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शिवसेना की ऊर्जा बालासाहेब

बालासाहेब ने मुंबई समेत पूरे महाराष्ट्र में शिवसेना की शाखाओं की स्थापना शुरुआत से ही सुव्यवस्थित ढंग से की थी। मुंबई के प्रत्येक विभागों तथा ग्रामीण महाराष्ट्र के जिलों, तहसीलों तथा गांवों में स्थापित की गई शिवसेना की शाखाएं स्थानीय जनता की समस्याओं का समाधान करनेवाले केंद्र के रूप में उभर गर्इं। शिवसेना की संरचना बालासाहेब ने काफी सोच-विचार कर ऐसी बनाई थी कि शाखा का पदनुक्रम मजबूत रहे और यही कारण है कि देखते-देखते महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि देशभर में शिवसेना का बीज एक वटवृक्ष के रूप में बदल गया। और मराठी लोगों को नौकरियों में ८० फीसदी स्थान देने की मांग तत्कालीन सरकार को माननी पड़ी। शिवसेना की स्थानीय लोकाधिकार समिति ने बैंकों, बीमा कंपनियों तथा अन्य सरकारी, अर्धसरकारी निगमों-उपक्रमों में इस मांग को लागू करने के लिए काफी प्रयास किया। इसका सुपरिणाम यह रहा कि हजारों सुशिक्षित बेरोजगारों को नौकरियां मिलीं। कामगार सेना, विद्यार्थी सेना, चित्रपट शाखा, माथाड़ी कामगार सेना आदि सरीखी शिवसेना की संबंधित शाखाओं ने अपने-अपने क्षेत्र में कार्यरत लोगों को न्याय व हक दिलानेवाले संगठन के रूप में ख्याति पाई। मराठी लोगों को शिवसेना के रूप में अधिकार का एक आधार मिला। जाति-पाति विरहित शिवसेना की प्रचंड एकजुटता सच्चे अर्थों में महाराष्ट्र धर्म का आविष्कार बन गई।
शिवसेना के मुखपत्र दैनिक ‘सामना’ की २३ जनवरी, १९८९ को शुुरुआत होने से शिवसेना का प्रचार तथा प्रसार पूरे महाराष्ट्र में तूफान की तरह होने लगा। बालासाहेब के विचार अधिकार की व्यासपीठ से साबित किए जाने लगे। शिवतीर्थ पर होनेवाला शिवसेना का भव्य मेला तो युवावर्ग के लिए सबसे बड़ा आकर्षण बन गया। जिस दिन सभा होती थी उस दिन मुंबई समेत महाराष्ट्र के सभी इलाकों से युवकों की टोली भगवा झंडा फहराते तथा ‘शिवसेना जिंदाबाद’ तथा ‘बालासाहेब ठाकरे जिंदाबाद’ के गगनभेदी नारे लगाते हुए, गाते-बजाते, अबीर-गुलाल उड़ाते एकदम अनुशासनबद्ध तरीके से शिवतीर्थ पर आते तो यह बेहद मनमोहक दृश्य होता। फिर ये जनसमूह शिवतीर्थ पर यथास्थान विराजता। समय पर आतिशबाजियों की आसमानी गूंज के बीच शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे के आगमन पर शिवसेना के नेताओं के भाषणों की तोपें गरजती रहतीं। इसके पीछे भी तो बालासाहेब की ही ऊर्जा होती थी।
बालासाहेब के माईक के सामने आने के पहले फिर से आतिशबाजियां गूंजतीं, उस गूंज के दौरान ‘यहां पर उपस्थित मेरे सभी हिंदू भाइयों, बहनों तथा माताओं’ जैसे ही बालासाहेब के श्रीमुख से ये शब्द निकलते वैसे ही आतिशबाजियों की आवाज हवा में विलीन हो जाती और बालासाहेब के स्पष्ट व ज्वलंत विचारों से पूरा माहौल गूंजने लगता।
बालासाहेब के भाषण देने की शैली अप्रतिम थी। उनकी अपनी खास शैली। इस शैली की तुलना अन्य किसी राजनेता से नहीं की जा सकती। उनके वक्तव्य में हंसी-ठहाके, गंभीरता, व्यंग्य की अनुपम चाशनी मिली होती थी। अन्य नेताओं पर उनके तीर अद्भुत होते थे। जो श्रोताओं को गुदगदाने के साथ सोचने पर मजबूत कर देते। श्रोताओं को दीवाना बना देने की कला बालासाहेब को खूब आती थी। हकीकत में उनको जीवंत शैली तथा वत्तृâत्व कला का जो उपहार ईश्वर से प्राप्त था, वो किसी अन्य हिंदुस्थानी नेता को न कभी मिला और न कभी मिलेगा।
क्रमश:
अनुवाद : राजेश विक्रांत