" /> शांत चित्त में ही सारे सृजन संभव!

शांत चित्त में ही सारे सृजन संभव!

 

विश्व अशांत है। कोरोना महामारी से विश्व मानवता पर व्यथित है। दुनिया भयग्रस्त है। मृत्यु सामने है। चिकित्सा विज्ञान के सामने अभूतपूर्व चुनौती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी संकट में है और अशांत है। इस सबके बावजूद चीन और अमेरिका आमने सामने हैं। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादी कोरोना की चिंता नहीं करते। वे भी सक्रिय हैं। अमेरिका में पुलिस ने निर्दोष अश्वेत की हत्या की। दुनिया को मानवाधिकार का पाठ पढ़ाने वाले अमेरिका में कर्फ्यू है। प्रकृति के घटक अशांत हैं। अंतरिक्ष तक अशांति का वातावरण है। प. बंगाल में भयानक तूफान आया। राहत की घोषणा हुई कि मुम्बई में भी तूफान ने धावा बोला। टिड्डी दल ने भी हमले के लिए यही आपत्काल चुना। प्रसन्नता देने वाली खबरों का अकाल है। चित्त उद्विग्न है।

दुनिया तनावग्रस्त है। कहते हैं कि आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों के चलते दुनिया ग्लोबल-विलेज या विश्व ग्राम बन गई है। निस्संदेह तकनीकी ने भौगोलिक दूरी को समय के आयाम में घटाया है। माना जाता है कि समय की बचत हो रही है। लेकिन वास्तविक अनुभूति ऐसी नहीं है। तमाम सुविधाओं के बावजूद आधुनिक मनुष्य के पास समय की कमी है। चित्त की शांति का अता पता नहीं। मानव मन बेचैन है। निद्रा घटी है। अनिद्रा के रोगी बढ़े हैं। अशांति भूमण्डलीय यथार्थ है। जो समृद्ध हैं वे समृद्धि के कारण अशांत हैं और जो अभावग्रस्त हैं, वे अभाव की व्यथा में अशांत हैं। वैदिक काल का समाज प्रकृति के प्रति आदर भाव से युक्त था। शांति सहज उपलब्ध थी। शांत चित्त में ही रसपूर्ण ज्ञानपूर्ण वैदिक साहित्य व उल्लासपूर्ण समाज का विकास हुआ था।

शांत चित्त में ही सारे सृजन संभव हैं। सृजनात्मकता के लिए चित्त की शांति जरूरी है। शांति के कारण हमारे भीतर भी है। लेकिन अशान्ति के कारण बाह्य जगत् में भी होते हैं। शांत वातायन आनंदित करते हैं। वन उपवन अशान्त मनुष्य को भी शांत करते हैं। वैदिक ऋषि इस तथ्य से अवगत थे। वे सम्पूर्णता में सोचते थे। अशान्त अंतरिक्ष भी हमारी अशान्ति का कारण बन सकता है। पृथ्वी माता है। इसकी अशान्ति हम सबको अशान्त करेगी ही, करती भी है। यजुर्वेद के एक मंत्र में समूचे वातायन को शान्तिमय बनाने की स्तुति है। ‘शान्तिमंत्र’ के नाम से लोकप्रिय यह मंत्र ‘द्यौशान्तिरन्तरिक्ष शान्ति, पृथ्वी शान्ति’ से प्रारम्भ होता है। यहां द्युलोक, अंतरिक्ष और पृथ्वी से शान्ति की प्रार्थना है। आगे कहते हैं ‘आपः शान्तिरोषधयः शान्ति, वनस्पतया शान्तिर्विश्वेदेवा शान्ति, ब्रह्म शान्ति, सर्व शान्ति शान्तिरेव शान्ति सा मा शान्तिरेधि – जल शान्ति दें, औषधियां वनस्पतियां शान्ति दें, प्रकृति की शक्तियां – विश्वदेव, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड शान्ति दे। सब तरफ शान्ति हो, शान्ति भी हमें शान्ति दे।’ (यजुर्वेद ३६.१७) यहां शान्ति भी एक देवता हैं।

पृथ्वी अशांत है। पर्यावरण का नाश है। तूफान हैं। भूमण्डलीय ताप है। पृथ्वी से लेकर आकाश तक की शांति जरूरी है। वनस्पतियां पृथ्वी का भाग हैं। उनका प्रशांत होना हम सबके लिए आनंदवर्द्धन है। अथर्ववेद (१९.९.१४) का शांतिपाठ मननीय है। इसमें सम्पूर्ण अस्तित्व से अस्तित्व के प्रत्येक घटक के लिए शांति की प्रार्थना है। कहते हैं, ‘पृथ्वी शान्ति। अंतरिक्ष शांति। शार्तिर्घो, शांति। आपः शांति। औषधय शान्तिर्वनस्तपयः-पृथ्वी अंतरिक्ष घुलोक, जल, औषधियां शांति पूर्ण हो।’ यहां शांति समूचे अस्तित्व में व्यापक व विस्तीर्ण हैं। इसी प्रार्थना में कहते हैं, ‘विश्व की सभी दिव्य शक्तियां-देव हमारे अनुकूल शांति दाता हों।’ यहां काव्य का शिखर है और शान्ति की अभिलाषा ब्रह्माण्ड व्यापी है।

