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‘साझा सत्य’ : समय की मांग

पवित्र रमजान का महीना चल रहा है। रमजानुल मुबारक के महीने में यूं भी इबादतें खूब होती हैं। लेकिन महामारी कोरोना के चलते बढ़ाए गए लॉकडाउन के दौरान यह और भी बढ़ गई है। लोग घरों में रहकर ही इबादतों में मशगूल हैं। यह अच्छी बात है। मौका मिलते ही सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर भी नजर मार ली जाती है ताकि देश-जहान की वर्तमान स्थिति से अवगत हुआ जा सके। खासकर लोगों की उत्सुकता कोरोना के मरीजों और मृतकों की संख्या जानने की होती है। ऐसे में अक्सर सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर मजहबी धुरंधरों की फौज एक दूसरे के धर्मों पर कीचड़ उछालने, एक दूसरे की बहन-बेटियों का चरित्रहनन करने उनको गाली देने में अपना कीमती वक्त देती नजर आती है। भले ही उनके आसपास के मोहल्लों में कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ़ रही हो, भले ही ऐसे लोग खुद सरकारी आदेशों की धज्जियां उड़ा रहे हों, भले ही ऐसे लोग किसी भी समाजसेवी कार्य को करने से कतराते हों, लेकिन ऐसे असंख्य महानुभाव सोशल मीडिया के रणबांकुरे बने बैठे हैं और लाइक्स, शेयर, रीट्वीट जैसी आभासी दुनिया को ही अपनी लोकप्रियता का पैमाना और दुनिया की सबसे बड़ी असलियत समझ बैठे हैं।

ऐसे लोगों की मानसिकता शायद यही होती है मानो अपनी एक पोस्ट से इन्होने सैकड़ों ‘विधर्मियों’ को मौत के घाट उतारकर अपने धर्म पर उपकार किया है और अपने-अपने ईश्वर को प्रसन्न कर लिया है। लेकिन इन नादानों को नहीं पता भूख, मजबूरी, गरीबी, तंगदस्ती किसी भी धर्म की सीमा से परे होती है और इंसानियत की तलबगार होती है। उसे किसी धर्म से कोई वास्ता नहीं है। उसे बस अपने और अपने आश्रितों के पेट भरने की आस होती है। इन समस्याओं से जूझता शख्स सारे प्रपंचों से दूर रोजी-रोटी के जुगाड़ में लगा रहता है। लेकिन शायद यह कड़वा सत्य विभिन्न दलों, संगठनों, व्यक्तियों द्वारा स्थापित आईटी सेल से प्रभावित सोशल मीडिया के योद्धाओं की समझ के बाहर की बात है।

पवित्र रमजान में रोजे, नमाज, तिलावत या अन्य इबादतों के बजाय नफरती सोशल मीडिया पर आकर गाली-गलौज में लिप्त मुसलमानों को क्या यह शोभा देता है। दूसरे धर्म पर उंगली उठाने से इस्लाम ने सख्ती से मना किया है। ‘ला इकराहा फिद्दीन’ (अल-कुरआन २:२५६) अर्थात, धर्म के मामले में कोई जबरदस्ती नहीं। ‘लकुम दीनकुम वलीय दीन’ (अल-कुरआन १०९:६) अर्थात, तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन, मेरे लिए मेरा दीन। इन आयतों के पैमाने पर देखा जाए तो मुसलमानों को सनातन धर्म, हिंदू धर्म या अन्य किसी भी धर्म से कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। कुरआन में ईश्वर इंसानों से मुखातिब होकर कहता है, ‘या अय्यूहल इंसान मा गरेका बी रब्बिल करीम’ (अल-कुरआन ८२:६) ऐ इंसान, तुम्हें अपने परवरदिगार के बारे में किस चीज ने धोखा दिया? यानी अपने रब को पहचानने के लिए मुसलमान होने की शर्त नहीं। एक ही रब की सब मखलूक हैं। अनेक धार्मिक किताबों, भौगोलिक रेखाओं और ऐतिहासिक घटनाओं ने भले ही लोगों को बांट रखा हो मगर जो बात अकाट्य है वो किसी एक परमेश्वर का होना, जिस तक पहुंचने के रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन इंसानियत का रिश्ता अटूट है।

ऐसे में मुसलमानों को चाहिए कि वो दूसरे धर्म के आराध्यों के प्रति किसी भी प्रकार के अपशब्दों का इस्तेमाल न करें। ऐसा करना खिलाफ-ए-इस्लाम, खिलाफ-ए-पैगंबर, खिलाफ-ए-कुरआन और खिलाफ-ए-अल्लाह माना जाएगा, क्योंकि कुरआन कहता है, ‘और खुदा के सिवा जिन्हें ये पुकारते हैं, तुम उनके प्रति अपशब्दों का प्रयोग न करो। ऐसा न हो कि वे हद से आगे बढ़कर अज्ञान वश खुदा के प्रति अपशब्द का प्रयोग करने लगें।’ (अल-कुरआन ०६:१०८) और यह बात बिल्कुल सच प्रतीत होती दिखाई देती है, जब सोशल मीडिया पर अल्लाह और उसके रसूल के खिलाफ अश्लील चित्रों और नाजेबा कलिमात का धड़ल्ले से उपयोग होता है। ऐसे में बहस-मुबाहिसे से परहेज करना हर मुसलमान का फर्ज बनता है। चुटकी भर का ज्ञान न होते हुए भी पहाड़ भर का अहंकार लेकर झूठी शान दिखाने से खुद के मजहब का ही मखौल उड़ता है। सवाल यह भी उठता है कि दूसरी तरफ से भी तो यही हो रहा है? तो जवाब यह है कि अभी इंसानियत जिंदा है और ऐसे लोगों को बड़ी संख्या में बिरादरान-ए-वतन खुद जवाब दे रहे होते हैं। याद रखें अल्लाह पवित्र कुरआन में फरमाता है, ‘इन्नल्लाहा मअस साबिरीन’ (अल-कुरआन ०२:१५३) बेशक अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है। इसलिए सब्र, धैर्य और नेकी का दामन थामे रखना भी हर मुसलमान का अखलाकी फरीजा है। बहुत ज्यादा हो जाए तो कानून का सहारा लें और सब्र बनाए रखें।

