संयत रह कर करें मां दुर्गा का पाठ

बुधवार – शारदीय नवरात्र –
आश्विन शुक्ल की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक नवरात्र व्रत होता है। शारदीय नवरात्रि में शक्ति की उपासना का विधान है। इस उपासना में वर्ण-जाति का कोई बंधन नहीं है। अत: सभी वर्ण एवं जाति के लोग अपने इष्टदेव की उपासना करते हैं। देवी की उपासना व्यापक है। दुर्गा जी के भक्त प्रतिपदा से नवमी तक व्रत रखते हैं कुछ लोग अन्न त्याग देते हैं। कुछ श्री दुर्गा सप्तशती का सकाम या निष्काम भाव से पाठ करते हैं। संयत रहकर पाठ करना आवश्यक है, अत: यम-नियम का पालन करते हुए भगवती दुर्गा की आराधना या पाठ करना चाहिए। नवरात्र व्रत का अनुष्ठान करनेवाले जितने नियमित अंतर शुद्ध रहेंगे, उतनी ही  उन्हें सफलता मिलेगी। प्रतिपदा से नवरात्र प्रारंभ होता है। आंगन में पवित्र स्थान की मिट्टी से वेदी बनाकर उसमें जौ और गेहूं बोए फिर उनके ऊपर अपनी शक्ति के अनुसार बनवाए गए सोने, तांबे आदि अथवा मिट्टी के कलश को विधिपूर्वक स्थापित करें। कलश के ऊपर सोना, चांदी, तांबा, मृतिका, पाषाण का अथवा चित्रमयी मूर्ति की प्रतिष्ठा करें। मूर्ति अधिक कच्ची मिट्टी का सिंदूर आदि से बनी हो और स्नान आदि से उसमें विकृति होने की आशंका हो तो उसके ऊपर शीशा लगा दें। मूर्ति न हो तो कलश के पीछे स्वास्तिक बनाकर एंव दुर्गा जी का चित्र-पुस्तक तथा शालिग्राम को विराजित कर विष्णु का पूजन करें। पूजन तामस नहीं होना चाहिए। नवरात्र के आरंभ में स्वस्तिवाचन शांति पाठ करके संकल्प करें और तब सर्वप्रथम गणपति की पूजा कर मातृका, लोकपाल, नवग्रह एवं वरुण का सविधि पूजन करें। फिर प्रधान मूर्ति का षोडशोपचार पूजन करना चाहिए। अपने इष्टदेव, राम, कृष्ण, लक्ष्मी नारायण या भगवती दुर्गा देवी आदि की मूर्ति ही प्रधान मूर्ति कही जाती है।
पूजन विधि, संप्रदाय निर्दिष्ट विधि से होना चाहिए। दुर्गा देवी की आराधना अनुष्ठान में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का पूजन तथा मार्कंडेय पुराण अंतर्गत श्रीदुर्गासप्तशती का पाठ अनुष्ठान है।
 कलश स्थापना का सर्वोत्तम मुहूर्त-
कलश स्थापना में चित्रा नक्षत्र एवं वैधृति योग निषेध माना गया है। इस वर्ष चित्रा नक्षत्र आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को दिन में १२:३६ तक तथा वैधृति योग दिन में २:२८ तक है। चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग का प्रभाव अभिजीत मुहूर्त पर नहीं पड़ता है। अभिजीत मुहूर्त दिन में ११:३७ से दिन में १२:२३ तक रहेगा। इस काल में ही नवरात्र में देवी दुर्गा के निमित्त कलश स्थापना करना सर्वोत्तम रहेगा। इस प्रकार स्पष्ट है कि कई वर्षों बाद ऐसा संयोग बना है, जब आश्विन मास शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि में ही देवी दुर्गा जी के निमित्त अभिजीत मुहूर्त में कलश स्थापित होगा। ९ अक्टूबर २०१८ को प्रतिपदा तिथि दिन में ९:१० पर लग जाएगी जो १० अक्टूबर २०१८ को प्रात: ७:५६ तक रहेगी।
चूंकि देवी का आगमन नौका अर्थात नाव पर हो रहा है अर्थात यह सर्वोत्तम रहेगा। इसके प्रभाव से यदि बुधवार का दिन हो तो व्यापार में वृद्धि का योग रहेगा। बुधवार के दिन देवी का नौका का पर आगमन होना देश हित में रहेगा और इससे धन इत्यादि में बढ़ोतरी का योग रहेगा। अष्टमीयुक्त नवमी का महत्व अति शुभ माना गया है। इस मुहूर्त में जो भी पूजा किया जाता है उसमें अक्षय लाभ की प्राप्ति होती है।
आश्विन शुक्ल पक्ष १५ दिनों का है। १० अक्टूबर २०१८ से शारदीय नवरात्रि का प्रारंभ होगा। आज ही चित्रा नक्षत्र वैधृति योग में कलश स्थापना का निषेध होने से अभिजीत मुहूर्त दिन में ११:३७ से दिन में १२:२३ तक कलश स्थापना का कार्य होगा।
 विशेष – प्रतिपदा का मान प्रात: ७:०० बजकर ५६ मिनट तक है, अत: कलश स्थापना हेतु प्रतिपदा का उल्लंघन भी हो तो भी द्वितीया तिथि तथा अभिजीत मुहूर्त में देवी दुर्गा जी के निमित्त कलश स्थापना करें। दुर्गा वाहन नौका है। प्रतिपदा में देवी को पवित्र हेतु चंदन लेप अर्पण करें।
 ११ अक्टूबर को  द्वितीया तिथि में केश हेतु रेशमी पट्ट प्रदान करें। १२ अक्टूबर तृतीया में दर्पण तथा चरण हेतु सिंदूर अर्पण करें। १३ अक्टूबर चतुर्थी में देवी को दही, घी, मधु का मिश्रण तिलक हेतु, चांदी नेत्र हेतु अंजन का अर्पण करें। १४ अक्टूबर पंचमी को आभूषण अर्पण करें।