ण की पूजा में पान का विशेष महत्व होता हैं पूजा में पान का पत्ता शामिल करने से देवी मां लक्ष्मी प्रसन्न हो जाती हैं। पूजा के दौरान एक ताजा पान का पत्ता लें और उसमें ‘ॐ वासुदेवाय नमः’ लिखकर भगवान कृष्ण को अर्पित करें। माना जाता है कि ऐसा करने से पूजा फलदायी होती है। जन्माष्टमी पर तुलसी पूजा का भी महत्व होता है। शास्त्रों में बताया गया है कि तुलसी भगवान कृष्ण को प्रिय है, ऐसे में इस दिन तुलसी पूजन शुभ माना गया है। शाम के वक्त तुलसी के सामने घी का दीपक जलाना चाहिए और ११ बार परिक्रमा करने से माता लक्ष्मी प्रसन्न हो जाती हैं। वहीं अगर आपके घर में तुलसी का पौधा नहीं है तो किसी मंदिर में जाकर दीपक जला सकते हैं मगर किसी दूसरे के घर में तुलसी पूजा करने नहीं जाना चाहिए। ऐसा करने से उस पूजा का आपको फल प्राप्त नहीं होता है।