शांति का स्थल बने आह का ठिकाना नहीं

देश में जारी आम चुनाव के बीच सऊदी अरब से आई एक खबर दबकर रह गई जो मुस्लिम समाज से जुड़ी थी। खबर के मुताबिक सऊदी अरब ने अपने ही देश के ३७ लोगों के सिर कलम कर दिए। रूढ़िवादी राजशाही में आम तौर पर मौत की सजा सिर कलम करके ही दी जाती है। आतंकवादी और चरमपंथी विचारधारा अपनाने, सुरक्षा को अस्थिर करने, सरकार के विरोध में प्रदर्शन करने और आतंकवादी प्रकोष्ठ बनाने के आरोप में इन लोगों को मौत की सजा दी गई। गौरतलब है कि सऊदी अरब में राजनीतिक असंतोष और इससे जुड़ी गतिविधियों को भी आतंकवाद की श्रेणी में रखा जाता है। इसकी सजा मौत ही मुकर्रर है। उन्हें ये सजा रियाद, मक्का और मदीना, कासिम प्रांत और पूर्वी प्रांत में दी गई। सऊदी अरब का कहना है कि ये फैसला सबूतों के आधार पर शाही आदेश और कोर्ट की सहमति से लिया गया। आतंकवाद और दंगे भड़काने जैसे आरोप अक्सर सुन्नी बहुल सऊदी अरब में शिया कार्यकर्ताओं के खिलाफ लगाए जाते रहे हैं। मानवाधिकारों के लिए काम कर रही संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस बात की तरफ इशारा किया कि जिन लोगों को मौत की सजा दी गई, उन्हें फर्जी मुकदमों में फंसाया गया। उन्हें यातनाएं देकर उनसे बलपूर्वक लिए बयानों के आधार पर कार्रवाई की गई। एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक यह कार्रवाई न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मानकों का उल्लंघन है बल्कि इससे पता चलता है कि सऊदी अरब किस तरह से शिया मुसलमानों का असंतोष दबाने के लिए मौत की सजा का राजनीतिक इस्तेमाल कर रहा है।
आंकड़ों के अनुसार सऊदी अरब में इस साल की शुरुआत से लेकर अब तक कम से कम १०० लोगों को मौत की सजा दी जा चुकी है। अनेक शिया कार्यकर्ताओं को फांसी की सजा दी गई है। इससे पहले साल २०१६ में भी सऊदी ने आतंकवाद के जुर्म में ४७ लोगों को मौत की सजा दी थी। इसमें मशहूर शिया आलिम निम्र अल निम्र भी शामिल थे। इस पर ईरान ने सऊदी अरब को खूब खरी-खरी सुनाई थी। दरअसल ईरान के साथ असहज रिश्तों की बुनियाद पर खासकर शिया मुसलमानों को मौत की सजा देने के आरोप सऊदी अरब पर लगते रहे हैं। सऊदी अरब में प्रदर्शन करना या फिर राजनीतिक पार्टियों का गठन पूरी तरह से प्रतिबंधित है। पिछले कुछ सालों में दर्जनों मौलवी, बुद्धिजीवी, कई प्रदर्शनकारी लेखक और सामाजिक कार्यकर्ताओं को मौत की सजा मिल चुकी है। इसमें महिलाएं भी शामिल हैं जो रूढ़िवादी मुस्लिम देश में महिलाओं की ड्राइव के लिए अभियान चला रही थीं। सऊदी अरब में पूर्ण राजशाही शासन है। ऐसे में सऊदी अरब में एक मखसूस तबके के लोगों को मौत की सजा देने पर सवाल उठना स्वाभाविक है। मुस्लिम समाज भी इस घटना से हतप्रभ है। दक्षिणपंथी समूहों के मुताबिक यह सब राजनीति से प्रेरित होता है। क्षेत्रीय दुश्मन और शिया ताकत ईरान के साथ तनाव बढ़ने के नजरिए से भी इसे देखा जा रहा है। शिया समुदाय के पक्ष में विश्व का कोई बड़ा मुल्क सऊदी अरब की मुखालिफत में खड़ा नहीं हुआ है, इस बात से भी शिया समुदाय में नाराजगी है।
एक अनुमान के अनुसार, शियाओं की संख्या मुस्लिम आबादी की १० प्रतिशत यानी १२ से १७ करोड़ के बीच है। ईरान, इराक, बहरीन, अजरबैजान और कुछ आंकड़ों के अनुसार यमन में शियाओं का बहुमत है। इसके अलावा, अफगानिस्तान, हिंदुस्थान, कुवैत, लेबनान, पाकिस्तान, कतर, सीरिया, तुर्की, सऊदी अरब और यूनाइडेट अरब ऑफ अमीरात में भी इनकी अच्छी खासी संख्या है। उन देशों में जहां सुन्नियों की सरकारें हैं, वहां शियाओं के प्रति भेदभाव आम बात है। कुछ चरमपंथी सुन्नी सिद्धांतों ने शियाओं के खिलाफ घृणा को बढ़ावा दिया है। साल १९७९ की ईरानी क्रांति से उग्र शिया इस्लामी एजेंडे की शुरुआत हुई। इसे सुन्नी सरकारों के लिए चुनौती के रूप में माना गया, खासकर खाड़ी के देशों के लिए। ईरान ने अपनी सीमाओं के बाहर शिया लड़ाकों और पार्टियों को समर्थन दिया, जिसे खाड़ी के देशों ने चुनौती के रूप में लिया। खाड़ी देशों ने भी सुन्नी संगठनों को इसी तरह मजबूत किया, जिससे सुन्नी सरकारों और विदेशों में सुन्नी आंदोलन से उनसे संपर्क और मजबूत हुए। लेबनान में गृहयुद्ध के दौरान शियाओं ने हिज्बुल्ला की सैन्य कार्रवाइयों के कारण राजनीतिक रूप में मजबूती हासिल कर ली। पाकिस्तान और अफगानिस्तान में तालिबान जैसे कट्टरपंथी सुन्नी संगठन अक्सर शियाओं के धार्मिक स्थानों को निशाना बनाते रहे हैं। ईरान और इराक के बीच अस्सी के दशक में चली लंबी लड़ाई भी सुन्नी-शिया टकराव के तौर पर देखा जा सकता है।
