" /> संकट में कमलनाथ सरकार!, सिंधिया और उनके २० समर्थक विधायकों ने दिया इस्तीफा

संकट में कमलनाथ सरकार!, सिंधिया और उनके २० समर्थक विधायकों ने दिया इस्तीफा

मध्य प्रदेश में भाजपा ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपने पाले में करके कांग्रेस सरकार की जड़ें हिला दी हैं। सिंधिया गुट के २० विधायकों के इस्तीफे के बाद यह तय हो गया है कि कांग्रेस की सरकार गिर जाएगी। २० विधायकों का इस्तीफा स्वीकार होते ही विधानसभा की स्ट्रेंथ सिर्फ २०८ विधायकों की बचेगी और बहुमत के लिए सिर्फ १०५ विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होगी। सिंधिया समर्थक विधायक इस्तीफा देने के बाद पुलिस सुरक्षा की मांग की है।

मध्य प्रदेश में २३० विधानसभा सीटें हैं। राज्य के २ विधायकों का निधन हो गया जिसके बाद विधानसभा की मौजूदा शक्ति २२८ हो गई है। कांग्रेस के ११४ विधायक थे। इस कारण सरकार बनाने का जादुई आंकड़ा ११५ रहा। कांग्रेस को ४ निर्दलीय, २ बसपा और एक सपा विधायक का समर्थन मिला हुआ है। इस तरह कांग्रेस ने कुल १२१ विधायकों के समर्थन से सरकार बनाई थी जबकि भाजपा के पास १०७ विधायक हैं। कांग्रेस के २० विधायकों के इस्तीफे के बाद विधानसभा की मौजूदा संख्या घटकर २०८ रह गई है। ऐसे में बहुमत के लिए सिर्फ १०५ विधायकों की आवश्यकता है। भाजपा के खुद के १०७ विधायक हैं। ऐसे में राज्यपाल का न्यौता मिलते ही भाजपा तुरंत सरकार बनाएगी और विधानसभा में आसानी से बहुमत भी साबित कर लेगी। मध्य प्रदेश में चार निर्दलीय विधायकों ने कमलनाथ सरकार को समर्थन दे रखा है। ताजा घटनाक्रम में सरकार गिरने के बाद ये विधायक भी पाला बदल सकते हैं। अगर ये चारों विधायक भी भाजपा के साथ आ जाते हैं तो नई सरकार के समर्थन में विधायकों का आंकड़ा बढ़कर १११ हो जाएगा। बाद में उपचुनाव में भाजपा को २२ में से छह सीटों पर ही जीत हासिल करने की जररूरत होगी। अगर निर्दलीय भाजपा के साथ नहीं आते तो पार्टी को उपचुनाव में कम-से-कम १० सीटें जीतनी होंगी, वहीं कांग्रेस को अगर फिर से सरकार बनानी है तो उसे उपचुनाव में कम-से-कम २१ सीटें जीतनी होंगी क्योंंकि अब उसके विधायकों की संख्या घटकर ९४ रह गई है। अगर बसपा-सपा के तीनों विधायकों का समर्थन कांग्रेस के साथ बरकरार रहा तो पार्टी को १८ सीटें जीतनी होगी। अगर चार निर्दलीय विधायकों ने भी पाला नहीं बदला तो कांग्रेस को सिर्फ १४ सीटें जीतनी होगी।

कांग्रेस ने सिंधिया को बताया गद्दार
भोपाल। ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ते ही पार्टी में खलबली मच गई है। मध्य प्रदेश में पार्टी को बड़ा झटका लगने से बौखलाए कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य पर छींटाकशी करने लगे हैं। कोई उन्हें जयचंद तो कोई गद्दार बता रहा है। मध्य प्रदेश कांग्रेस के बड़े नेता अरुण यादव ने तो ज्योतिरादित्य के खून में गद्दारी तक का हवाला दे दिया। इधर पार्टी के लोकसभा सांसद अधीर रंजन चौधरी ने तो उन्हें गद्दार तक कह दिया और कहा कि पार्टी ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखाकर ठीक ही किया है। हालांकि अधीर ने माना कि अब मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार का बचना संभव नहीं है। अधीर ने कहा कि पार्टी के खिलाफ जाकर गद्दारी करेंगे तो उन्हें निकालना ही पड़ेगा। जो भाजपा हमें खत्म करना चाहती है, उसे आप मजबूत करेंगे तो पार्टी को एक्शन तो लेना ही पड़ेगा। उन्होंने कहा कि मुश्किल हालात में पार्टी को छोड़ जाना बेईमानी है। पार्टी का नुकसान तो जरूर होगा। लगता है कि मध्य प्रदेश में हमारी सरकार नहीं बच पाएगी लेकिन भाजपा की आज की राजनीति यही है कि विपक्ष जहां भी है, उसे तोड़ दो।

