" /> सच्चाई छुप नहीं सकती!

सच्चाई छुप नहीं सकती!

८ मार्च को `अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ पर एक मुस्लिम महिला मित्र द्वारा उर्दू में भेजे गए एक मैसेज ने ध्यान आकर्षित किया। मैसेज कुछ यूं था,
मैं मार्च करूंगी, क्योंकि मैं ऐसा कर सकती हूं, उन बहनों के लिए जिन्हें सालन में उनकी फेवरेट बोटी को हाथ लगाने नहीं दिया जाता, क्योंकि वो भाई के लिए होता है, मैं उन बहनों के लिए मार्च करूंगी।
उस बीवी के लिए जिसे सिर्फ गोल रोटी न बना पाने की वजह से मरने की हद तक पीटा जाता है, मैं उसके लिए मार्च करूंगी।
उन बहनों के लिए जिन्हें अपने भाइयों की गदंगी भी साफ करनी पड़ती है क्योंकि उन्हें कहा जाता है कि ये लड़कियों का काम है, मैं उनके लिए मार्च करूंगी।
उन बीवियों के लिए जिन्हें शौहर का थप्पड़ खाकर भी चुप रहने को कहा जाता है क्योंकि मर्द को गुस्सा आ ही जाता है कभी, मेरा मार्च उनके लिए।
हालांकि इस मैसेज में किसी मार्च की कोई जानकारी नहीं थी। मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि यह फॉरवर्डेड मैसेज है जो उन्हें उनके पारिवारिक ग्रुप में मिला है। फिर उर्दू अखबारों से पता चला कि इस तरह का मार्च पाकिस्तान में आयोजित किया गया है जहां महिलाएं `मेरा जिस्म, मेरी मर्जी’ नाम से सड़कों पर उतरी हैं। पाकिस्तान में इस स्लोगन को लेकर काफी बवाल हुआ। पाकिस्तान के रूढ़िवादी समाज ने इसे महिलाओं की सेक्सुअल प्रâीडम अर्थात यौन स्वतंत्रता की मांग माना और पाकिस्तान की मीडिया तक में इसकी आलोचना हुई। हालांकि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन और एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाओं ने इस मार्च का समर्थन किया और पाकिस्तानी महिलाओं की खुलकर वकालत की। मेरे मन में यह सवाल आया कि क्या इस आंदोलन का हिंदुस्थानी मुस्लिम महिलाओं पर भी प्रभाव पड़ सकता है? इसीलिए मैंने अपनी महिला मित्र से पूछा कि, क्या तुम ऐसे किसी आंदोलन का हिस्सा बनना पसंद करोगी? जवाब मिला, अगर ऐसा आयोजन हो तो जरूर, क्योंकि फॉरवर्डेड मैसेज की बातें यहां की महिलाओं की भी आप बीती है। उनके साथ भी वही सुलूक होता है। उन्हें पुरुषों से कमतर माना जाता है। उनका कहना था कि मुस्लिम महिलाओं को एकजुट होकर औरतों के खिलाफ हो रहे अत्याचार और हिंसा के खिलाफ आवाज बुलंद करने की कोशिश करनी चाहिए। उनका तर्क था कि जब मुस्लिम मुल्क पाकिस्तान में ऐसा आंदोलन मुमकिन है तो एक लोकतांत्रिक देश में क्यों नहीं?
पाकिस्तान की महिलाओं ने समाज में अपनी बराबरी के दर्जे और अपने प्रति होनेवाली नाइंसाफी के प्रतिकार के तौर पर `औरत मार्च’ की शुरुआत २०१८ में की थी। पाकिस्तान में यह तीसरी बार है जब `औरत मार्च’ निकाला गया। पाकिस्तान के साथ ही विदेशी मीडिया में भी इसकी खूब चर्चा हुई, लेकिन मुस्लिम जगत का रूढ़िवादी समाज ने इसे अच्छा नहीं माना। दरअसल मुस्लिम रूढ़िवादी तबका अभी भी मुस्लिम महिलाओं की जगह चूल्हा-चौका, चादर और चारदीवारी के भीतर ही मानता है। यानी नकाब और घर की दहलीज ही मुस्लिम महिलाओं का मुकद्दर मान लिया गया है। मुस्लिम महिलाओं को लेकर लोगों की सोच इतनी संकीर्ण है कि पढ़ा-लिखा और उदारवादी समाज भी उनके हक की आवाज को बर्दाश्त नहीं कर पाता। मेरी मित्र कहती हैं कि, अपने लिए बेहतर और सम्मानजनक कानून के साथ लोगों के बीच अपनी पहचान को लेकर जागरूकता पैâलाए जाने की मांग करना वैâसे गलत हो सकता है? हालांकि बदलते वक्त के साथ हिंदुस्थानी मुस्लिम महिलाएं भी दुनिया के बाकी हिस्सों की तरह अपने अधिकार को लेकर मुखर हुई हैं। केवल अपने लिए ही नहीं वह सामाजिक आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा भी ले रही हैं। लेकिन इन आंदोलनों की संख्या कम होती है। वैसे महिला संगठनों, मानवाधिकार संगठनों और लैंगिक अल्पसंख्यकों द्वारा न्याय और इंसाफ की मांग जब भी की जाती है कट्टरपंथियों द्वारा उसका विरोध शुरू हो जाता है।
