" /> शिवसेना की ऊर्जा बालासाहेब

शिवसेना की ऊर्जा बालासाहेब

राजनीति का इतना प्रगल्भ ज्ञान रखनेवाला और उसकी विसंगतियों, विनोद, उपहास व वक्रोक्तियों का अपनी कला में सुंदर उपयोग करनेवाला ये महान कलाकार इन सारे गुणों के साथ जन्मा था। इनके व्यक्तित्व व कृतित्व से एक बात साफ हो जाती है कि समर्पित कलाकार व श्रेष्ठ राजनेता बनाए नहीं जाते अपितु यह गुण उनमें जन्मजात होता है। नेताओं से लेकर सामान्य लोगों तक की सूक्ष्म नजर से पड़ताल करनेवाली उनकी निरीक्षण दृष्टि उनके व्यंग्य चित्रों में दिखती है। उन व्यंग्य चित्रों को देखते ही पाठक उनमें निहित व्यंग्य या संदेश समझकर आश्चर्यचकित हो जाता है। डेविड लो तथा वाल्ट डिस्ने उनके आदर्श थे तथा उनके मन में आर.के. लक्ष्मण के बारे में बेहद सम्मान था। लेकिन बालासाहेब ठाकरे अपने व्यंग्य चित्रों के जरिए महाराष्ट्र तथा देश के राजनीतिक तथा सामाजिक जीवन को आईना दिखानेवाले देश के एकमात्र व्यंग्य चित्रकार थे। जो पीढ़ी उस समय तरुण थी, उसे तो ‘मार्मिक’ के व्यंग्य चित्र अत्यंत पसंद थे। हर गुरुवार को ‘मार्मिक’ में प्रकाशित होनेवाले व्यंग्य चित्रों के बारे में ज्वलंत विषयों पर आधारित बालासाहेब के अग्रलेखों के बारे में तरुणों के साथ ज्येष्ठ लोगों में भी उत्सुकता रहा करती। कई स्कूलों की कक्षाओं में तो इसे पढ़कर सुनाया भी जाता था।
राजनेताओं के असली चेहरे का पर्दाफाश करनेवाले तथा ढोंगबाजी को उजागर करनेवाले बालासाहेब के व्यंग्य चित्र तथा अग्रलेख तो लोकप्रिय थे ही, पर मराठी लोगों पर होनेवाले अन्याय को देखकर जब बालासाहेब की लेखनी आग उगलने लगी, तब उस समय सही मायने में ‘मार्मिक’ का महत्व जनता को पता चला। नौकरियों में मराठी लोगों पर किस तरह से अन्याय हो रहा है, इसे उजागर किया ‘मार्मिक’ के स्तंभ ‘पढ़िए और चुप बैठे रहिए’- वाचा आणि थंड बसा ने। इसके बाद मुंबई के मराठी लोगों में एक साथ खलबली मच गई। मुंबई और ठाणे परिसर की अनेकों कंपनियों, कारखानों तथा कार्यालयों के अधिकारियों तथा कामगारियों की सूची उनके नाम तथा पदनाम के साथ प्रकाशित होने लगी। इस सूची की वजह से परप्रांतियों की अधिकाधिक संख्या तथा वहां पर नगण्य रूप में नौकरी करनेवाले मराठी लोग जनता की नजर में आए। ऐसी सैकड़ों कंपनियां व कार्यालय मुंबई में थे। यह चित्र स्पष्ट होने पर ‘पढ़िए और जल जाइए – वाचा आणि पेटून उठा’- इस स्तंभ का नामकरण हो गया।
