वैचारिक द्वंद के दौर में बौद्धिक खुराक देनेवाला अखबार

ओमप्रकाश तिवारी

१२ मार्च, १९९३ को मुंबई में हुए सिलसिलेवार विस्फोटों के संभवत: दूसरे या तीसरे दिन पहली बार ‘दोपहर का सामना’ के कार्यालय जाना हुआ था। तब मैं `पांचजन्य’ साप्ताहिक (दिल्ली) में कार्यरत था। वह श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन का समय था। बाबरी ढांचा ढहाया जा चुका था। मुंबई में दंगों का दौर गुजर चुका था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुखपत्र होने के कारण ‘पांचजन्य’ कार्यालय भी युद्धभूमि बना हुआ था। वहां होनेवाली चर्चाओं में मुंबई के दो अखबारों का जिक्र बराबर हुआ करता था। एक तो उन दिनों ‘नवाकाल’ में लिखे जा रहे बेबाक संपादकीयों का तो दूसरा बालासाहेब ठाकरे के अखबार ‘सामना’ का। माना जाता था कि सेक्युलर मीडिया की आंधी में उस समय पश्चिमी हिंदुस्थान में बालासाहेब ठाकरे के इस अखबार ने मोर्चा संभाल रखा है। तभी खबर आई कि बालासाहेब ने ‘सामना’ का हिंदी संस्करण भी निकाल दिया है। हम पांचजन्यवालों के लिए उससे भी बड़ी खबर थी `पांचजन्य’ के संपादकीय प्रभारी का नाम यानी संजय निरुपम। `पांचजन्य’ में हमारे सहयोगी मालवीयजी उछल-उछलकर संजय निरुपम के किस्से बयान कर रहे थे। दरअसल निरुपम दो-तीन साल पहले ही `पांचजन्य’ छोड़कर मुंबई आ गए थे। जहां, जनसत्ता से होते हुए वह अब ‘दोपहर का सामना’ के कार्यकारी संपादक नियुक्त हुए थे। पांचजन्यवालों के लिए खुशी की बात यह थी कि बालासाहेब ठाकरे ने ‘हमारे प्रोडक्ट’ को अपने हिंदी संस्करण का कार्यकारी संपादक बनाया है।

मार्च के दूसरे सप्ताह में पारिवारिक कारणों से मेरी मुंबई आने की योजना पहले से बनी हुई थी। मैंने धर्मवीर भारती से उनके साक्षात्कार के लिए समय भी ले रखा था १४ मार्च, १९९३ का। मालवीयजी ने सलाह दी कि मुंबई जा ही रहे हो तो निरुपम से जरूर मिलकर आना। मुझे भी उत्सुकता थी `सामना’ के दफ्तर में जाने की। अब निरुपम के वहां आ जाने से वहां जाने का एक बहाना भी मिल गया था। दुर्याेग देखिए कि मेरे मुंबई आने के बाद ही १२ मार्च, १९९३ को मुंबई दहल उठी। मैं उस दिन देवलाली में था। वीर सावरकर के गांव भगूर में उनकी पुण्य जन्मभूमि के दर्शन करके निकला ही था कि एक कपड़े की दुकान पर चल रहे रेडियो से इन धमाकों की खबर मिली। सपत्नीक भागकर मुंबई पहुंचा कि कहीं कफ्र्यू न लग जाए। अगले दिन लालकृष्ण आडवाणी आनेवाले थे दौरा करने। छुट्टी में भी ऑन ड्यूटी होना पड़ा। आडवाणी का दौरा निपटाया और संभवत: उसी दिन `सामना’ कार्यालय पहुंच गया। लोगों से मुलाकात हुई। न सिर्पâ निरुपम से बल्कि और भी कई साथियों से। चूंकि अखबार नया-नया शुरू हुआ था इसलिए सुधार की प्रक्रिया में था। निरुपम ने एक हेडिंग दिखाकर पूछा – देखिए, क्या कमी दिख रही है ?

मैंने महसूस किया कि उन दिनों ‘दोपहर का सामना’ मुंबई के हिंदीभाषी समाज में भी चर्चा का विषय बना हुआ था। खबरी माहौल होने के कारण प्रसार संख्या तो सभी सांध्य दैनिकों की बढ़ रही थी लेकिन एक विचार विशेष से जुड़े होने के कारण हिंदी के पाठक जो चीज मराठी ‘सामना’ में नहीं पढ़ पाते थे, वह उन्हें ‘दोपहर का सामना’ दे रहा था यानी वैचारिक द्वंद्व के दौर में हिंदीभाषी पाठकों को बौद्धिक खुराक देने का काम ‘दोपहर का सामना’ कर रहा था। अपनी इसी खासियत के कारण ‘दोपहर का सामना’ न सिर्पâ पढ़ा जाता था बल्कि उसमें छपी खबरें और संपादकीय चर्चा का विषय भी बनती थीं। इस घटना के करीब आठ महीने बाद मैं ‘पांचजन्य’ छोड़कर ‘हिंदी ब्लिट्ज’ में आ गया। ब्लिट्ज भी उन दिनों वैचारिक द्वंद्व के दौर से गुजर रहा था। कभी धुर वामपंथी रहे उसके प्रधान संपादक रूसी करंजिया उन दिनों दक्षिणोन्मुखी होने का प्रयास कर रहे थे। अभी भी मुंबई के हिंदीभाषियों पर `दोपहर का सामना’ का बुखार जस का तस था। खासतौर से `सामना’ में प्रथम पृष्ठ पर लगनेवाले शीर्षक लोगों को आकर्षित करते थे। टैबलॉयड अखबारों में शीर्षक का बड़ा महत्व होता है। कभी-कभी एक शब्द का शीर्षक ही पूरी खबर का निचोड़ देने के लिए पर्याप्त होता है। ‘दोपहर का सामना’ का स्टाफ इस कला में माहिर था।

(लेखक दैनिक जागरण के मुंबई ब्यूरो प्रमुख हैं)

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