" /> शिव को समर्पित मधु कृष्ण त्रयोदशी

शिव को समर्पित मधु कृष्ण त्रयोदशी

हिंदू पंचांग में महीने को कृष्ण व शुक्ल दो पक्षों में बांटा गया है। प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी के व्रत को प्रदोष व्रत कहते हैं। सूर्यास्त के पश्चात रात्रि के आने से पूर्व का समय प्रदोष काल कहलाता है। इस व्रत में महादेव भोले शंकर की पूजा की जाती है। इस व्रत में व्रती को निर्जल रहकर व्रत रखना होता है। प्रात:काल स्नान करके भगवान शिव की बेलपत्र, गंगाजल, अक्षत, धूप, दीप सहित पूजा की जाती है। संध्याकाल में पुन: स्नान करके इसी प्रकार से शिव जी की पूजा करनी चाहिए। इस प्रकार प्रदोष व्रत करने से व्रती को पुण्य मिलता है। इसमें कृष्णपक्ष की चतुर्दशी युक्त त्रयोदशी को मासिक शिवरात्रि भी कहा जाता है जबकि फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी-चतुर्दशी को महाशिवरात्रि होती है। इसी तरह चैत्र माह के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को मासिक शिवरात्रि के अलावा मधु कृष्ण त्रयोदशी भी कहते हैं। जिन जगहों पर शुक्ल प्रतिपदा से मासारंभ माना जाता है वहां यह तिथि फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी कही जाती है।
मधु कृष्ण त्रयोदशी का पर्व चैत्र माह में कृष्ण पक्ष के १३वें दिन मनाया जाता है। इस बार ये पर्व २२ मार्च को मनाया जाएगा। मधु कृष्ण त्रयोदशी का पर्व भगवान शिव को समर्पित है। कुछ भक्त दिन में एक समय उपवास करते हैं। कुछ हिंदू भक्त मधु कृष्ण त्रयोदशी के दिन अपनी इच्छानुसार पूरा दिन व्रत करते हैं। मधु कृष्ण त्रयोदशी का पर्व प्रमुख रूप से कुछ हिंदू समुदायों द्वारा हिंदुस्थान के पश्चिमी भाग में मनाया जाता है। मधु कृष्ण त्रयोदशी के दिन को मासरूमी के दिन भी मनाया जाता है। चूंकि इस वर्ष रविवार को त्रयोदशी पड़ रही है इसलिए रवि त्रयोदशी के कर्मकांड भी इस दिन किए जाएंगे।
मधु कृष्ण त्रयोदशी के संदर्भ में एक कथानक मिलता है जिसके अनुसार त्रेता युग में भगवान श्रीराम अपने वनवास काल में उत्तर दिशा से दक्षिण की ओर गमन करने के क्रम में कुम्हरी स्थित दामोदर तट पर रुके थे। उन्‍होंने दामोदर नदी में स्नान कर भगवान शिव की आराधना की थी। लोगों का यह भी मानना है कि श्रीराम द्वारा बनाया गया बालू का शिवलिंग पत्थर का बन गया था। तब से यह दिन मधु कृष्ण त्रयोदशी के रूप में मनाया जाता है। वर्तमान में चासप्रखंड के कुम्हरी गांव स्थित दामोदर नदी के बारूणी घाट पर मधु कृष्ण त्रयोदशी के दिन लोग आस्था की डुबकी लगाते हैं।
मधु कृष्ण त्रयोदशी व्रत उन तेरहवें दिनों में मनाया जाता है जो हिंदू चंद्र माह में चंद्रमा या शुक्ल पक्ष के चरण के दौरान होता है। मधु कृष्ण त्रयोदशी का उपवास आमतौर पर भगवान शिव को समर्पित होता है। इस दिन व्रत करनेवाले लोग तिल और धूप-सूखे चावलों से भगवान शिव की पूजा करते हैं। जो लोग मधु कृष्ण त्रयोदशी का व्रत करते हैं वो व्रत के दिन शहद का सेवन करते हैं।
इसी तरह रवि त्रयोदशी के बारे में कहा गया है-
आयु, बुद्धि, आरोग्यता, या चाहो संतान।
शिव पूजन विधवत् करो, दु:ख हरे भगवान
किसी समय सभी प्राणियों के हितार्थ पवित्र गंगा के तट पर ऋषि समाज द्वारा एक विशाल सभा का आयोजन किया गया, जिसमें व्यास जी के परम् प्रिय शिष्य पुराणवेत्ता सूत जी महाराज हरि कीर्तन करते हुए पधारे। शौनकादि ८८ हजार ऋषि-मुनिगण ने सूत जी को दंडवत प्रणाम किया। सूत जी ने भक्ति भाव से ऋषिगण को आशीर्वाद दे अपना स्थान ग्रहण किया। ऋषिगण ने विनीत भाव से पूछा, `हे परम् दयालु! कलियुग में शंकर भगवान की भक्ति किस आराधना द्वारा उपलब्ध होगी? कलिकाल में जब मनुष्य पाप कर्म में लिप्त हो, वेद-शास्त्र से विमुख रहेंगे। दीनजन अनेक कष्टों से त्रस्त रहेंगे। हे मुनिश्रेष्ठ! कलिकाल में सत्कर्मं में किसी की रुचि न होगी, पुण्य क्षीण हो जाएंगे एवं मनुष्य स्वत: ही असत् कर्मों की ओर प्रेरित होगा। इस पृथ्वी पर तब ज्ञानी मनुष्य का यह कर्तव्य हो जाएगा कि वह पथ से विचलित मनुष्य का मार्गदर्शन करे, अत: हे महामुने! ऐसा कौन-सा उत्तम व्रत है, जिसे करने से मनवांछित फल की प्राप्ति हो और कलिकाल के पाप शांत हो जाएं?
