" /> साकार होने जा रही दशकों की प्रतीक्षा , शताब्दियों का संघर्ष

साकार होने जा रही दशकों की प्रतीक्षा , शताब्दियों का संघर्ष

-रामजन्मभूमि के मुक्ति संघर्ष में महंत अवैद्यनाथ, महंत रामचंद्र दास, अशोक सिंहल, केके नैयर, गुरुदत्त सिंह और महंत अभिराम दास की रही महत्वपूर्ण भूमिकाएं
– करपात्री जी और महाराज पाटेश्वरी सिंह ने लिखी 1947 में बनाई थी मुक्ति की योजना
पांच अगस्त को रामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण की दशकों की प्रतीक्षा औऱ शताब्दियों का संघर्ष साकार होने जा रही है l
पांच अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए भूमि पूजन करने के लिए अयोध्या पहुंच रहे हैं। जब-जब श्री रामजन्मभूमि आंदोलन, मंदिर निर्माण और जन जागरण की चर्चा होगी, तो अयोध्या के दिगंबर अखाड़ा के श्रीमहंत परमहंस रामचंद्र दास, गोरखपुर स्थित नाथ संप्रदाय की आचार्यपीठ गोरक्षपीठ के श्रीमहंत अवैद्यनाथ और विश्व हिंदू परिषद अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंहल हमेशा शिखर पर होंगे।
वर्ष 1949 में 22/23 दिसंबर की रात्रि जब श्री रामजन्मभूमि के गर्भ गृह में राम लला का प्राकट्य हुआ तब भी तीन लोग मुख्य भूमिका में थे। पहले थे। महंत अभिराम दास जिन्हें यह स्वप्न आता था कि राम लला गर्भ गृह में विराजमान होना चाहते हैं। दूसरे तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट ठाकुर गुरुदत्त सिंह तथा डीएम केकेके नैयर। महंत अभिराम दास ने जहां राम लला के प्राकट्य का मार्ग प्रशस्त किया, वहीं दोनों अधिकारियों ने अपनी आजीविका की बलि देकर भी राम लला को गर्भगृह से ना हटाया सके यह सुनिश्चित किया।

प्राकट्य की भूमिका तय करने में भी तीन लोगों की भूमिका अहम रही। 1947 के प्रारंभ में राजा पटेश्वरी प्रसाद सिंह ने एक यज्ञ का आयोजन बलरामपुर में किया। इस यज्ञ में डीएम केकेके नैयर, महंत दिग्विजय नाथ के साथ ही शंकराचार्य की पद्वी त्यागने वाले प्रसिद्ध संत स्वामी करपात्री जी महाराज सहित देश के साधु-संतों, वैरागियों और धर्माचार्यों का एकत्रीकरण हुआ। इस यज्ञ में केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं बल्कि देश के तीन प्रमुख स्थानों काशी विश्वनाथ, श्रीकृष्ण जन्मभूमि तथा श्री रामजन्मभूमि को मुक्त कराने की योजना पर चर्चाएं भी हुईं। उस समय हिंदू महासभा में महंत दिग्विजय नाथ का दबदबा बढ़ चुका था।

श्री रामजन्मभूमि का प्रकरण का पहले विशेष मोड़ 22 दिसंबर 1949 को श्री रामजन्मभूमि के विवादित स्थल पर श्री रामलला के प्राकट्य से आया। इसके सूत्रधारों में महंत परमहंस रामचंद्र दास प्रमुख थे। इस घटनाक्रम के पहले से ही महंत अवैद्यनाथ भी इस आंदोलन से जुड़ गए थे। उनका और उनकी पीठ का प्रभाव संतों-महंतों पर भी था। तीखे तेवर और हिंदू समाज को संगठित औऱ सुगठित कर सबल बनाने आकांक्षा रखने वाले महंत अवैद्यनाथ श्री रामजन्मभूमि के साथ ही गोरक्षा और अन्य हिंदू समाज से जुड़े मुद्दे पर मुखर रहते थे। सन 1949 के श्री राम लला विराजमान के प्राकट्य में भी उनकी प्रेरणा का भी विशेष योगदान था।

बीती सदी के 90 के दशक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और हिंदू जागरण मंच जैसे संगठन तेजी से सक्रिय हुए। इस आंदोलन को धार और अपार जनाधार वाला आंदोलन बनाने का श्रेय महंत अवैद्यनाथ और महंत परमहंस रामचंद्र दास की जुगलबंदी में जब विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंहल के शामिल होने के बाद मिली।