सबकी आंखों से संसार को देखते हैं निमि

काल गणना की एक इकाई निमिष है। जितना समय पलक झपकने में लगता है, उसे निमिष कहते हैं। इस समय को पलक से उत्पन्न होने के कारण पल भी कहते हैं। पल के निमिष होने के पीछे एक पौराणिक प्रसंग जुड़ा हुआ है। वैसे संस्कृत में निमि का अर्थ पलक होता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी अदिति से बारह पुत्र हुए, जिनमें एक का नाम विवस्मान था। इन्हीं विवस्मान से वैवस्वत मनु का जन्म हुआ। वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था। वैवस्वत मनु के दस पुत्रों में से दूसरे पुत्र का नाम इक्ष्वाकु था। इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुल की स्थापना की।
इक्ष्वाकु के कुक्षि, निमि और दंडक नामक तीन पुत्र थे। इक्ष्वाकु के दूसरे पुत्र निमि मिथिला के राजा थे। इसी इक्ष्वाकु वंश में बहुत आगे चलकर राजा जनक हुए। राजा निमि के गुरु थे- ऋषि वशिष्ठ। निमि जैन धर्म के २१वें तीर्थंकर बने, जिन्हें नेमिनाथ भी कहा जाता है।
राजा निमि ने वैजयन्त नामक एक नगर बसाया था। इस नगर को बसाकर उन्होंने एक विशाल यज्ञ का अनुष्ठान किया। यज्ञ संपन्न करने के लिए महर्षि वशिष्ठ, अत्रि, अंगिरा तथा भृगु को आंमत्रित किया विंâतु वशिष्ठ का एक यज्ञ के लिए देवराज इंद्र ने पहले ही वरण कर लिया था इसलिए वे निमि से प्रतीक्षा करने के लिए कहकर इंद्र का यज्ञ कराने चले गए।
वशिष्ठ के जाने पर महर्षि गौतम ने यज्ञ को पूरा कराया। वशिष्ठ ने लौटकर जब देखा कि गौतम यज्ञ को पूरा कर रहे हैं तो उन्होंने निमि से मिलने की इच्छा प्रकट की। जब दो घड़ी प्रतीक्षा करने पर भी निमि से भेंट न हो सकी तो उन्होंने शाप दिया कि राजा निमि! तुमने मेरी अवहेलना करके दूसरे पुरोहित को वरण किया है इसलिए तुम्हारा शरीर अचेतन होकर गिर जाएगा। जब राजा निमि को इस शाप की बात मालूम हुई तो उन्होंने भी वशिष्ठ जी को शाप दिया कि आपने मुझे अकारण ही शाप दिया है। अतएव आपका शरीर भी अचेतन होकर गिर जाएगा। इस प्रकार शापों के कारण दोनों ही विदेह हो गए।
अचेतन होकर वे दोनों वायुरूप हो गए। वशिष्ठ ने ब्रह्माजी से देह दिलाने की प्रार्थना की तो उन्होंने कहा कि तुम मित्र और वरुण के छोड़े हुए वीर्य में प्रविष्ट हो जाओ, इससे तुम अयोनिज रूप से उत्पन्न होकर मेरे पुत्र बन जाओगे। इस प्रकार वशिष्ठ फिर से शरीर धारण करके प्रजापति बने। दूसरी ओर राजा निमि का शरीर नष्ट हो जाने पर ऋषियों ने स्वयं ही यज्ञ को पूरा किया और राजा को तेल के कड़ाह आदि में सुरक्षित रखा। यज्ञ कार्यों से निवृत होकर महर्षि भृगु ने राजा निमि की आत्मा से पूछा कि तुम्हारे जीव चैतन्य को कहां स्थापित किया जाय? इस पर निमि ने कहा कि मैं समस्त प्राणियों के नेत्रों में निवास करना चाहता हूं। राजा की यह अभिलाषा पूर्ण हुई। तब से निमि का निवास वायुरूप होकर समस्त प्राणियों के नेत्रों में हो गया। उन्हीं राजा के पुत्र मिथिलापति जनक हुए और विदेह कहलाए।
निमि के शरीर मंथन से चौदह पुत्र हुए, जिनमें से तेरह पुत्र संन्यासी हो गए और चौदहवें पुत्र जनक को राजा बनाया गया। चूंकि इनका जन्म शरीर के मंथन से हुआ था इसलिए इन्हें ‘मिथि’ भी कहा जाता है। इनका जन्म मृत शरीर से होने के कारण यही पुत्र जनक, बिना शरीर अर्थात बिना देह के जन्म लेने के कारण वैदेह और मंथन से उत्पन्न होने के कारण उस बालक का नाम ‘मिथिल’ हुआ। इसी आधार पर मिथिलापुरी की स्थापना हुई। निमि के पुत्रों के नाम–जनक, जीव व सुमंत, सार, अतिसार, अमृत, अभय, अंशुमान, अमन, आदि, अमित, अगाध, अनंत थे। वंश परंपरा में जनक के पुत्र भी जनक कहे जाते थे, जिनमें से एक जनक की पुत्री सीता से भगवान श्री राम का विवाह हुआ था। इस कथानक के आधार पर कहा जा सकता है कि आज भी राजा निमि सबकी आंखों में वायु रूप में विद्यमान हो संसार को देखते हैं।