इस्तीफे की चिट्ठी में छलका सिंधिया का दर्द
भोपाल। ‘आप जानती हैं कि पिछले एक साल से मैं इस चीज से बच रहा था लेकिन अब मैं कांग्रेस में और नहीं रह सकता।’ ज्योतिरादित्य सिंधिया के इस्तीफे की एक लाइन यह बताती है कि वह काफी समय से बेचैन थे। १८ साल कांग्रेस में रहे और लगातार चार बार सांसद बने सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ने का एलान कर दिया। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इस्तीफे में यह भी कहा है कि वह अपने लोगों, कार्यकर्ताओं और राज्य के लिए कांग्रेस में रहकर काम नहीं कर पा रहे हैं। साल २०१८ के विधानसभा चुनाव के बाद सीएम न बन पाने के बाद भी ज्योतिरादित्य सिंधिया मान गए थे। उन्हें उम्मीद थी कि वे मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बनेंगे लेकिन उन्हें यह पद भी नहीं मिला। लोकसभा चुनाव में भी ज्योतिरादित्य सिंधिया हार गए। पिछले एक साल से हाशिए पर चल रहे सिंधिया ने आखिरकार अपना मन बना ही लिया। कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी को ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इस्तीफे की चिट्ठी ९ मार्च यानी एक दिन पहले ही लिखी थी। अब यह चिट्ठी सार्वजनिक हुई है। इसका मतलब है कि मध्य प्रदेश का पूरा राजनीतिक घटनाक्रम ज्योतिरादित्य सिंधिया के इशारे पर ही हो रहा है। सिंधिया ने चिट्टी में लिखा है कि उनके लिए कांग्रेस में बने रहना मुश्किल हो रहा था और पिछले साल से ही वह इसे टाल रहे थे लेकिन अब वक्त आ गया है।

राजस्थान का किला बचाने की चुनौती
नई दिल्ली। मध्य प्रदेश में कांग्रेस के हाथ से सत्ता की चाबी फिसल गई है और राजस्थान की कांग्रेस सरकार पर भी संकट के बादल नजर आने लगे हैं। बताया जा रहा है कि राजस्थान में कांग्रेसी विधायक अपनी ही सरकार से नाखुश हैं। सूत्रों के मुताबिक कई विधायक इसलिए असंतुष्ट हैं क्योंकि उनकी बात उनकी ही पार्टी में नहीं सुनी जाती है। ऐसे में कांग्रेस के सामने अपना राजस्थान का किला बचाने की चुनौती होगी। मध्य प्रदेश में सियासी उथल-पुथल के बीच सोनिया गांधी ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को दिल्ली बुलाया है। कांग्रेस नहीं चाहती है कि इस तरह की स्थिति राजस्थान में भी बने। २०० विधानसभा सीटोंवाले राजस्थान में कांग्रेस के पास १०० विधायक हैं। इसके अलावा बसपा को ६, सीपीएम को २, आरएलडी को १, आरएलपी को तीन और निर्दलीयों को १३ सीटों पर जीत मिली थी। अन्य सहयोगियों को मिलाकर कांग्रेस के पास १०७ विधायक हैं। १३ में से १२ निर्दलीय विधायक कांग्रेस के साथ और एक भाजपा के साथ है। भाजपा के पास अपनी ७२ सीटें हैं। ऐसे में अगर निर्दलीय विधायकों के साथ कांग्रेस के भी कुछ विधायक टूट जाएं तो राजस्थान की सरकार पर भी संकट के बादल मंडरा सकते हैं।

शिवराज से मिले सपा-बसपा विधायक
भोपाल। एमपी में सपा विधायक राजेश शुक्ला और बसपा विधायक संजीव कुशवाहा भाजपा नेता शिवराज सिंह चौहान के आवास पर पहुंचे थे। खबर है कि ये दोनों विधायक भाजपा में शामिल हो सकते हैं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने राज्यपाल लालजी टंडन को चिट्ठी लिखकर ६ मंत्रियों को बर्खास्त करने की सिफारिश की।

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