१९६६ में शिवसेना की स्थापना हुई तथा मराठी लोगों का अधिकार दिलाने, उन्हें न्याय दिलानेवाली एक संस्था अस्तित्व में आई। अन्याय का प्रतिकार करनेवाला एक बेहतरीन व्यासपीठ शिवसेना के रूप में मराठी लोगों को मिल गया। धीरे-धीरे शिवसेना का भगवा तेजी से फहराने लगा। मुंबई के हरेक विभाग में शिवसेना शाखा की स्थापना हुई। शिवसेना का सिंह युक्त बोधचिह्न चप्पे-चप्पे पर झलकने लगा। शिवतीर्थ पर होनेवाली शिवसेना की प्रचंड सभाओं में बालासाहेब के साथ प्रमोद नवलकर, दत्ताजी सालवी, मनोहर जोशी, सुधीर जोशी, वामनराव महाडिक, सुभाष देसाई, छगन भुजबल आदि के अलग-अलग शैली में ओजस्वी भाषणों, बीच-बीच में अन्य पार्टियों के नेताओं की टोपियां उड़ानेवाले दादा कोंडके के धमाल विनोदी भाषणों ने श्रोताओं में ऊर्जा प्रवाहित की। बालासाहेब की सभाओं में तो सारा महाराष्ट्र उमड़ पड़ता था।
अन्य राजनीतिक पार्टियों की तुलना में शिवसेना की विशेषता यह थी कि शिवसेना ने कभी भी जाति-पाति, धर्म, संप्रदाय का भेदभाव किया नहीं। ऊंच-नीच, अमीर-गरीब का भेदभाव भी शिवसेना ने कभी नहीं किया। शिवसेना में सभी जातियों, धर्मों के शिवसैनिक थे। संगठन पर निष्ठा तथा सर्वस्व अर्पण कर समाज के लिए काम करने की वृत्ति इन दो मापदंडों पर शाखा प्रमुख, विभाग प्रमुख, नगरसेवक, महापौर, विधायक पद पर निष्ठावान शिवसैनिकों का चयन होने लगा। शिवसैनिकों को कोई पद देते समय बालासाहेब ने कभी उनसे उनकी जाति नहीं पूछी। संगठन को राजनीतिक पार्टी का दर्जा मिलने पर चुनाव में खड़े होने के लिए उम्मीदवारी देते समय उस शिवसैनिक के सामाजिक कार्यों को ही देखा गया, और कोई बात नहीं। इस वजह से आम शिवसैनिकों को नगरसेवक पद से महापौर, विधायक से मंत्री, सांसद से केंद्रीय मंत्री तक बनने का मौका मिला। मनोहर जोशी को तो लोकसभाध्यक्ष बनने का सम्मान भी प्राप्त हुआ।
जिन लोगों ने शिवसेना की स्थापना के बाद से उसे गुंडा सेना कहकर पूरे देश में उसकी छवि खराब की, ऐसे लोग निरुत्तर हो गए। शिवसेना की छवि देशभर में सुधरी। शिवसेना के बारे में लोगों की गैरसमझ अच्छी समझ में बदली। जनता की सेवा के लिए रात के १२ बजे भी तत्पर रहनेवाला शिवसैनिक मुंबईकरों का आधार बन गया। शिवसेना की एंबुलेंस रास्तों पर दिखने लगी जो आपत्तिकाल में मरीजों को तुरंत अस्पताल पहुंचाती थी। ऐसी एंबुलेंस आज भी अनेक विभागों में कार्यरत हैं। ‘८० फीसदी समाज सेवा तथा २० फीसदी राजनीति’ यह ध्येय आंखों के सामने रखकर कार्य करनेवाली शिवसेना का नाम बढ़ा दूसरी ओर सामाजिक कार्य करते समय राजनीति का अड़ंगा लग रहा है, ये ध्यान में आते ही समाज की बेहतरी के लिए राजनीति में सक्रिय होना पड़ा और अब राजनीति सिर्फ अपनी ही बपौती है, ऐसी धारणा रखनेवाली राजनीतिक पार्टियों के मुंह पर ताला पड़ गया।
क्रमश:
(अनुवाद : राजेश विक्रांत)