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व्रत शुद्धिकरण की पहली सीढ़ी है!

रविवार- पुरुषोत्तमी एकादशी व्रत-
व्रत शब्द संकल्प का पर्याय है। मन को निश्चित दिशा देने के लिए दृढ़ता लाने का जो विधि-विधान है, वही शुभसंकल्प व्रत है। शास्त्र सम्मत है कि व्रतों में एकादशी का व्रत करनेवालों को सभी प्रकार का सुख प्राप्त होता है। हमारे धर्म शास्त्रों में व्रतों की लंबी श्रृंखला भी है, जिसमें समय-समय पर व्रत की उपयोगिता के विषय में हमारे ऋषियों-मुनियों ने हम लोगों का मार्गदर्शन भी किया है। इसी कड़ी में एकादशी व्रत का अपना विशेष महत्व पुराणों में विधिपूर्वक बताया गया है। व्रत शुद्धिकरण की पहली सीढ़ी है। आत्मशुद्धि के लिए व्रतों की भूमिका महत्वपूर्ण है। ऋषि-मुनियों के विचार हैं कि यदि महीने में मात्र दोनों एकादशी का व्रत विधि-विधान से किया जाए तो मनुष्य की प्रकृति पूर्णतया शुद्ध एवं सात्विक हो जाती है।
राजा वीरबाहु के पूछने पर महर्षि भारद्वाज ने एकादशी व्रत का विधान उन्हें विस्तृत रूप से बताया था। भारद्वाज जी ने कहा था कि जो मनुष्य एकादशी व्रत करना चाहे तो वह दशमी को शुद्ध चित्त हो दिन के आठवें भाग में सूर्य का प्रकाश रहने पर भोजन करें। रात्रि में भोजन न करें। दशमी को उड़द, मसूर, चना, साग, शहद, दूसरे का अन्न, दो बार भोजन और मैथुन का त्याग कर दे। एकादशी के दिन बार-बार जलपान करना, हिंसा, असत्य भाषण, पान चबाना, दातुन करना, दिन में सोना, जुआ खेलना, रात में सोना और पतित मनुष्यों से वार्तालाप जैसी क्रियाओं को त्याग देना चाहिए। स्नान-पूजन आदि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर भगवान से प्रार्थना करें ‘केशव आज आपकी प्रसन्नता के लिए दिन और रात में संयम-नियम का मेरे द्वारा पालन हो, ऐसा मुझे आशीर्वाद दीजिए। मेरी सोई हुई इंद्रियों के द्वारा कोई क्रिया हो जाए तो आप पुरुषोत्तम हमें क्षमा करिएगा।’ एकादशी की रात्रि में एकादशी कथा का श्रवण करना सर्वोत्तम माना गया है। भगवान का पूजन, प्रदक्षिणा नमस्कार, गीता और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। दशमी और एकादशी को त्यागी हुई क्रियाओं सहित द्वादशी को शरीर में तेल भी न लगाएं। द्वादशी को शुद्ध चित्त होकर भगवान से प्रार्थना करें ‘हे गरुड़ध्वज आज सब पापों का नाश करनेवाली पुण्यमई पवित्र द्वादशी तिथि मेरे लिए प्राप्त हुई है इसमें मैं पारण करूंगा। आप प्रसन्न होइए।’ ब्राह्मण को भोजन कराकर स्वयं भोजन कर लें। इस प्रकार वर्षपर्यंत एकादशी का व्रत करना चाहिए। पुरुषोत्तमी एकादशी व्रत करनेवाले व्रती को मरणोपरांत वैकुंठ लोक की प्राप्ति अवश्य होती है।

पंचांग
सोमवार २१ सितंबर- अधिक आश्विन मास शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि प्रातः ७:२८ तक तदुपरांत पंचमी तिथि प्रारंभ, श्रीनारायण गुरु समाधि दिवस (केरल), भद्रा प्रातः ७:२८ तक।
मंगलवार २२ सितंबर- अधिक आश्विन मास शुक्लपक्ष की षष्ठी तिथि रात्रि ३:०१ तक।
बुधवार २३ सितंबर – अधिक आश्विन मास शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि रात्रि १:०७ तक, राष्ट्रीय आश्विन मास प्रारंभ, भद्रा रात्रि १:०७ से प्रारंभ।
बृहस्पतिवार २४ सितंबर- अधिक आश्विन मास शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि रात्रि ११:३४ तक, भद्रा दिन में १२:२० तक।
शुक्रवार २५ सितंबर- अधिक आश्विन मास शुक्लपक्ष की नवमी तिथि रात्रि १०:२४ तक।
शनिवार २६ सितंबर- अधिक आश्विन मास शुक्लपक्ष की दशमी तिथि रात्रि ९:४० तक।
रविवार २७ सितंबर- अधिक आश्विन मास शुक्लपक्ष की एकादशी तिथि रात ९:३० तक, पुरुषोत्तमी एकादशी व्रत, भद्रा दिन में ९:३३ से रात्रि ९:२५ तक।