पाकिस्तान की महिलाओं ने अपने अस्तित्व की मांग को लेकर सड़कों पर उतरने का मन बनाया होगा। हिंसा और उत्पीड़न से आजादी की मांग करना, महिलाओं की सुरक्षा के लिए बेहतर कानून लाना, उन कानूनों को लागू करना, जागरूकता बढ़ाना और नजरिया बदलने की मांग करना, महिलाओं को आर्थिक न्याय दिलाना ही `मेरा जिस्म-मेरी मर्जी’ के आयोजकों का मुख्य उद्देश्य बना। महिलाओं के अधिकारों और उनकी ख्वाहिशों को सामने लाना कम चुनौती भरा काम नहीं है। क्या कोई महिला यह कह सकती है कि बिना उत्पीड़न या बलात्कार के डर के वह खुद यह तय कर सके कि उसे किसके साथ रहना है, क्या पहनना है और अपने शरीर के साथ क्या करना है? फिलवक्त इस समाज की स्थिति देखकर कहा जा सकता है यह मुमकिन ही नहीं है। लेकिन मुस्लिम महिलाओं की जागरूकता नए समाज की संरचना चाहती है जहां उसे बराबरी का हक़ हासिल हो। लेकिन पुरुष प्रधान समाज को यह गवारा नहीं। उन्हें लगता है कि मुस्लिम महिलाओं का यह कदम इस्लाम के खिलाफ है और यह अश्लीलता, ईशनिंदा और अराजकता को बढ़ावा देता है। अगर हिंदुस्थान में भी ऐसे आंदोलन होते हैं तो यहां भी कमोबेश यही तर्क दिए जाएंगे।
हिंदुस्थानी मुस्लिम समाज की अगर बात की जाए तो यहां पर जिस `मुस्लिम पर्सनल लॉ’ का मुस्लिम समाज अनुसरण करता है वह मुस्लिम महिलाओं के हक के प्रति बेहद उदासीन है। समय के साथ बिना मौलवियों के बनाए शरई कुतर्क के, सही इस्लाम और कुरआन की शरीयत के अनुसार उसमें बदलाव लाने की जरूरत है। मुस्लिम धर्मगुरुओं और मौलवियों को कुरआन की सीख को ध्यान में रखते हुए अपने भीतर झांकने की जरूरत है। अक्सर विवाह, तलाक, हलाला, संपत्ति विवाद जैसे विवादित मुद्दों पर धर्मगुरुओं के पास मामला पहुंचता है। फतवे मंगाए जाते हैं। किसी संवेदनशील मामलों पर कोई पैâसला करने से पहले ऐसे धर्म गुरुओं को यह सोचना होगा कि क्या वह महिला विरोधी एकतरफा पैâसला सुनाने की योग्यता रखते हैं। हालांकि यह फतवे पैâसला न होकर केवल सुझाव मात्र होते हैं लेकिन मुस्लिम समाज इन फतवों को ही पैâसला मान बैठता है। आज समय की मांग है कि मुस्लिम समाज भी अपने धर्मगुरुओं की योग्यता को परख कर ही प्रश्न करें। यह कहना गलत नहीं है कि, आज के आधुनिक युग में मुस्लिम महिलाओं को बराबरी के वो मूल अधिकार भी उपलब्ध नहीं हैं जो पवित्र कुरआन में दर्ज हैं। सच्चाई से आंखें चुराने से सच्चाई नहीं छुपेगी। मुस्लिम समाज को अपने भीतर की गलतियों को सुधारना होगा वरना मुस्लिम महिलाएं `मेरा जिस्म, मेरी मर्जी’ के नारे को अभी तो अपने अधिकारों से जोड़ रही हैं, लेकिन कल यह आंदोलन सच में कहीं अराजकता न पैदा कर दे। मेरी मुस्लिम महिला मित्र का यह सवाल वाजिब और झंझोड़ने वाला है कि `सलमान, क्या हम इंसान नहीं हैं या इस्लाम में मुस्लिम महिलाओं का कोई सम्मानजनक अधिकार नहीं है?’ जबकि पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब ने फरमाया- `औरतों से अच्छा व्यवहार करने के बारे मे मेरी वसीयत कुबूल करो।’ इसी के साथ पवित्र कुरआन में साफ-साफ कहा गया है कि, `औरतों के अधिकार मर्दों पर मारूफ तरीके पर ऐसी ही है, जैसे मर्दो के अधिकार औरतों पर हैं।’-(अल-कुरआन २:२२८) इस्लाम की शिक्षानुसार शारीरिक और मनोवैज्ञानिक रूप से पुरुष और महिला के बीच कुछ अंतर होता है। इस्लाम उस प्राकृतिक अंतर को सामने रखते हुए अधिकार और कर्तव्य की सूची बनाता है। इस अंतर को सामने रखते हुए महिलाओं को जो विशेष स्थान मिलना चाहिए वह उसे प्रदान भी करता है और उसका संरक्षण भी करता है। उसे पुरुषों की दया पर नही छोड़ता। इस्लाम चाहता है कि महिलाओं पर उनके सामर्थ्य से अधिक बोझ न डाला जाए। इसलिए मुस्लिम समाज को थोथी-तथ्यहीन धर्मगुरुओं की किताबों के हवाले के बजाय कुरआन और पैगंबर मोहम्मद साहब की सही हदीसों के हवाले से अपनी दुविधा और समस्या दूर करने की जरूरत है। तब शायद मुस्लिम महिलाओं को किसी भी मुल्क में सड़कों पर उतरने की जरूरत ही न पड़े।