क्या ऊपर जिन आयतों का जिक्र किया गया है उस से यह ज्ञात नहीं होता कि मुसलमानों को कैसा होना चाहिए और मुसलमान होता कैसा जा रहा है? एक बात जरूर ध्यान में रखें कि यह बातें सिर्फ मुसलमानों के आचरण से संबंधित हैं न कि इस्लाम से। इस्लाम या कोई भी अन्य मजहब जहां से निकला और जिस रूप में निकला, जैसा तब था वैसा अब भी है। हां, इस्लाम के साथ-साथ अन्य धर्मों के मानने वालों का चरित्र जरूर न तो इस्लामिक रह गया है न अन्य धर्मावलंबियों का उनके धर्म के मुताबिक। इस्लाम की ‘वैश्विक बंधुत्व’ की भावना और सनातन धर्म की ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की शिक्षा एक जैसी है लेकिन इनके मानने वालों का आचरण आज वैसा नहीं रह गया है यह दुःख की बात है। एक बार अगर टीवी चैनल्स की बहस या सोशल मीडिया का बारीकी से अध्ययन किया जाए तो सच दिखाई देगा। लेकिन धर्मांधता के जहर ने सोचने-समझने की सलाहियत को कुंद कर दिया है। ‘मैं ही सत्य हूं’ का गहरे तक बैठ गया भाव ही इस समस्या की जड़ है। मुस्लिम समाज द्वारा इस जड़ता को तोड़ने की पहल करना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। पहल करने से ही दूसरी तरफ से भी सकारात्मक उत्तर के आने की आस रहेगी।

समानता, सहयोग, भाईचारा, समर्पण, त्याग, संतोष, क्षमा और बलिदान जैसी विशेषताओं का पाठ पढ़ाने वाले इस्लाम का लगता है कुछ धुर इस्लाम विरोधियों ने छुटभैये मुसलमानों की मदद से अपहरण कर लिया है। उसका मोहरा भी वही मुसलमान बने हैं जिनको सही इस्लाम की जानकारी नहीं है। वर्तमान दौर में इस्लाम के नाम पर इस्लाम को बदनाम और शर्मिंदा करने वाले घृणित अपराध उन लोगों द्वारा अंजाम दिए जा रहे हैं जो दुर्भाग्यवश खुद को ही सच्चा और वास्तविक मुसलमान बता रहे हैं। कम से कम इस्लाम की तारीख में तो ऐसा अंधेर कभी देखने को नहीं मिला। जहां तक धर्म के सिद्धांतों का सवाल है जो कुरआन के मुताबिक बुनियादी या शाश्वत है और सभी धार्मिक परंपराओं में एक समान है, उनमें बदलाव की न तो कोई आवश्यकता है और न ही ऐसा करना जरूरी है। ऐसा करने से कोई लाभ नहीं होना है। बल्कि ऐसा करने से सामाजिक दूरियां बढ़ने का भी खतरा बना रहेगा। सामाजिक एकता के लिए सही इस्लाम का अध्ययन मुसलमानों के लिए बेहद जरूरी है।

मौलाना अबुल कलाम आजाद अपनी किताब ‘तर्जुमानुल कुरआन’ में लिखते हैं, ‘सत्य एक है और सभी परंपराओं में समान है। परंतु उसके आवरण अलग-अलग हैं। हमारा दुर्भाग्य यह है कि दुनिया शब्दों की पुजारी है और अर्थ को अनदेखा कर देती है। सभी लोग एक परमेश्वर की उपासना करते हैं लेकिन उस परमेश्वर के अलग-अलग नामों को लेकर झगड़ते हैं।’ मौलाना आजाद इस साझी आध्यात्मिकता को ‘मुश्तरिक हक’ अर्थात ‘साझा सत्य’ कहते हैं। इस सत्य की खोज का जिम्मा मुस्लिम समाज को उठाना होगा। बार-बार दूसरे पर ऊंगली उठाकर खुद को अलग करने से आम मुसलमानों को तकलीफ हो रही है। संवाद का मार्ग अपनाना समय की मांग है। दरअसल धर्म, मजहब, पंथ का मकसद एक ऐसी नफ्सियाती रूहानियत और आध्यात्मिकता पैदा करना है जो खुदाई शफकत, ईश्वरीय करुणा और कुदरती खूबसूरती की अक्कासी कर सके लेकिन हो इसके बिलकुल विपरीत रहा है। अफसोस की बात यह है कि मजहब या धर्म, जो इंसानी इत्तेहाद पैदा करने का एक अहम जरिया है उसका इस्तेमाल इत्तेहाद को तोड़ने के लिए हो रहा है। तो फिर सवाल यह उठता है कि जिस साझा सत्य और धर्म के उद्देश्य की बात हो रही है उसे स्थापित कैसे किया जाए? उसे स्थापित करने के लिए धार्मिक कट्टरपंथियों को नहीं इंसानों से प्रेम करने वाले इंसानों को आगे आना होगा। यह काम मुश्किल जरूर है लेकिन नामुमकिन कत्तई नहीं है।