" /> श्रीहरि की कृपा पाने का अवसर है पुरुषोत्तम मास

श्रीहरि की कृपा पाने का अवसर है पुरुषोत्तम मास

खरमास कल से ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सूर्य जब मीन राशि में होता है तो उस समय को खर मास कहते हैं। इस बार १४ मार्च, शनिवार को सूर्य के मीन राशि में जाते ही खर मास शुरू हो जाएगा, जो १३ अप्रैल, २०२० (सोमवार) तक रहेगा। धर्म ग्रंथों के अनुसार खर (मल) मास को भगवान पुरुषोत्तम ने अपना नाम दिया है। इसलिए इसे पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं। इसे श्रीहरि भगवान विष्णु की कृपा पाने का श्रेष्ठ अवसर माना गया है। इस मास में भगवान विष्णु की आराधना करने का विशेष महत्व है।
इस महीने में तीर्थों, घरों व मंदिरों में जगह-जगह भगवान की कथा होनी चाहिए। होली पर्व के समापन के बाद अब १३ मार्च से खरमास शुरू हो जाएगा। १४ अप्रैल तक खरमास में शादी-विवाह जैसे शुभ कार्य बंद हो जाएंगे। इन दिनों में भगवान विष्णु की आराधना करने से विशेष पुण्य मिलता है। सूर्य बृहस्पति की राशि धनु व मीन राशि में प्रवेश करता है तो यह अवधि खरमास के नाम से जानी जाती है। हर साल करीब एक महीना खरमास का होता है। इसे पौष मास भी कहा जाता है।
भगवान भास्कर से है खरमास का संबंध
धर्मग्रंथों के अनुसार इस मास में सुबह सूर्योदय से पहले उठकर शौच, स्नान, संध्या आदि करके भगवान का स्मरण करना चाहिए और पुरुषोत्तम मास के नियम पूरे करने चाहिए। इससे भगवान की कृपा बनी रहती है। खरमास या मलमास का सूर्य से भी संबंध है इसलिए इन दिनों में सूर्य उपासना के साथ दान, धर्म और उपासना का विशेष महत्व बताया गया है। शास्त्रोक्त मान्यता है कि सूर्यदेव की उपासना से यश, कीर्ति, वैभव और मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। इसलिए सूर्य उपासना का बड़ा महत्व बताया गया है।
न करें ये काम
खरमास में किसी भी तरह का कोई मांगलिक कार्य न करें, जैसे शादी, सगाई, वधू प्रवेश, द्विरागमन, गृह प्रवेश, गृह निर्माण, नए व्यापार का आरंभ आदि। मांगलिक कार्यों के सिद्ध होने के लिए गुरु का प्रबल होना बहुत जरूरी है। बृहस्पति जीवन के वैवाहिक सुख और संतान देनेवाला होता है।
खरमास में शुरू होगी नवरात्रि
खरमास के महीने में ही मां दुर्गा की आराधना भी शुरू होगी। आचार्य एसएस नागपाल ने बताया कि २५ मार्च को कलश स्थापना के साथ ही मां का गुणगान शुरू होगा। चैत्र नवरात्रि की नवमी दो अप्रैल को पड़ेगी।
भगवान सूर्यदेव के सात घोड़ों से जुड़ा है कथानक
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान सूर्यदेव सात घोड़ों के रथ पर सवार होकर पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा करते हैं। मान्यता है कि उनकी परिक्रमा रुकेगी तो सृष्टि का जन जीवन अस्त-व्यस्त हो जाएगा। लगातार चलते रहने से घोड़े भूख प्यास से थक जाते हैं। एक बार भगवान सूर्यदेव को दया आ गई। सूर्यदेव घोड़ों को एक तालाब के किनारे ले गए लेकिन उन्हें जब एहसास हुआ रुके तो सृष्टि रुक जाएगी। उन्होंने तालाब के किनारे मौजूद दो खरों (गधे) को पांच घोड़ों के साथ शामिल कर लिया और दो को विश्राम के लिए छोड़ दिया। गधों की वजह से एक महीने तक घोड़ों को विश्राम मिल गया। हर सौर वर्ष में आनेवाले इस महीने को ही खरमास कहा जाता है। इस एक महीने की अवधि में श्रद्धालुओं पर भगवान की विशेष कृपा रहती है। एकादशी का व्रत रखकर भगवान को विष्णु को तुलसी के पत्तों के साथ खीर खिलाना भी श्रेयस्कर होता है।