" /> सांस्कृतिक आतंकवाद का सामना हमने हमेशा किया है!-गुफी पेंटल

सांस्कृतिक आतंकवाद का सामना हमने हमेशा किया है!-गुफी पेंटल

आजकल टीवी पर धार्मिक धारावाहिकों का पुनः प्रसारण शुरू हो गया है। दूरदर्शन पर ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ के बाद अब निजी चैनलों पर भी इनका प्रसारण हो रहा है। ‘महाभारत’ सीरियल फिलहाल विश्व भर में देखा जा रहा है। धारावाहिक ‘महाभारत’ के एक मुख्य किरदार ‘शकुनि’ अर्थात गुफी पेंटल से बात की अभय मिश्र ने। गुफी पेंटल ने ‘महाभारत’ से जुड़े कई रोचक व अनसुने किस्से ‘दोपहर का सामना’ के पाठकों के लिए सुनाए…

टीवी पर पुराने धारावाहिक फिर से प्रसारित हो रहे हैं। रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं, जबकि आज के डिजिटल विश्व में नई तकनीक से बने कई धार्मिक धारावाहिकों को उतनी सफलता नहीं मिल रही। इस पर आपका क्या कहना है?
– बचपन में हमारे माता-पिता हमें रामलीला दिखाने के लिए ले जाते थे। यह दिल्ली की बात है। हर साल वही रामलीला होती थी। फिर भी लोग जाते थे क्योंकि श्रद्धा से मंचन की जा रही रामलीला को देखने के लिए हम सब लालायित रहते थे। श्रद्धा से जब कोई चीज बनाई जाएगी तो अच्छी बनकर ही निकलेगी। डिजिटल व तकनीकी का प्रयोग होने से ज्यादा आपकी श्रद्धा और आपके संस्कार साकार होने चाहिए। हमें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि डिजिटलाइजेशन के दौरान हमारी संस्कृति को ठेस न लगने पाए। हमारे ग्रंथों का धार्मिक महत्व है ही, साथ ही ऐतिहासिक महत्व भी है और ये साबित हो चुका है।

डिजिटल का दौर है…
– डिजिटल काम कितना भी हो, जब तक उसमें हृदय को नहीं उड़ेला जाएगा, उसमें आत्मा नहीं होगी, तब तक अपेक्षित रिजल्ट नहीं आ पाएगा। देखिए उस समय बी.आर. चोपड़ा जैसे विद्वान लोग थे। वे खुद डबल एमए थे। डॉ. राही मासूम रजा और पंडित नरेंद्र शर्मा को कौन भूल सकता है? जब ये कथा सुनाते थे तब ऐसा लगता था कि ये खुद ही संजय हैं और हमें कथा सुना रहे हैं। आंखें बंद करके खो जाते थे और कथा सुनाते थे। हम लोग नोट करते रहते थे। इसके अलावा सतीश भटनागर और धर्मवीर भारती जैसे बड़े राइटर्स अपनी जान लगा देते थे। राजकमल जी जैसे बेहतरीन संगीतकार थे। आजकल इन सब चीजों की कमी है। वह गहराई नहीं महसूस नहीं हो पाती।

पुराने जमाने के धारावाहिकों का विविध चैनलों पर पुनः प्रसारण शुरू हुआ है। क्या नई पीढ़ी पर इसका असर पड़ता दिख रहा है?
– बिल्कुल! आप इनकी टीआरपी देख लीजिए। अमूमन थोड़ी सी टीआरपी होते ही लोग पार्टी करना शुरू कर देते हैं। लेकिन आज की एडवांस पीढ़ी भी घर में परिवार के साथ ये सारे धारावाहिक देख रही है। हमारे घर में भी एक छोटी बच्ची है, जो बैठकर पूरा धारावाहिक देखती है।

