" /> सत्य का साथ जरूरी!

सत्य का साथ जरूरी!

मुस्लिम समाज का महत्वपूर्ण महीना मुहर्रम चल रहा है। अक्सर इस महीने की खासियत को लेकर गैर-मुस्लिम भाइयों में भ्रम बना रहता है। यह तब और भी बढ़ जाता है जब कुछ मुसलमान धड़ल्ले से नववर्ष की बधाई दे रहे होते हैं और कुछ गमगीन मैसेज के जरिए अपना दुःख प्रकट कर रहे होते हैं। इसलिए इस माह की, इस माह में मनाए जाने जाने वाले विशेष दिनों की जानकारी होने से कई बातों को लेकर बना भ्रम समाप्त हो सकता है। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार नए साल की शुरुआत मुहर्रम के महीने से होती है, जिसकी गणना चांद के अनुसार होती है। इस्लामिक कैलेंडर को हिजरी कैलेंडर के नाम से जाना जाता है। इसी हिजरी कैलेंडर के अनुसार मुस्लिम समुदाय के लोग अपने सभी तीज-त्यौहार मनाते हैं। मुहर्रम के मौके पर मुस्लिम समाज का बहुत बड़ा तबका इमाम हुसैन की कर्बला के मैदान में हुई शहादत की याद में शोक मनाता है। शिया बंधु मजलिसों और मातमी जुलूसों के माध्यम से इमाम हुसैन और उनके साथ कर्बला के मैदान में शहीद होने वाले ७२ शहीदों को याद करते हैं।
मुहर्रम महीने को मुस्लिम समाज का एक वर्ग नववर्ष के रूप में भी मनाता है जिसकी खूब आलोचना भी होती है। मुहर्रम को लेकर शिया बिरादरी ज्यादा हिस्सास है। मुहर्रम के १० दिन शिया मजलिसों और सुन्नी खेमों में त्याग, बलिदान और इंसानियत की बात होती है जिसे इमाम हुसैन की शहादत के रूप में याद करने की पुरानी परंपरा रही है। मुहर्रम को समझने के लिए इस्लाम के उस इतिहास का मुतालआ करना होगा जिसका तअल्लुक इमाम हुसैन की शहादत से है। इस्लाम का जिस मक्का-मदीना से उदय हुआ वहां से कुछ दूर मोहम्मद साहब की वफात के बाद ‘शाम’ नामी मुल्क में मुआविया नामक शासक का दौर था। मुआविया की मृत्यु के बाद शाही वारिस के रूप में यजीद ने वहां की सल्तनत संभाली। यजीद चाहता था कि उसकी बादशाहत की पुष्टि बैत लेकर इमाम हुसैन भी करें। चूंकि यजीद के लिए इस्लामी मूल्यों की कोई कीमत नहीं थी इसलिए उस जैसे शख्स को इस्लामी शासक मानने से पैगंबर मोहम्मद साहब के घराने ने साफ इनकार कर दिया। इमाम हुसैन जानते थे कि यजीद इस बात का बदला लेने के लिए कुछ भी कर गुजरेगा, इसलिए उसकी बात मानने से इनकार करने के साथ ही उन्होंने यह भी फैसला लिया कि अब वह अपने नाना मोहम्मद साहब का शहर मदीना छोड़ देंगे ताकि किसी तरह का विवाद न हो और वहां अमन कायम रहे।
इमाम हुसैन हमेशा के लिए मदीना छोड़कर परिवार और अपने कुछ समर्थकों के साथ इराक की तरफ निकल पड़े। लेकिन करबला के पास यजीद की फौज ने उनके काफिले को घेर लिया। यजीद ने उनके सामने फिर अपने आप को बादशाह मान लेने के साथ अन्य कई बेजा शर्तें रखीं, जिन्हें इमाम हुसैन ने मानने से साफ इनकार कर दिया। शर्त नहीं मानने के बदले में यजीद ने जंग करने की बात रखी। इस दौरान इमाम हुसैन इराक के रास्ते में ही अपने काफिले के साथ फुरात नदी के किनारे तंबू लगाकर ठहर गए। लेकिन यजीदी फौज ने न सिर्फ उनके तंबुओं को हटाने का आदेश दिया बल्कि इमाम हुसैन के काफिले को नदी से पानी लेने की इजाजत तक नहीं दी। अगर आज का मुसलमान होता तो नए दौर की मजहबी धर्मांधता को मानते हुए फौरन जंग छेड़ देता। लेकिन इमाम हुसैन का जंग का इरादा बिल्कुल नहीं था। वह शांति से इराक चले जाना चाहते थे। आज का मुसलमान सिर्फ गढ़ी-गढ़ाई, सुनी-सुनाई बातों पर यकीन कर हिंसा पर उतारू हो जाता है और उसे इस बात की जरा भी परवाह नहीं होती कि उनकी वजह से अन्य मुसलमानों पर क्या बीतेगी लेकिन मोहम्मद साहब के नवासे को काफिले में शामिल ७२ लोगों की जान की परवाह थी। इस काफिले में उनका छह माह का बेटा उनकी बहन-बेटियां, पत्नी और छोटे-छोटे बच्चे शामिल थे। वह मौसम गर्मी का और महीना मुहर्रम का था। आज तो गर्मी से राहत पाने के अनेक संसाधन मौजूद हैं लेकिन गौर करने की बात है कि उस वक्त सहरा और शदीद गर्मी में तंबुओं में पनाह लिए हुए इमाम हुसैन के काफिले की क्या स्थिति रही होगी।
