व्यवस्था के अनुरूप व्रत बनाता है पुण्य का भागी

 

सोमवार, योगिनी एकादशी व्रत – छब्बीस एकादशियों में योगिनी एकादशी व्रत का अपना विशेष महत्व होता है। इस व्रत को करने से भगवान श्रीहरि अत्यंत प्रसन्न होते हैं तथा मरणोपरांत व्रत करनेवाले को स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है। आज के दिन नियम-संयम से व्रत करने का विधान भी शास्त्रों में बताया गया है। शास्त्रों में बताई गई व्यवस्था के अनुरूप व्रत को रखकर पुण्य का भागी बना जा सकता है।

मंगलवार भौम प्रदोष व्रत- दैनिकचर्या के कर्मों में प्रभु की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए जीवन का व्रत संपन्न होना अत्यंत आवश्यक है। व्रतों की शृृंंखला में भगवान शिव के लिए प्रदोष व्रत रखने का विधान भी बताया गया है। इस संसार में शिवस्मरण ही सार स्वरूप है। शिव आराधना के क्रम में प्रदोष को परम पवित्र माना गया है। दिवसावसान और रात समागम के मध्य का समय प्रदोष काल है। प्रदोषकालीन व्रत अनुष्ठान होने के कारण इसका नाम प्रदोष व्रत पड़ा। प्रदोष व्रत का अनुष्ठान त्रयोदशी तिथि को होता है। इस व्रत का निष्ठापूर्वक आचरण करने से निर्धन धनवान, मूर्ख विद्वान, पुत्रहीन पुत्रवान हो जाते हैं। भाग्यहीना बालिकाएं सुलक्षणवती, विधवाएं धर्मवती और सुहागिनें अखंड सौभाग्यवती हो जाती हैं। शास्त्रों में इस व्रत की बड़ी महिमा गाई गई है तथा लोकमानस में इसके प्रति आस्था बद्धमूल है। स्कंदपुराण के अनुसार जो लोग प्रदोष काल में अनन्य भक्तिपूर्वक भगवान सदाशिव की पूजा करते हैं, उन्हें धन-धान्य, पुत्र सुख, सौभाग्य की प्राप्ति और नित्य वृद्धि होती है। ऐसी मान्यता है कि समस्त देवतागण इस काल में भगवान शंकर के पूजन के निमित्त कैलाश शिखर पर पधारते हैं। भगवती सरस्वती वीणा बजाकर, इंद्र वंशी धारणकर, ब्रह्मा ताल देकर, महालक्ष्मी सुंदर गाना गाकर, भगवान विष्णु गंभीर मृदंग बजाकर अवस्थित रहते हैं एवं भगवान शिव की सेवा करते रहते हैं और गंधर्व, सूर्य, नाग, सिद्ध, विद्याधर, अप्सरासमूह और भक्त प्रदोष काल में भगवान शिव के पास चले आते हैं। प्रदोष व्रत का अनुष्ठान करनेवाले साधक को भोजन नहीं करना चाहिए। शाम को स्नान करके श्वेत वस्त्र धारण करना चाहिए। पूजनस्थल को स्वच्छ जल एवं गोबर से लीपकर वहां मंडप बना लेना चाहिए। उसी स्थान पर पांच रंगों के मिश्रण से पद्मपुष्प की आकृति बनाकर कुश का आसन बिछाकर उस पर पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख बैठना चाहिए। भगवान शंकर की दिव्य मूर्ति का ध्यान करना चाहिए। ध्यानकाल में एकाग्रचित संकल्प करके भगवान शंकर से निवेदन करना चाहिए कि भगवान आप संपूर्ण पापों के नाश हेतु प्रसन्न हो। शोकरूपी अग्नि में संसार के भय से भयभीत अनेक रोगों से आक्रांत इस अनाथ की रक्षा कीजिए। हे स्वामिन् आप पार्वती के साथ पधारकर मेरी पूजा ग्रहण कीजिए। मंत्र से भगवान शिव और पार्वती का आवाहन करना चाहिए। खाद्य दान आदि के पश्चात पंचामृत और शुद्ध जल से स्नान कराना चाहिए। बुधवार अमावस्या – अमावस्या तिथि को स्नान-दान-श्राद्ध करने का विशेष महत्व होता है, जो लोग अपने पितरों को प्रसन्न करना चाहें वह आज के दिन उनके निमित्त सविधि कर्मकांड द्वारा निदान करें तो सर्वाधिक लाभ प्राप्त होगा।

शुक्रवार, सूर्य ग्रहण- दिनांक १३ जुलाई २०१८ को खंड सूर्य ग्रहण लग रहा है। यह भारत में दृश्य नहीं है। यह ऑस्ट्रेलिया की सुदूर दक्षिणी भाग के अल्प क्षेत्रों में दिखाई देगा। सूर्य ग्रहण भारतीय समय अनुसार सुबह ७:१८ से प्रारंभ होगा। इसका मध्यकाल सुबह ८:३१ पर तथा इसकी समाप्ति दिन में ९:४३ पर होगा।