‘महाभारत’ धारावाहिक के आप खुद कास्टिंग डायरेक्टर थे। पहले से तय रोल ही सबको दिए गए या कुछ बदलाव भी करने पड़े?
– बदलाव तो हुए। जैसे दुर्योधन यानी पुनीत इस्सर को हम भीम का रोल देना चाहते थे। लेकिन जब हमने प्रवीण कुमार को देखा तो हमने वह रोल प्रवीण को दिया और पुनीत जी को वैसे भी दुर्योधन का ही रोल करना था। वही रोल उनको मिल गया। नितीश भारद्वाज विदुर के रोल के लिए आए थे लेकिन उनकी हिंदी और संस्कृत बहुत अच्छी थी। उसे देखते हुए हमने उन्हें कृष्ण की भूमिका दी। ऐसे ही अभिमन्यु के रोल के लिए गोविंदा और द्रौपदी के रोल के लिए जूही चावला का सिलेक्शन किया गया था। लेकिन दोनों को उस समय अच्छी फिल्में मिल गर्इं और दोनों ने फिल्म को प्राथमिकता दी। अर्जुन के रोल के लिए भी जैकी श्रॉफ का नाम था लेकिन उनकी डेट्स की दिक्कत थी और तब हमने फिरोज खान (अर्जुन) को वो रोल दिया।

‘महाभारत’ में सबकी कास्टिंग तो आपने की। लेकिन शकुनि के रोल के लिए आपकी कास्टिंग किसने की थी?
– यह तो चोपड़ा साहब और डॉ. राही साहब ने दिया। दरअसल, जब मैं सबका ऑडिशन लेता था तो सिलेक्शन करके उनके यहां भेज देता था। फिर आगे उनका निर्णय होता था। जब बात शकुनि के रोल की आई तो चोपड़ा साहब ने कहा कि यह रोल तो तुमको ही करना है। दरअसल, चोपड़ा साहब की एक सीरीयल ‘बहादुर शाह जफर’ में मैंने मुख्य विलेन मेडकॉफ की भूमिका निभाई थी और वे मेरी एक्टिंग से अच्छी तरह वाकिफ थे।

‘महाभारत’ धारावाहिक बनाने के पहले इस पर खूब रिसर्च भी किया गया होगा!
– जी बहुत! चोपड़ा साहब का कमरा पुस्तकों से भरा होता था। ‘महाभारत’ से संबंधित लगभग हर किताब वहां थी। इसके अलावा हमने पुणे स्थित भंडारकर इंस्टिट्यूट का भी सहयोग लिया था। गोरखपुर गीता प्रेस सहित हर जगह से ज्यादा-से-ज्यादा जानकारी इकट्ठा की गई।

आजकल वेब सीरीज का दौर है। इस प्लेटफार्म पर बोल्डनेस और हिंसा का बोलबाला है। क्या इस प्लेटफार्म पर धार्मिक सीरीज की कोई संभावना दिखती है?
– नहीं, मुझे नहीं लगता कि यह प्लेटफार्म धार्मिक सीरीज के लिए सही रहेगा।

त्रेता और द्वापर युग में घटी घटनाएं कलियुग में कितना प्रभाव रखती हैं?
– उसका प्रभाव आज भी है। कितना भी कम मानिए तो लगभग १० हजार साल पहले की बात होगी। रामायण काल से शुरू कीजिए। फिर महाभारत काल देखिए और उसके बाद भी, इतने विदेशी आक्रांताओं से लड़ते-जूझते हुए हम आज भी खड़े हैं। हम पर इतने हमले हुए। हमारे जनेऊ जलाए गए। हमारे बच्चों को जलाकर मार डाला गया। दीवारों में चुनवा दिया गया। फिर भी हमारी भारतीयता खत्म नहीं हुई तो अब कैसे होगी? और होगी भी नहीं? हम बाहर से मॉडर्न हैं लेकिन भीतर हमारे संस्कार जीवित हैं। हालांकि हमें आजादी है कि हम कुछ भी देखें और यह जो बाहरी आक्रमण हैं। वेब सीरीज कहो या अन्य माध्यमों से तो हमारी संस्कृति पर हमला हो रहा है। यह हमेशा से होता आया है। इन सबके बावजूद हमारी महिलाएं आज भी साड़ी पहनने को ही प्राथमिकता देती हैं। एक प्रकार के सांस्कृतिक आतंकवाद का सामना हमने हमेशा किया है।
आगे आपकी क्या योजनाएं हैं? हमारे पाठकों के लिए कोई संदेश?
– अपना काम ईमानदारी से करो। आत्मा से करो। इससे खुशी मिलेगी और संतुष्टि भी। वैसे तो सबको अपनी औकात पता चल गई है। कोरोना ने सबको एक जैसा बना दिया है। सब घरों में दुबके पड़े हैं। कोरोना किसी को नहीं पहचानता। कोई भेदभाव नहीं करता। प्रकृति हमें हमारी औकात बता रही है कि आप अपनी औकात में रहो। हमने आपको बनाया है, आपने हमको नहीं बनाया।