" /> शिव के हैं ये १२ प्रतीक, आंसुओं से हुई रुद्राक्ष की उत्पत्ति

शिव के हैं ये १२ प्रतीक, आंसुओं से हुई रुद्राक्ष की उत्पत्ति

मस्तक पर तीसरी आंख, रुद्राक्ष, डमरू, वासुकी, चंद्रमा, गंगाष्ठ ये सभी सुनकर हमारे आंखों के सामने जिस ईष्ट की तस्वीर आती है… वो हैं बम बम भोले यानी स्वयंभू शिवशंकरष्ठ लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन प्रतीकों का मतलब क्या है। आज हम अपने पाठकों को शिवशंकर के प्रतीक चिन्हों की जानकारी दे रहे हैं और साथ ही उनका महत्व भी बता रहे हैं।

चंद्रमा: हम में से कई लोग यह जानते हैं कि शिव का एक नाम सोम भी है। सोम का अर्थ चंद्रमा होता है। इसे मन का कारक माना जाता है। ऐसे में शिव के मस्तक पर विराजित चंद्रमा मन के नियंत्रण का भी प्रतीक माना गया है।

त्रिशूल: भगवान शिव का त्रिशूल ३ प्रकार की शक्तियों यानी सत, रज और तम का प्रतीक है। वहीं, ३ प्रकार के कष्टों दैनिक, दैविक, भौतिक के विनाश का सूचक भी है। मान्यता है कि इसके सामने कोई शक्ति नहीं ठहर सकती है।

वासुकी नाग: वासुकी नाग शिव के परम भक्त थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी ने उन्हें अपने गले में रहने का वरदान दिया था। भगवान शिव के नागेश्वर ज्योतिर्लिंग नाम से भी यह साफ है कि शिव का नागों से अटूट संबंध है।

डमरु: भोलेनाथ का डमरू नाद का प्रतीक है। शिव को ही संगीत का जनक माना जाता है। वे दो तरह का नृत्य करते हैं। इसमें से एक तांडव है और दूसरा डमरू बजाते समय।

वृषभ: शिव का वाहन वृषभ है। इसका अर्थ धर्म है। वेद ने धर्म को ४ पैरों वाला प्राणी बताया है। ये ४ पैर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष माने गए हैं। ऐसे में वृषभ के ४ पैर यानी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के अधीन हैं। वृषभ को नंदी भी कहा जाता है।

जटाएं: कहा जाता है कि शिव अंतरिक्ष के देवता हैं। इन्हें व्योमकेश भी कहा जाता है। अत: आकाश उनका जटास्वरूप है।

गंगा: शिव की जटाओं से गंगा बहती हैं। इसके बाद से ही शिव को जल चढ़ाए जाने की प्रथा शुरू हुई थी। गंगा को स्वर्ग से धरती पर उतारने के समय यह सोचा गया कि गंगा का वेग इतना है कि इससे धरती में बड़ा छेद हो सकता है और अगर ऐसा होता है तो गंगा पाताल में समा जाएंगी। इसके समाधान स्वरूप ही शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया। फिर इसे धरती पर उतारा।

भस्म: शिव के शरीर पर भस्म है। यह जगत की निस्सारता है। यह आकर्षण, मोह आदि से मुक्ति का प्रतीक माना गया है। बता दें कि उज्जैन के महाकाल मंदिर में शिव की भस्म से आरती की जाती है।

तीन नेत्र: शिव की तीसरी आंख के बारे में तो हम सभी जानते हैं। इनकी तीसरी आंख हमेशा बंद रहती है लेकिन जाग्रत भी।
शिव चक्र: शंकर जी के चक्र का नाम भवरेंदु है। चक्र छोटा जरूर होता है लेकिन इसे अचूक अस्त्र माना गया है।
त्रिपुंड तिलक: शिव जी के माथे पर जो तिलक लगा है उसे त्रिपुंड कहा जाता है। यह तिलक तीन लंबी धारियों से बना है। यह त्रिलोक्य और त्रिगुण का प्रतीक माना गया है। इसके अलावा यह सतोगुण, रजोगुण और तपोगुण का भी प्रतीक माना गया है। बता दें कि त्रिपुंड सफेद चंदन का या फिर भस्म का बना होता है।

रुद्राक्ष: शिव का एक अहम प्रतीक रुद्राक्ष भी है। मान्यता है कि इनकी उत्पत्ति शिव के आंसुओं से हुई थी। ऐसा कहा जाता है कि जो इसे धारण करता है उसे सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।