" /> समझदार बनने का समय!

समझदार बनने का समय!

कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने वित्त विशेषज्ञ रघुराम राजन से डिजिटल माध्यम द्वारा संपर्क किया। यह अच्छा हुआ कि जनता ने भी इस बातचीत को सुना। ‘ लॉकडाउन’ के बाद पैदा होनेवाली कठिन आर्थिक परिस्थितियों का पक्ष भी समझा जा सका। कोरोना के कारण लॉकडाउन के दौरान गरीब हतबल हो गया है। उसका भविष्य अंधकार में है। गरीबों की सहायता के लिए सरकार द्वारा ६५००० करोड़ रुपए खर्च करना आवश्यक है, ऐसा रघुराम राजन ने कहा है। राहुल गांधी विरोधी दल के प्रमुख नेता हैं। वह संसद के सदस्य हैं। इसलिए उनका पक्ष और उनके द्वारा की गई चर्चा का मजाक उड़ाना ठीक नहीं होगा। लॉकडाउन के कारण देश पर आर्थिक आघात हुआ है। ऐसे में सबसे ज्यादा गरीब ही बेहाल होंगे। ऐसा रघुराम राजन का कहना है। आज जो गरीबी की सरकारी व्याख्या है, वह लॉकडाउन के बाद बदल जाएगी। परिस्थितियां कुछ ऐसी होंगी कि मध्यमवर्गीय और उच्च मध्यमवर्गीय लोगों में भी काफी हद तक लोग गरीब हो जाएंगे और वे भी आर्थिक रूप से कमजोर होने का प्रमाण-पत्र मांगेंगे।कोरोना के कारण अमेरिका जैसे संपन्न देश में भी बेरोजगारी का संकट पैदा हो गया है। वहां गत एक महीने में सवा चार करोड़ बेरोजगारों का पंजीयन हो चुका है और अब सरकार को उन सबकी व्यवस्था करनी होगी। अमेरिका में बेरोजगार भत्ता की व्यवस्था है, वैसी व्यवस्था हमारे देश में नहीं है लेकिन अमेरिका को भी पीछे छोड़ देनेवाली कतारें हमारे यहां भी लगेंगी और जो रघुराम ६५००० करोड़ की बात कर रहे हैं, वो तिनके की तरह उड़ जाएंगे। हिंदुस्थान में लगभग १० करोड़ लोगों का रोजगार खत्म हो जाएगा। ऐसा रघुराम कहते हैं, जोकि धक्कादायक है लेकिन रघुराम दिल्ली सरकार के करीबी नहीं हैं इसलिए उन्हें झूठा साबित कर दिया जाएगा और ढोल पीटा जाएगा कि सब-कुछ अच्छा चल रहा है। इससे परिस्थिति बदलेगी क्या? राहुल गांधी ने रघुराम से चर्चा की। फिलहाल लोगों के मन में जो सवाल पैदा हो रहे हैं, उन सवालों का आसान जवाब पाने का प्रयास गांधी ने किया है। कोरोना से जो परिस्थिति बनी है, उससे बाहर कैसे निकलें? अर्थव्यवस्था ठीक करने का तरीका क्या है? आदि मुद्दों पर गांधी ने चर्चा की। इस चर्चा से एक बात साफ हो गई कि अनिश्चितकाल तक लॉकडाउन चालू रखना अर्थव्यवस्था के लिए घातक है। सरकार को नियमों को तोड़ कर काम करना होगा और सत्ता तथा निर्णय का अधिकार सीमित न रखते हुए सर्वसमावेशी दृष्टिकोण अपनाना होगा। प्रधानमंत्री मोदी के प्रयास जारी हैं लेकिन अब आसमान ही फट चुका है। यह फटा आसमान एक ही विचार के लोगों की तुतारी बजाकर नहीं सिला जा सकेगा। लोगों की नौकरियां चली गई हैं। अब उनका घर कैसे चलेगा? प्रधानमंत्री ने अपने हर भाषण में कंपनियों, व्यापारियों