" /> वेदनिंदक नहीं हैं व्रत के अधिकारी

वेदनिंदक नहीं हैं व्रत के अधिकारी

गुरुवार-आमलकी एकादशी व्रत
छब्बीस एकादशियों में आमलकी एकादशी व्रत का अपना विशेष महत्व होता है। आमलकी एकादशी का व्रत भगवान श्रीहरि के निमित्त किया जाता है। यह व्रत आंवले के पेड़ के नीचे करने से सर्वाधिक लाभ प्राप्त किया जाता है। धर्मशास्त्र से स्पष्ट है कि एकादशी व्रत करनेवालों को इस संसार में समस्त प्रकार का सुख-वैभव अवश्य प्राप्त होता है। एकादशी व्रत के विषय में यजुर्वेद संहिता में भी कहा गया है। मत्स्य, कूर्म, ब्रह्मांड, वाराह, स्कंध भविष्य आदि सभी पुराणों में अनेक वर्गों की विधियां और विवरण देखने में आते हैं। व्रत के बाद व्रत कथा सुनाने की विधि का वर्णन पुराणों में यत्र-तत्र-सर्वत्र सुलभ है। ‘हेमाद्रिव्रतखंड’ में व्रत करने के अधिकार के विषय में भी लिखा गया है। चारों वर्णों के स्त्री-पुरुषों का व्रत में अधिकार है किंतु व्रतकाल में निर्दिष्ट गुणों की नितांत आवश्यकता है। अपने वर्ण के अनुसार ही व्रत करें। जो वेद का निंदक नहीं है, उसी का व्रत में अधिकार है। शास्त्र के मतानुसार कुमारी को पिता की आज्ञा, सौभाग्यवती को पति की आज्ञा और सम्मति लेकर व्रत करना चाहिए अन्यथा व्रत निष्फल हो जाता है। एकादशी व्रत के विषय में वशिष्ठ का वचन है कि जिस तिथि में सूर्योदय होता है वह तिथि यदि मध्याह्न में न रहे। वह खंडा तिथि कहलाती है, उसमें व्रत आरंभ नहीं करना चाहिए। इसके विपरीत अखंडा तिथि में व्रत आरंभ करना उचित है। व्रत के पूर्व दिन संयम रख संकल्प व्रत आरंभ करना होता है। यज्ञ, विवाह, श्राद्ध, होम, पूजा, पुरश्चरण आदि में आरंभ से पहले सूतक लगता है, आरंभ के बाद नहीं लगता। एकादशी के दिन भोजन का निषेध माना गया है। दूध अथवा जलपान करके उपवास हो सकता है। एकादशी का व्रत सर्व साधारण जनता के लिए अपरिहार्य सिद्ध होता है। गृहस्थ, ब्रह्मचारी, सात्विक किसी को भी एकादशी के दिन भोजन नहीं करना चाहिए। यह नियम शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष दोनों में लागू रहेगा। असमर्थ रहने पर ब्राह्मण द्वारा अथवा पुत्र द्वारा उपवास कराने का विधान वायु पुराण में मिलता है। मार्वंâडेय स्मृति के अनुसार बाल, वृद्ध, रोगी भी फल का आहार करके एकादशी का व्रत कर सकते हैं। वशिष्ठ स्मृति के अनुसार दशमी युक्त एकादशी में उपवास नहीं करना चाहिए, ऐसा करने से संतान का नाश होता है। एकादशी के दिन बार-बार खाना, मल-मूत्र का त्याग करना, मिथ्या बोलना तथा ईर्ष्या करना निषेध माना गया है। जो लोग एकादशी के दिन नियमपूर्वक व्रत-उपवास करते हैं, उनके जीवन में किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती।
एकादशी पूर्ण होने पर उद्यापन करने का भी विधान है। एक वर्ष पूरा होने पर एकादशी व्रत का उद्यापन करें। मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष में इसका उद्यापन किया जाता है। उद्यापन में बारह विद्वान ब्राह्मणों और पत्नी सहित आचार्य को आमंत्रित करना चाहिए। यजमान स्नान आदि से शुद्ध होकर श्रद्धा एवं इंद्रिय संयम सहित आचार्य आदि का पूजन करें। आचार्य को चाहिए कि उत्तम रंगों से चक्र कमल संयुक्त सर्वतोभद्रमंडल बनाएं, जिसे श्वेत वस्त्र से आवेष्ठित करें। फिर पंचपल्लव एवं पंचरत्न से युक्त कर्पूर और अगरूकी सुगंध से वासित जल पूर्ण कलश को लाल कपड़े से विस्तृत कर उसके ऊपर तांबे का पूर्ण पात्र रखें। उस कलश को पुष्प मालाओं से भी विस्तृत करें। इस कलश को सर्वतोभद्रमंडल के ऊपर स्थापित करके कलश पर श्री लक्ष्मी नारायण की मूर्ति की स्थापना करें। सर्वतोभद्रमंडल में १२ महीनों के अधिपतियों की स्थापना करके उनका पूजन करना चाहिए। मंडल के पूर्व भाग में शुभ शंख की स्थापना करें। सर्वतो मंडल के उत्तर में हवन के लिए वेदी बनाएं और संकल्पपूर्वक वेदोक्त मंत्र से हवन करें। फिर भगवान विष्णु की प्रतिमा का स्थापन, पूजन और परिक्रमा करें। ब्राह्मणों को, आचार्य को वैदिक मंत्र का जप करना चाहिए। अंत में कलश के ऊपर भगवान विष्णु की स्थापना करनी चाहिए और विधिपूर्वक पूजा कथा स्तुति करें। घृत युक्त पायस की आहुति देने के बाद १५० पलाश की समिधा घी में डुबो कर हवन करें, जो अंगूठे के सिरे से तर्जनी के सिरे तक लंबाई की हो। इसके बाद तिल की आहुति दें इस वैष्णव होम के बाद ग्रहण करें। फिर ब्राह्मणों एवं आचार से स्वस्तिवाचन कराकर दक्षिणा दें।

पंचांग- 

फरवरी २०२० फाल्गुन शुक्ल पक्ष शक संवत-१९४१विक्रम संवत- २०७६
सोमवार, २ मार्च – फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि दिन में ७.५६ तक, कामदा सप्तमी व्रत, होलाष्टक आरंभ, भद्रा दिन में ७:५६ से रात्रि ८:१२ तक
मंगलवार, ३ मार्च – फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि दिन में ८.२६ तक
बुधवार, ४ मार्च – फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि दिन में ८:२४ तक
बृहस्पतिवार, ५ मार्च – फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि दिन में ७:५१तक तदुपरांत एकादशी तिथि प्रारंभ, भद्रा रात्रि ७:२१ से प्रारंभ, आमलकी एकादशी व्रत, रंगभरी एकादशी, श्री काशी विश्वनाथ शृंगार दिन
शुक्रवार, ६ मार्च – फागुन मास शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि प्रात: ५:५१तक तदुपरांत द्वादशी तिथि प्रारंभ
शनिवार, ७ मार्च – फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि रात्रि ३:४२ तक, शनि प्रदोष व्रत
रविवार, ८ मार्च, – फागुन मास शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि रात्रि १:४०तक, चौमासी चौदस (जैन), भद्रा रात्रि १:४० से प्रारंभ