" /> संवेदनशीलता सबसे बड़ा मानवीय गुण!

संवेदनशीलता सबसे बड़ा मानवीय गुण!

गांव भारत की प्रशासनिक लोकतांत्रिक इकाई है और वैदिक काल से ही सांस्कृतिक इकाई भी है। ग्रामों के आत्मीयता के बन्धन मधुर हैं। ऋग्वेद में भी ग्रामों की प्रतिष्ठा है। उस समय भी गांव सांस्कृतिक इकाई थे। ऋग्वेद में ग्राम के प्रमुख को ग्रामणी कहा गया है। भारत को गांव का देश कहा जाता रहा है। ग्राम इकाई जर्मनी में भी थी। वहां इस इकाई को मार्क कहा जाता था। गांधी जी गांवों को आत्मनिर्भर व स्वावलम्बी बनाने के पक्षधर थे लेकिन स्वतंत्र भारत में गांव की समृद्धि की उपेक्षा हुई। गांव कृषि और पशुपालन से ही अपनी रोजी-रोटी चलाते थे। कृषि क्षेत्र से जुड़े उपकरणों को बनाने वाले अन्य उपयोगी वस्तुओं के कारीगर गांव में प्रतिष्ठित थे। इसके बावजूद गांव में रोजगार के अवसर नहीं थे। गांव के श्रमिक रोजगार के लिए महानगरों व अपने राज्यों के तुलना में अन्य विकसित राज्यों की ओर जाने लगे। श्रमिक अन्य देशों की ओर भी गये। अंग्रेजी राज्य में विशेष अनुबन्ध या एग्रीमेंट के माध्यम से वे अन्य देशों में भी गये। एग्रीमेंट के बन्धन के कारण उनका नाम गिरमिटिया मजदूर पड़ा। खाड़ी के देशों में भी भारत के ढेर सारे श्रमिक काम करते रहे हैं। भारत के भीतर अपने गांव छोड़कर शहरों की ओर रुख करने वाले श्रमिक अपना गांव नहीं भूले। वे महानगरों में कमाते थे और खाने पीने से बचाया गया धन अपने परिवार को भेजते थे।

कोरोना आपदा ने सारा खेल बिगाड़ दिया है। जीविका के साथ जीवन का भी संकट आया। सबको अपने घर और गांव की सुधि आयी। देश के सभी राज्यों ने अपनी क्षमता के अनुसार चिन्ता की लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मजदूरों के अन्य राज्यों की तुलना में महत्वपूर्ण काम किया है। उत्तर प्रदेश के लाखों प्रवासी मजदूर अन्य राज्यों में थे। सभी मजदूर अपने गांव घर पहुंचने की शीघ्रता में थे। सरकार ने युद्ध स्तर पर सबको घर पहुंचाया है।

गांव आर्थिक संयम की संस्कृति के केंद्र हैं। गांव वाले गंवईं और गंवार भी कहे जाते हैं। गंवार का अर्थ नासमझ से लिया जाता रहा है, लेकिन गंवार का असली अर्थ गांव वाला है। गांव की परिभाषा और व्याख्या करना आसान नहीं है। यहां अभाव के बावजूद संतोष के छन्द हैं। गांव का अपना व्यक्तित्व है। दुनिया के सभी महानगर ग्रामीण श्रमिकों की कृषि उत्पादन शक्ति और महानगरों के निर्माण करने वाली श्रम शक्ति का परिणाम है। हड़प्पा सभ्यता को नगरीय सभ्यता कहा जाता है। इस सभ्यता का विकास और निर्माण नगरीय सभ्यता ने नहीं किया। इसके पीछे सिंधु, सरस्वती के विशाल भू-भाग में फैले गांवों की श्रमशक्ति का ही कौशल रहा है। गांव के लोग शत प्रतिशत आस्तिक हैं। अपने श्रम के विश्वासी हैं। वे आस्थावादी हैं। अपने परिश्रम पर विश्वास करने के कारण भौतिकवादी आत्मावश्वासी भी हैं। अध्यात्मवादी भी हैं।