और धनाढ्यों से कहा कि श्रमिकों और गरीबों के वेतन मत काटो। लघु उद्योगों की बात एक बार समझ में आती है। लेकिन प्रधानमंत्री की इस बात पर बड़ी कंपनियां भी प्रतिसाद देने को तैयार नहीं हैं। ‘लार्सन टूब्रो’ जैसी कंपनियों ने भी स्थाई कर्मचारियों को वेतन देने से साफ मना कर दिया है इसलिए भूमिहीन मजदूर, असंगठित क्षेत्रों के दिहाड़ी मजदूर और कॉन्ट्रैक्ट मजदूरों को गरीब बताकर यदि मदद करनी हो तो नौकरियां गंवानेवाले और मालिकों द्वारा वेतन देने से इंकार कर देने से पीड़ित वर्ग भी अब खुद को गरीबी की व्याख्या में शामिल होने के लिए प्रयासरत दिखेगा। प्रधानमंत्री की गरीबी कल्याण योजना शुरू है जिसका वार्षिक पैकेज सवा लाख करोड़ रुपए का है। सरकार वृद्धों और अनाथ आदि लोगों की आर्थिक सहायता करती रहती है लेकिन अब जो १० से १५ करोड़ मध्यमवर्गीय लोग हैं, वे भी गरीब हो जाएंगे। इन सबकी जीवनशैली व दिनचर्या कल तक अलग थी। उनका क्या होगा? उनके बच्चे अच्छे शिक्षण संस्थानों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। उस पर भी प्रभाव पड़ेगा। एक प्रकार से मध्यमवर्गीय लोगों का जीवन नर्क समान हो जाएगा। नीती आयोग को इस वर्ग के बारे में भी सोचना होगा तथा ‘नव गरीब’ वर्ग की क्या व्याख्या की जाए? यह भी तय करना होगा। महाराष्ट्र की बात करें तो २०१९-२० वित्तीय वर्ष में जमा राजस्व ३.१५ लाख करोड़ और खर्च ३.३५ लाख करोड़ है। अब लॉकडाउन के कारण राजस्व कम होता जाएगा और राज्य चलाना मुश्किल होगा। उसमें सरकारी कर्मचारियों का वेतन, प्रशासकीय खर्च, किसान कर्जमाफी और प्राकृतिक आपदाओं आदि का विचार करें तो योजनाएं अमल में कैसे लाई जाएं? केंद्र की हालत भी कुछ ऐसी होनेवाली है। भाषणों और आश्वासनों की एक सीमा है तथा लोगों के पेट की आग उस पर हमला कर देती है। लोगों को नियमों का पालन करना चाहिए, यह ठीक है। लेकिन सरकार को बदलते आर्थिक परिस्थिति के दौरान गरीब और मध्यमवर्गीय लोगों के बारे में विचार करना होगा। सबको एक साथ मिलकर काम करना होगा और दूसरों की भी बात सुननी होगी। अमेरिका के अध्यक्ष ट्रंप अमेरिका में बहुत बदनाम होते दिख रहे हैं। वह सिर्फ बोलते रहे। गलत बयानबाजी करते रहे और कोरोना फैलता गया। ६०००० लोगों ने अपनी जान गंवाई। ४ करोड़ लोग गरीब हो गए। फिर भी चीन को सबक सिखाने की बात शुरू है। हिंदुस्थान में हिंदुस्थान- पाकिस्तान का खेल, सांप्रदायिक व जातीय दंगों के प्यादों को खिलाना बंद करके देश को आर्थिक रसातल से कैसे निकाला जाए, इसपर सभी राजनीतिक दलों को काम करना चाहिए। प्रधानमंत्री को इसकी अगुवाई करनी चाहिए। देश उनके साथ खड़ा रहेगा। राहुल गांधी-रघुराम की चर्चा से आर्थिक संकट का विषाणु कितना गंभीर है, यह सामने आ चुका है। यह समझदार बनने का समय है।