सतर्क रहना होगा…

बात भूमिपूजन-उद्घाटनों की हो या हादसों-विवादों की, इन दिनों मुंबई और कोलकाता की मेट्रो परियोजनाएं सुर्खियों में हैं। तकरीबन समान भूगोल-भूमिति वाले दोनों शहरों की यातायात जरूरतें भी लगभग एक समान हैं। देश के दो तटीय शहरों, दो राजधानियों बल्कि आर्थिक महानगरों की एक और समानता है तो वो है ताजातरीन चुनावी सरगर्मियां। चंद दिनों बाद महाराष्ट्र विधानसभा के लिए मतदान होना है तो कुछ महीनों बाद प. बंगाल में भी ईवीएम के बटन दबने हैं। लिहाजा दोनों ही राजधानियोेंं में विकास परियोजनाओं ने रफ्तार पकड़ी हुई है। अलबत्ता परियोजनाओं की यही रफ्तार जल्दबाजी के ट्रेक पर समस्याओं के स्टाप लेने लगी है। निवारण हो रहे हैं पर नाकामियों और नाराजगियों का साया भी साथ है।
हाल ही में कोलकाता में मेट्रो टनलिंग के दौरान ४० से ५० इमारतों में दरारें पड़ गर्इं, हजारों लोगों की जान खतरे में आ गई। हादसे में जनहानि भले न हुई हो पर जनाक्रोश खासा हुआ। परियोजना के भविष्य पर बड़ा सा प्रश्नचिन्ह लग गया। एक हादसा यहां मुंबई में भी हुआ। मेट्रो-३ की एक साइट पर। जिसमें एक मजदूर मारा गया तो एक गंभीर घायल हो गया। इन दो अलग-अलग हादसों ने सिस्टम को सोचने को मजबूर कर दिया है। दोनों ही हादसों की साइट्स पर काम बंद है। माना कि मुंबई मेट्रो-३ का हादसा कोलकाता की तुलना में काफी मामूली है और मुंबई मेट्रो-वन निर्माण के दौरान हुई जनहानि की तुलना में भी कमजोर। तब भी यह हर लिहाज से चिंताजनक तो है ही। उतना ही चिंताजनक जितना मुंबई में मेट्रो कारशेड के लिए हजारों वृक्षों की कटाई का मामला है।
इस समय देश के किसी शहर विशेष में सबसे तेजी से मेट्रो परियोजनाओं का काम चल रहा है तो उस शहर का नाम है मुंबई। आंकड़ों के अनुसार मुंबई महानगरीय क्षेत्र (एमएमआर) में ३३७ किलोमीटर का मेट्रो जाल बिछना है। इस आंकड़े से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि मुंबई में मेट्रो का क्या महत्व है। इसी महत्व के मद्देनजर सरकारें मेट्रो परियोजनाओं को जल्द से जल्द पूरा कर लेना चाहती है और यही जल्दबाजी नाराजगी का कारण भी बन रही है। सवाल उठे हैं कि जल्दबाजी में मेट्रो की रूपरेखा, डिजाइन, ढांचे और नेटवर्क के साथ समझौता क्यों? बेशक मुंबई हो या कोलकाता, दोनों के भविष्य के लिए मेट्रो बेहद जरूरी है। परंतु उतना ही जरूरी है जान-माल और जंगल की सुरक्षा का मसला।
खैर, कोलकाता मेट्रो टनलिंग हादसा मुंबई के लिए भी खतरे की घंटी है। कोलकाता की ही तरह मुंबई में भी ब्रिटिशकालीन इलाके हैं। भले ही उन इलाकों में टनलिंग का काम करीब-करीब पूरा हो चुका हो तब भी यह सतर्कता का विषय तो है ही। दोनों ही समुद्री शहर हैं। लिहाजा कोलकाता के हादसे से मुंबई को भी सचेत होने की जरूरत है। कोलकाता के पेट में तो मात्र दो टीबीएम मशीनें हलचल कर रही हैं, यहां मुंबई में तो ऐसी १७ मशीनें उथल-पुथल मचाए हैं। इसलिए मुंबई मेट्रो को अधिक तत्पर रहने की जरूरत है वरना अनहोनी की पार्श्वभूमि तैयार होते देर नहीं लगेगी। मुंबई में खतरा सिर्फ अंडरग्राउंड मेट्रो के लिए ही नहीं है, एलिवेटेड मेट्रो पर भी हादसों का डर बना हुआ है। अभी ४ दिन पहले ही मुंबई के एक स्काईवॉक पर आग लगी थी, भीषण ‘एलिवेटेड’ फायर। यह आग सीधे तौर पर न सही पर अपरोक्ष रूप से मुंबई की सभी एलिवेटेड मेट्रो परियोजनाओं के लिए खतरे का संकेत है। यह उनकी फायर सेफ्टी के प्रति गंभीर होने का इशारा भी है। इसीलिए मुंबई मेट्रो के सुरक्षा मानकों का विषय भी गंभीर है। कुल मिलाकर मेट्रों प्रोजेक्टस् के इन सभी पहलुओं पर गौर करके सरकार को संयम और सूझबूझ से फैसले लेने होंगे। पर्यावरण और परियोजना के बीच सामंजस्य तो बनाए रखना ही होगा पर साथ में सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान देना होगा।