" /> ‘सस्पेंस’ जारी!

‘सस्पेंस’ जारी!

फिलहाल पूरे देश में कोरोना वायरस ने कहर बरपाया हुआ है। हालांकि मध्य प्रदेश में सोमवार को जो राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला वो भी किसी वायरस से कम नहीं। फिलहाल विरोधी दलों की सरकारों की घेराबंदी करके सरकार गिराने के ‘राजनीतिक वायरस’ ने देश में कहर बरपाया हुआ है। अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, गोवा और कर्नाटक आदि राज्यों में इसका ‘असर’ दिखने लगा है। ये ‘वायरस’ असफल हुआ तो सिर्फ महाराष्ट्र में। यहां ये वायरस नहीं चला और उसी पर उलट गया। महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ सरकार नहीं बनते देखकर अजीत पवार के नेतृत्व में राष्ट्रवादी कांग्रेस को तोड़ने का प्रयास किया गया। वो प्रयास असफल हुआ। फिर भी सरकार को गिराने का कीड़ा बिलबिलाता रहा। केंद्र की सत्ताधारी पार्टी ने यही ‘प्रयोग’ मध्य प्रदेश में शुरू किया है। इसके अनुसार सोमवार को विधानसभा में कमलनाथ सरकार का पैâसला होने का माहौल था। वहां आज से बजट अधिवेशन की शुरुआत हुई। राज्यपाल लालजी टंडन के अभिभाषण के बाद उनके आदेशानुसार बहुमत संग्रह किया जाएगा, ऐसा कहा गया था। विधानसभा अध्यक्ष ने सोमवार को विषयपत्रिका में यह विषय उठाया ही नहीं और राज्यपाल के अभिभाषण के पश्चात विधानसभा को २६ मार्च तक स्थगित करने की घोषणा कर दी। स्वाभाविक है कि इससे कमलनाथ सरकार का पैâसला तब तक के लिए टल गया है। विधानसभा स्थगित भले हो गई हो फिर भी इस नाटक का नया मंचन कल अदालत में हो सकता है। वहां क्या होता है, कब तक होता है इस पर उस नाटक का ‘क्लाइमेक्स’ निर्भर करेगा। मध्य प्रदेश में ‘कर्नाटक’ होता है या ‘महाराष्ट्र’, ये अगले घटनाक्रमों के अनुसार तय होगा। कौन, कौन-सी चाल खेलता है, उसमें कौन बाजी मारता है, ये चालें सफल होंगी या असफल, राजनीति की बिसात पर कितने प्यादे यहां से वहां या वहां से यहां होंगे इस पर सब कुछ निर्भर होगा। इस दौरान अदालत का ‘हथौड़ा’ किस पर चलेगा ये देखना भी महत्वपूर्ण साबित होगा। मध्य प्रदेश विधानसभा कोरोना वायरस संक्रमण के कारण २६ मार्च तक स्थगित किए जाने की घोषणा विधानसभा अध्यक्ष ने की है। फिर भी सत्तांतर के ‘राजनीतिक वायरस’ की सक्रियता जारी रहने का माहौल बना हुआ है। सवाल इतना ही है कि जब पूरा देश कोरोना वायरस के खौफ में है, ऐसे में विरोधी दल के नेताओं के राज्यों में राजनीतिक दहशत का प्रयोग करने का ये वक्त है क्या? जिसकी लाठी उसकी भैंस का नियम राजनीति में लागू होता है। लेकिन कोरोना वायरस के कारण देश की आम जनता का जनजीवन और अर्थव्यवस्था ठप हो गई है, ऐसे में तो कम-से-कम राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन को टालने में कोई हर्ज नहीं था। हालांकि भाजपा ने कांग्रेस के नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके २२ समर्थक विधायकों को तोड़कर इस प्रदर्शन की शुरुआत कुछ दिनों पहले कर दी है। ये सिर्फ मध्य प्रदेश में ही नहीं हो रहा बल्कि गुजरात में भी कांग्रेस के चार विधायकों ने इस्तीफा दे दिया है। मध्य प्रदेश के ६ सिंधिया समर्थक विधायकों का इस्तीफा मंजूर कर लिया गया है। फिर भी १६ विधायकों का भविष्य अंधेरे में है। ये सब राज्यसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में हो रहा है। इसके लिए हर राज्य में भाजपा ने कांग्रेस में फूट डालकर उसे हतबल कर दिया है। मध्य प्रदेश और गुजरात के कांग्रेस विधायकों ने अचानक इस्तीफा दे दिया। ये सब किसी महत्वपूर्ण नैतिक कारणों के लिए नहीं दिया। ये गुजरात में राज्यसभा चुनाव के खेल को बिगाड़ने का प्रयोग शुरू है। गुजरात से लेकर झारखंड तक और कर्नाटक से लेकर अन्य राज्यों तक में जोड़-तोड़ का वायरस सक्रिय है। इस प्रकार दल-बदल कानून की धज्जियां किसी देश में नहीं उड़ी होंगी। मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके विधायक तथा गुजरात के ४ विधायकों की भाजपा ने कितनी कीमत गिनी होगी, ये जनता को समझना चाहिए। इतना सब होने के बाद भी सोमवार को कमलनाथ सरकार का पैâसला हुआ ही नहीं। ये जीवनदान अल्पजीवी साबित होता है या आगे कुछ और ही घटता है, ये देखना महत्वपूर्ण होगा। ये केंद्र सरकार बनाम राज्य सरकार और राज्यपाल बनाम विधानसभा का सत्ता संघर्ष है। इसका अंत क्या होता है, मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार बचती है या जोड़-तोड़ करनेवालों का पर्दाफाश यहां भी होता है इस पर निर्भर करेगा। फिलहाल मध्य प्रदेश में ‘सस्पेंस’ जारी है, इतना ही कहा जा सकता है!