उसी मुहर्रम की सात तारीख तक इमाम हुसैन के पास जितना खाना और खासकर पानी था, वह खत्म हो चुका था। इसके बावजूद इमाम हुसैन असली इस्लाम की सीख का पालन करते हुए और सब्र से काम लेते हुए जंग को टालते रहे। ७ से १० मुहर्रम तक इमाम हुसैन, उनका परिवार और उनके अन्य साथी भूखे प्यासे रहे। लेकिन यजीद की फौज का दिल नहीं पसीजा। १० मुहर्रम तक जब यजीद की तरफ से जबरदस्ती थोपी गई जंग में इमाम हुसैन के सारे साथी शहीद हो गए तब असर की नमाज के बाद इमाम हुसैन खुद जंग में गए और आखिर में सत्य की लड़ाई लड़ते उन्हें भी शहीद कर दिया गया। इस जंग में पुरुषों में सिर्फ इमाम हुसैन के एक बेटे जैनुल आबेदीन ही जीवित बचे, क्योंकि वह बीमार थे और और बाद में उन्हीं से मोहम्मद साहब की पीढ़ी चली। इमाम हुसैन और उनके पुरुष साथियों व परिजनों को कत्ल करने के बाद यजीद ने इमाम हुसैन के परिवार की औरतों को गिरफ्तार करने का हुक्म दिया। यजीद ने शहीद हुए इमाम हुसैन के परिवार की जीवित महिलाओं पर बेइंतेहा जुल्म किए। उन्हें कैदखाने में रखा। इमाम हुसैन की मासूम बच्ची सकीना की कैदखाने में ही मौत हुई।
मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन और उनके परिजनों की इसी कुर्बानी की याद में मुहर्रम मनाया जाता है। कर्बला का यह वाकया इस्लाम में अम्न-ओ-अमान की हिफाजत के लिए हजरत मोहम्मद के घराने की तरफ से दी गई वह अजीम कुर्बानी है जिसमें जान देकर भी जुल्म के खिलाफ खड़े होने का जज्बा और सत्य के मार्ग पर चलने की सीख है। इस वाकये को १४०० से ज्यादा साल बीत चुके हैं। इस्लाम की असल सीख वही थी जिसका पालन इमाम हुसैन ने किया, जबकि यजीद ने इस्लाम की सीख के खिलाफ जाकर जुल्म-ओ-ज्यादती का मार्ग चुना। इराक स्थित कर्बला में हुई यह घटना दरअसल सत्य के लिए जान न्योछावर कर देने की जिंदा मिसाल है। इस्लाम का मूल है सिर्फ एक ही खुदा की इबादत करना। इस्लाम में छल-कपट, झूठ, मक्कारी, जुआ, शराब, जैसी चीजें हराम बताई गई हैं। मोहम्मद साहब ने इन्हीं निर्देशों का पालन किया, इसी को आम जीवन का हिस्सा बनाने के लिए अपने आल-औलाद और सहाबा को प्रेरित किया और इन्हीं इस्लामिक सिद्घान्तों पर अमल करने की हिदायत सभी इंसानों को भी दी। उनके अनुयायी मुसलमानों से इस बात की अधिक अपेक्षा होती है कि वे मोहम्मद साहब की बातों पर अमल करें जिस तरह इमाम हुसैन ने किया।
मुहर्रम के इस वाकये की वजह से ही नए साल की बधाई देने और जश्न मनाने से मुस्लिम उलेमा मना करते हैं, साथ ही हदीसों के हवाले से इस महीने में रोजा रखने और सदका-खैरात करने की खास अहमियत बयान करते हैं। क्या नए साल का जश्न मनाने के बजाय इस्लामी नए साल के शुरुआती दिन बेबसों, बेवाओं, बेसहारों, जरूरतमंदों और यतीमों की दिल से सहायता करना ज्यादा उचित नहीं होगा? और अगर खामोशी से सहायता करते हुए, बिना किसी प्रचार का ढोल पीटे ऐसा किया किया जाए तो और भी उत्तम होगा। इस दौरान बीमारों, बूढ़ों और अपंगों-अपाहिजों, विकलांगों और निःशक्तों की मदद करना, बुजुर्गों का सम्मान करना, अपने कर्तव्य को पूरी मुस्तैदी और ईमानदारी से निभाना भी इबादत का हिस्सा ही माना जाएगा। दुनिया मे अपने बच्चों का नाम इमाम हुसैन और उनके शहीद साथियों के नाम पर रखने वाले अरबों मुसलमान हैं, लेकिन क्या उन्होंने इमाम हुसैन के शांति और शहादत के मार्ग को अपनाया है? इस बात को भूलना नहीं चाहिए कि जालिम की एक वक्त के बाद अहमियत खत्म हो जाती है और सत्य का साथ देने वाले इंसानी दिलों में अपना लाफानी मकाम छोड़ जाते हैं। रावण, कंस, फिरऔन और यजीद जैसों को जुल्म के प्रतीक के तौर पर ही याद किया जाता है, जबकि श्रीराम, श्रीकृष्ण, हजरत मूसा और इमाम हुसैन का क्या मकाम है, क्या यह किसी को बताने की भी जरूरत है? हथियारों से जंग जीती जा सकती है पर दिल नहीं। दिल तो किरदार से जीते जाते हैं।