मध्य-पूर्व में दो बड़ी ताकतें हैं, ईरान और सऊदी अरब। इन दोनों के आपसी रिश्ते काफी कटु हैं और दोनों ही पूरे क्षेत्र में अपने प्रभाव का विस्तार करने में जुटे हैं इसलिए बार-बार टकराव की स्थितियां पैदा होती हैं। सऊदी अरब कट्टरपंथी सुन्नी वहाबी इस्लाम का गढ़ है। हालांकि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने कई सामाजिक और आर्थिक सुधारों को लागू कर विश्वभर को बदलाव का संकेत दिया है जबकि ईरान शिया बहुल देश है। दोनों ही देशों की राजनीति और कूटनीति में धर्म ही केंद्र में है। पूरी दुनिया में सऊदी अरब खुद को सुन्नी मुसलमानों का रहनुमा मानता है तो ईरान खुद को शिया मुसलमानों का झंडाबरदार मानता है। सऊदी अरब खुद को इस धार्मिक आधार पर मुस्लिम देशों का अगुआ मानता है कि मक्का-मदीना उनके यहां है। एक आधार और भी है कि उसके पास पूरी दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है और वह अमेरिका का दोस्त है। ईरान के संबंध न तो अमेरिका से ठीक रहे हैं, न ही सऊदी अरब से। सऊदी अरब को डर है कि ईरान मध्य-पूर्व पर हावी होना चाहता है इसीलिए वह शिया नेतृत्व में बढ़ती भागीदारी और प्रभाववाले क्षेत्र की शक्ति का विरोध करता है। ये भी समझने की बात है कि एक ही क्षेत्र में रहने के बावजूद सांस्कृतिक तौर पर अरब और ईरानी काफी अलग रहे हैं।
ईरान और सऊदी अरब के बीच अविश्वास में एक बड़ा पैâक्टर अमेरिका है। सऊदी अरब अमेरिकी हथियारों के सबसे बड़े खरीदारों में है। सुरक्षा सहित अपनी कई जरूरतों के लिए सऊदी अरब अमेरिका पर निर्भर है जबकि ईरान और अमेरिका के बीच राजनयिक संबंध नहीं हैं। दूसरी ओर ईरान बहुत सारे मामलों में आत्मनिर्भर रहा है और उसने तमाम प्रतिबंधों और दबावों के बीच स्वतंत्र रूप से अपना परमाणु कार्यक्रम भी चलाए रखा है। सऊदी अरब और ईरान के बीच अगर टकराव बढ़ता रहा तो जाहिर है कि इसके कई दूरगामी परिणाम होंगे। अमेरिका की पुश्तपनाही ने सऊदी अरब को और निरंकुश किया है। जब इस्लामी मुल्कों में एकता की बात की जाती है तब ईरान के बिना इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसे में केवल ईरान को दबाने के लिए शिया मुसलमानों को एक के बाद एक अलग-अलग आरोप लगाकर सऊदी अरब में मौत के घाट उतारना गलत है। मुस्लिम विश्व को इस विषय पर सऊदी अरब से दो टूक बात करने की जरूरत है। अमेरिका का पिट्ठू बनकर रहने से सऊदी अरब को लाभ कम, हानि ज्यादा हो रही है। इस बुनियाद पर एक दिन मुस्लिम मुमालिक का यह मुखिया अपनी विश्वसनीयता खो देगा।
एक बात और, धर्म की व्याख्या करने का अधिकार अगर सुन्नियों को है तो शिया समुदाय को भी उतना ही हक है। बहुमत और राजशाही के नाम पर शिया बिरादरी पर जुल्म कहीं से जायज नहीं है। अगर वह सुन्नी बहुल देश में कमजोर और मजलूम हैं तो इसकी जिम्मेदार वहां की सरकारें और राजशाही घराने हैं और याद रहे, इस्लाम में कमजोर पर जुल्म करना सख्त गुनाह है। पैगंबर मोहम्मद साहब ने जालिम के लिए सख्त अजाब की पेशनगोई की है। क्या पैगंबर मोहम्मद साहब की जन्मस्थली पर जुल्म और अन्याय के लिए कोई जगह हो सकती है? कत्तई नहीं। राजनैतिक मुद्दों को फिरकावाराना रंग देते रहने से एक दिन सऊदी अरब खुद ही अलग-थलग पड़ जाएगा। इस बात से सऊदी अरब को भी वाकिफ होना चाहिए। राजनैतिक स्वार्थ के लिए शिया समुदाय के सर कलम करने का सिलसिला रोक कर सच्चे इस्लामी मुल्क होने का सबूत सऊदी अरब को ही देने की जरूरत है क्योंकि मक्का-मदीना जैसे इस्लामी पवित्र तीर्थस्थल और पैगंबर मोहम्मद साहब की यह जन्मस्थली सबके लिए प्रेम और सौहार्द का सबसे बड़ा प्रतीक है इसलिए इस्लामी नजरिए से सऊदी अरब को शांति का स्थल होना चाहिए न कि मजलूमों की आहों का ठिकाना।