" /> श्रीनगर में लगा आधा ‘दरबार’, इस बार दोनों राजधानियों में खुला है नागरिक सचिवालय

श्रीनगर में लगा आधा ‘दरबार’, इस बार दोनों राजधानियों में खुला है नागरिक सचिवालय

ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर में आज से सरकार का आधा ‘दरबार’ सज गया। एलजी गिरीश चंद्र मुर्मू, मुख्य सचिव बीवीआर सुब्रमण्यम और पुलिस महानिदेशक के अलावा ज्यादातर प्रशासनिक सचिव अब श्रीनगर से ही कामकाज संभालेंगे। हालांकि कोरोना काल को देखते हुए प्रशासनिक सचिवों को रोटेशन के आधार पर जम्मू व श्रीनगर दोनों सचिवालय में समय बिताने के लिए कहा गया है।

कोरोना काल की वजह से ही दरबार को शिफ्ट करने में इस बार दो महीने की देरी हुई है और नए फॉर्मूले के तहत जम्मू व श्रीनगर दोनों जगहों पर सचिवालय को खुला रखने का फैसला भी लिया गया है। 19 प्रशासनिक विभाग कश्मीर से काम करेंगे और 18 जम्मू से। सुबह श्रीनगर सचिवालय में एलजी को गार्ड ऑफ ऑनर पेश किया गया और इसके साथ ही कश्मीर में सरकार का दरबार आधिकारिक रूप से चलने लगा। हालांकि अनौपचारिक रूप से मई में ही श्रीनगर नागरिक सचिवालय में कामकाज शुरू हो गया था।

हालांकि पिछले 148 साल की परंपरा को इस बार कोरोना ने तोड़ डाला है। इस बार राजधानी शहर श्रीनगर में आधा ‘दरबार’ ही खुला है क्योंकि आधा दरबार जम्मू में ही है। पहली बार ऐसा है कि दोनों राजधानी शहरों में नागरिक सचिवालय कार्य कर रहे हैं। हालांकि श्रीनगर में दरबार के बहाल होने के बावजूद जम्मू में दरबार बंद नहीं हुआ और यह पहली जुलाई से क्रियाशील हो चुका है। इस बार सभी कार्यालय और विभाग श्रीनगर नहीं गए हैं। श्रीनगर में 19 विभाग और जम्मू में 18 विभागों के कार्यालय गतिशील हैं।

जानकारी के लिए जम्मू-कश्मीर में धारा 370 को हटाए जाने के बावजूद ‘दरबार मूव’ की प्रथा जारी है, जिसके तहत हर छह महीने के बाद राजधानी बदल जाती है। इसी परंपरा के तहत इस बार पहले यह निर्देश जारी हुआ था कि नई परंपरा के तहत दरबार मूव को स्थगित करते हुए दोनों राजधानी शहरों में अलग-अलग सचिवालय काम करते रहेंगे, पर कश्मीरी नेताओं के विरोध के बाद प्रशासन ने अपने आदेश को वापस ले लिया था।

जानकारी के लिए तंगहाली के दौर से गुजर रहे जम्मू-कश्मीर में दरबार मूव पर सालाना खर्च होनेवाला 600 करोड़ रुपए वित्तीय मुश्किलों को बढ़ाता है। सुरक्षा खर्च मिलाकर यह 900-1200 करोड़ रुपए से अधिक हो जाता है। दरबार मूव के लिए दोनों राजधानियों में स्थायी व्यवस्था करने पर भी अब तक अरबों रुपए खर्च हो चुके हैं।

जम्मू-कश्मीर में दरबार मूव की शुरूआत महाराजा रणवीर सिंह ने 1872 में बेहतर शासन के लिए की थी। कश्मीर, जम्मू से करीब 300 किमी दूरी पर था, ऐसे में यह व्यवस्था बनाई कि दरबार गर्मियों में कश्मीर व सर्दियों में जम्मू में रहेगा। 19वीं शताब्दी में दरबार को 300 किमी दूर ले जाना एक जटिल प्रक्रिया थी व यातायात के कम साधन होने के कारण इसमें काफी समय लगता था। अप्रैल महीने में जम्मू में गर्मी शुरू होते ही महाराजा का काफिला श्रीनगर के लिए निकल पड़ता था। महाराजा का दरबार अक्टूबर महीने तक कश्मीर में ही रहता था। जम्मू से कश्मीर की दूरी को देखते हुए डोगरा शासकों ने शासन को ही कश्मीर तक ले जाने की व्यवस्था को वर्ष 1947 तक बदस्तूर जारी रखा। जब 26 अक्टूबर, 1947 को राज्य का देश के साथ विलय हुआ तो राज्य सरकार ने कई पुरानी व्यवस्थाएं बदल लीं लेकिन दरबार मूव जारी रखा था।