" /> सफलता ही लेखकों को उचित पारिश्रमिक दिलाती है!-जूही चतुर्वेदी

सफलता ही लेखकों को उचित पारिश्रमिक दिलाती है!-जूही चतुर्वेदी

वैसे तो हिंदी फिल्मों में ज्यादातर कहानियों के लेखक पुरुष होते हैं। लेकिन फिल्म `विकी डोनर’ की सफलता ने जूही चतुर्वेदी की एक अलग पहचान बनाई है। `मद्रास वैâफे’, `पीकू’, `द स्काय इज पिंक’ जैसी फिल्मों को जूही ने लिखा है। इस समय ओटीटी प्लेटफॉर्म `अमेजॉन’ पर महानायक अमिताभ बच्चन और आयुष्मान खुराना जैसे नामी स्टार्स के साथ जूही चतुर्वेदी लिखित फिल्म `गुलाबो सिताबो’ का स्वागत हुआ है। हालांकि कुछ दर्शकों और क्रिटिक्स ने इस फिल्म को ठंडी और स्लो फिल्म कहा है। पेश है जूही चतुर्वेदी से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

फिल्म में लखनऊ की पृष्ठभूमि रखने की कोई खास वजह?
लखनऊ नवाबों का शहर है। इसका ऐतिहासिक महत्व रहा है। वक्त काफी आगे निकल चुका है फिर भी आज लखनऊ में पुरानी हवेलियां नजर आती हैं। इनमें से अधिकांश जर्जर हो चुकी हैं लेकिन हवेलियों के इर्द-गिर्द कहानी का जो तानाबाना है वो इन हवेलियों की अहमियत को दृढ़ करता है।

‘गुलाबो सिताबो’ की प्रेरणा आपको कहां से मिली?
कहानी तो तब जन्म लेती है जब कहानी से मिलता-जुलता कोई किरदार आपसे टकराए। रोजमर्रा की जिंदगी में हम ढेर सारे लोगों से मिलते हैं। ऐसे में कुछ लोग आपकी जिंदगी में एक छाप छोड़ जाते हैं, जिन्हें आप भूला नहीं पाते। `पीकू’ में अमिताभ बच्चन और दीपिका पादुकोण वाले किरदार मुझसे कहीं-न-कहीं टकराए हैं। `गुलाबो सिताबो’ की कहानी मैंने कुछ वर्ष पहले शुजीत सरकार को सुनाई थी। शुजीत सरकार ने जब कहानी अमित जी को सुनाई तो उन्हें ये बड़ा दिलचस्प लगा कि लालची मिर्जा हवेली के चक्कर में अपने से १५ वर्ष बड़ी बेगम से निकाह करता है।

आपने फिल्म की कहानी का ताना-बाना कैसे बुना?
शुजीत सरकार के साथ २०११ में फिल्म `विकी डोनर’ से मेरी शुरुआत हुई थी। एक अच्छी अंडर स्टैंडिंग है हम दोनों में। `विकी डोनर’ में आयुष्मान थे, जबकि फिल्म का निर्माण जॉन अब्राहम ने किया था। फिल्म `पीकू’ और `गुलाबो सिताबो’ में बच्चन सर। कहानी, किरदार, स्टारों के डेट्स यह सभी देखना पड़ता है।

क्या शुजीत सरकार के साथ कभी आपकी अनबन हुई है?
नहीं, ऐसा कभी नहीं हुआ। मैं उन्हें कहानी सुनाती हूं। कहानी के नैरेशन में उनके जो भी ओपिनियन होते हैं, मैं उन्हें वहीं क्लियर कर देती हूं। इसके बाद आशंका की कोई जगह ही नहीं बचती।

`गुलाबो सिताबो’ बड़े पर्दे पर रिलीज होती तो…?
फिल्म को बड़े पर्दे पर ही रिलीज करने की प्लानिंग थी। लेकिन अचानक हुए लॉकडाउन से कई फिल्मों की रिलीज डेट गड़बड़ा गई। बड़े पर्दे पर फिल्म देखने का अपना मजा होता है। अगर इस फिल्म को थियटर में रिलीज तक रोककर रखते तो इसका मुकाबला अन्य फिल्मों के साथ होता।

क्या फिल्मों में लेखकों को उचित पारिश्रमिक मिल रहा है?
अगर कहानी न हो तो फिल्म, टीवी धारावाहिक, वेब शो, नाटक आदि का निर्माण नहीं हो सकता। बॉलीवुड में बतौर लेखक आपकी फिल्म हिट होती है तो आपको काम मिलने लगता है। सफलता से बढ़कर कुछ और नहीं। सफलता ही लेखकों को उचित पारिश्रमिक दिलाती है।