गांवों में विचार विविधता है। गांव के हर मोहल्ले में अपने ढंग की संसद चलती है। दस-पांच लोग यों ही खाली समय में बैठते हैं। सुख, दुःख की चर्चा करते हैं और जाने-अनजाने विषयों पर बहस करते हैं। मैं स्वयं गांव का हूं। बचपन में ऐसी बहसों का श्रोता रहा हूं। बाद में १५-१६ वर्ष की उम्र का होते-होते ऐसी गोष्ठियों में सदस्य के रूप में हिस्सा भी लेता रहा हूं। हमारा विद्यार्थी मन कहता है कि मोहल्ले-मोहल्ले में होने वाली गपबाजी के समूह को पालिर्‍यामेंट कहना ज्यादा सही होगा। ब्रिटिश संसद को पालिर्‍यामेंट कहा जाता है। पार्ले शब्द का अर्थ होता है-चबाना, कुटकना मुंह के भीतर घुमाना। हमारे गांव की पालिर्‍यामेंट मजेदार थी। मैं उसे अभी भी नहीं भूल पाया हूं। वैसे यह गपबाजी थी। इसके विषय अपने आप तय हो जाते थे। एक सायं चन्द्रमा के चारों ओर बादलों का घेरा दिखायी पड़ा। हमारी गांव की संसद में बहस थी कि यह घेरा अनिष्ट की सूचना है। अगले ने कहा कि यह वर्षा की सूचना है। एक ने कहा कि आंधी भी साथ आ सकती है। ग्राम संसद की बहसें मजेदार थी। हमारे बचपन में हमारे गांव में कोई चाय नहीं पीता था। शहर से गांव लौटे एक प्रवासी ने चाय पीना और पिलाना शुरू किया। गांव की संसद में बहस थी कि चाय पीने से व्यक्ति की ताकत घट जाती है। अगले ने कहा कि चाय तत्काल ताकत देती है। दूसरे ने बात काटी कि यह बड़े लोगों के चोचले हैं। अभी तो हमारे गांव में चाय आयी है और आगे अंग्रेजी दारू भी आयेगी। यह निणर्‍य सुनाने वाले ने तम्बाकू खाई, अगले ने कहा तम्बाकू खाना क्या अच्छा है। एक पंडित जी ने कहा कि तम्बाकू देवलोक में नहीं होती है। देवता भी तम्बाकू के लिए पृथ्वी पर आते हैं।

लेकिन अब गांव की बहसें बदल गयी हैं। महानगरों से गांव लौटे प्रवासी श्रमिक बहस का विषय हैं। पहले शहर से गांव लौटे मजदूर से सब लोग हाल-चाल लेते थे, अब डर लगता है कि यह कोरोना लेकर तो नहीं आया है। प्रवासी के आते ही डर बढ़ जाता है। गांव में टीवी, रेडियो पहुंच गए हैं। इसके कारण बहस के विषयों में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की बार-बार चर्चा का केन्द्र बनते हैं।

आशा में उत्साह होता है और निराशा में विषाद। आशा से सपने पैदा होते हैं। सपनों को पूरा करने के लिए संकल्प लिये जाते हैं। संकल्प को पूरा करने के लिए योजनाएं बनानी होती हैं। इसके लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। रोजगार विषयक योजनाओं को क्रियान्वित करने के लिए खासे समय की जरूरत होती है लेकिन काम शुरू हो गया है। अल्प समय में बाधायें दूर करते हुये गरीबों के मन में आशा और उत्साह भरने का काम वाकई आश्चर्यजनक है। संवेदनशीलता से बड़ा दूसरा मानवीय गुण नहीं होता। महामारी के आर्थिक दुष्प्रभावों से जूझने में संवेदनशीलता का ही महत्व है। यहां संवेदनशीलता के साथ-साथ सह-अनुभूति भी है।