प्रिय कथन प्रीतिपूर्ण होते हैं। वैदिक साहित्य में वे ‘सूक्त’ है। सूक्त वस्तुतः सु-उक्त या सुंदर कथन वचन हैं। अपशब्द का परिणाम अशान्ति है। यहां सरस्वती से प्रार्थना है कि हमारे द्वारा बोले गये अपशब्दों से हमारी रक्षा करें। शब्द शान्तिदाता हों।’ (वही ३) आधुनिक भारत में शब्द अराजकता है। सोशल मीडिया में प्रतिदिन करोड़ों शब्दों की आवाजाही है। शब्द अपशब्द एक हो गए हैं। अथर्ववेद के अनेक प्रसंगों में वाणी की मधुरता पर जोर है। ‘मधुवचनों’ जैसे शब्द कई बार आए हैं। कटुवचनों से समाज में कलह का वातावरण बनता है। शान्ति सूक्त में कटुवचनों के प्रभाव से बचने की प्रार्थना है। प्रार्थना का केन्द्र मन है और संकल्प का भी। प्रार्थना से संकल्प सिद्धि का यही रहस्य है। प्रार्थना मन की गतिविधि बदलती है।

प्रशान्त चित्त उर्वर होता है। ऐसे चित्त में मधुप्रीति उगती है। यहीं मधुमयता की गाढ़ी अनुभूति मिलती है। कोई कह सकता है कि शान्ति एक अमूर्त विचार है। एक कल्पना या धारणा। मनोविज्ञान की दृष्टि में चित्त की एक विशेष दशा – स्टेट आफ माइंड का नाम शांति है। शान्ति किसी भी पदार्थ या वस्तु से अधिक मूल्यवान है। शान्ति सकारात्मक स्थिति है। अशान्ति का न होना शान्ति नहीं है। अशान्ति भिन्न चित्तदशा है। अशान्त लोग अपने प्रिय भौतिक पदार्थ और वस्तुएं भी तोड़ने लगते हैं। वे अपना माथा भी पीटते हैं। प्रशांत लोग कुर्सी, कप या मेज को भी प्रीति प्यार से सहलाते हैं, वस्तुएं तब मित्र या जीवंत प्राणी होती हैं। उनमें भी काव्य प्रत्यक्ष होता है। वैदिक ऋषि इसीलिए शान्ति से भी शान्ति की स्तुतियां करते थे। काल विभाजन में भविष्य का अस्तित्व माना जाता है। भविष्य की आशंका भी अशांतिदायी हाती है।

भय अशान्तिकारी है। भय भविष्य के अनिष्ट की आशंका है। यह अनिष्ट घटने के पूर्व ही व्यथित करता है। उद्विग्न करता है, बेचैन बनाता है। अशांत करता है। जो घटित नहीं हुआ, उसका प्रभाव ही भय है। भय की मनोदशा अतिरिक्त व्यथा देती है। अथर्ववेद में अभय की मनोदशा की प्राप्ति के लिए भी स्तुति की गई है। अथर्वा रचित अभय सूक्त (१९.१६) में स्तुति है, ‘‘हमारे सामने शत्रु न हों। हम पृष्ठ भाग से अभय रहें-पश्चान्नो अभयं कृतं। दक्षिण में सविता देव व उत्तर में इन्द्र हमारा संरक्षण करें।’’ ऋषि अथर्वा अनिष्ट की संभावना वाले भय को मिटाने के लिए कृत संकल्प है। अभय अस्तित्व पर प्रगाढ़ विश्वास है। अस्तित्व गल्ती नहीं करता। अथर्वा अस्तित्व की सभी शक्तियों से प्रार्थना करते हैं, ‘आदित्य देव द्युलोक से हमारा संरक्षण करें। अग्नि देव कृपा करें। वे पृथ्वी पर हमारे अनिष्ट दूर करें। अश्विनी देव सब तरफ से सुख दें।’ (वही २) भय अशान्ति का स्रोत है। अथर्वा स्वीकार करते हैं कि ‘वे भयग्रस्त हैं, हमें अभय करें – अभयं कृधि। (१९.१५.१)

ऋषि अथर्वा भय के मनोविज्ञान से परिचित थे। वे लोकहित में ही अपना उदाहरण देकर स्वयं को भयग्रस्त बताते हैं। उनका ध्येय लोकमंगल है। भय अशान्ति का स्रोत है। अशान्ति जीवन की सामान्य गतिविधियों के संचालन में भी बाधक है। तब जीवन के लिए आवश्यक सत्कर्म भी संभव नहीं होते। अशांत मनुष्य को संसार के भोग भी सुख नहीं देते। तप, योग, ज्ञान, उपासना भी अशांत मन से नहीं सधते। अध्ययन चिंतन मनन पवित्र कर्म हैं। अशांत चित्त से अध्ययन चिंतन भी असंभव हैं। तब ऋचा मंत्र भी अपना प्रभाव नहीं डालते। उपनिषद् प्रबोधन के पूर्व शान्तिपाठ की परम्परा थी। प्रत्येक उपनिषद् के प्रारम्भ में शांति पाठ है। शान्ति उपास्य है। शान्ति मनुष्य के सभी कर्मो को गति देने वाली प्रियतम मनोदशा है। हम सबको शान्ति की प्राप्ति हो।