`सूत जी बोले-‘ हे शौनकादि ऋषिगण! आप धन्यवाद के पात्र हैं। आपके विचार प्रशंसनीय व जनकल्याणकारी हैं। आपके हृदय में सदा परहित की भावना रहती है, आप धन्य हैं। हे शौनकादि ऋषिगण! मैं उस व्रत का वर्णन करने जा रहा हूं, जिसे करने से सब पाप और कष्ट नष्ट हो जाते हैं तथा जो धन वृद्धिकारक, सुख प्रदायक, संतान व मनवांछित फल प्रदान करनेवाला है। इसे भगवान शंकर ने सती जी को सुनाया था।
`सूत जी आगे बोले-‘ आयु वृद्धि व स्वास्थ्य लाभ हेतु रवि त्रयोदशी प्रदोष का व्रत करें। इसमें प्रात: स्नान कर निराहार रहकर शिव जी का मनन करें। मंदिर जाकर शिव आराधना करें। माथे पर त्रिपुण धारण कर बेल, धूप, दीप, अक्षत व ऋतु फल अर्पित करें। रुद्राक्ष की माला से सामर्थ्यानुसार, ॐ नम: शिवाय जपे। ब्राह्मण को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा दें, तत्पश्चात मौन व्रत धारण करें। संभव हो तो यज्ञ-हवन कराएं। ॐ ह्रीं क्लीं नम: शिवाय स्वाहा मंत्र से यज्ञ-स्तुति दें। इससे अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। प्रदोष व्रत में व्रती एक बार भोजन करे और पृथ्वी पर शयन करे। इससे सर्व कार्य सिद्ध होते हैं। श्रावण मास में इस व्रत का विशेष महत्व है। सभी मनोरथ इस व्रत को करने से पूर्ण होते हैं।
व्रत कथा- एक गांव में एक दीन-हीन ब्राह्मण रहता था। उसकी धर्मनिष्ठ पत्‍नी प्रदोष व्रत करती थी। उनके एक पुत्र था। एक बार वह पुत्र गंगा स्नान को गया। दुर्भाग्यवश मार्ग में उसे चोरों ने घेर लिया और डराकर उससे पूछने लगे कि उसके पिता का गुप्त धन कहां रखा है। बालक ने दीनतापूर्वक बताया कि वे अत्यंत निर्धन और दु:खी हैं। उनके पास गुप्त धन कहां से आया। चोरों ने उसकी हालत पर तरस खाकर उसे छोड़ दिया। बालक अपनी राह हो लिया। चलते-चलते वह थककर चूर हो गया और बरगद के एक वृक्ष के नीचे सो गया। तभी उस नगर के सिपाही चोरों को खोजते हुए उसी ओर आ निकले। उन्होंने ब्राह्मण-बालक को चोर समझकर बंदी बना लिया और राजा के सामने उपस्थित किया। राजा ने उसकी बात सुने बगैर उसे कारावास में डलवा दिया। उधर बालक की माता प्रदोष व्रत कर रही थी। उसी रात्रि राजा को स्वप्न आया कि वह बालक निर्दोष है। यदि उसे नहीं छोड़ा गया तो तुम्हारा राज और वैभव नष्ट हो जाएगा। सुबह जागते ही राजा ने बालक को बुलवाया। बालक ने राजा को सच्चाई बताई। राजा ने उसके माता-पिता को दरबार में बुलवाया। उन्हें भयभीत देख राजा ने मुस्कुराते हुए कहा- `तुम्हारा बालक निर्दोष और निडर है। तुम्हारी दरिद्रता के कारण हम तुम्हें पांच गांव दान में देते हैं।’ इस तरह ब्राह्मण आनंद से रहने लगा। शिव जी की दया से उसकी दरिद्रता दूर हो गई।