" /> साड्डा हक ऐथे रख! 

साड्डा हक ऐथे रख! 

विद्या बालन
`महिलाओं को अब तक राजनीति में वो स्थान नहीं मिला है जिसकी वो हकदार हैं। आप सभी ने नोटिस किया होगा कि सुषमा स्वराज जी ने कितना अच्छा काम किया और आखिरी सांस तक वो देश के लिए काम करती रहीं। इंदिरा जी , सोनिया जी, स्मृति ईरानी जी, इन सभी ने बहुत अच्छा काम कर दिखाया है पर राजनीति में महिलाएं अभी भी प्रâंट नहीं, बैक सीट पर हैं। हां, पिछले ४-५ वर्षों में महिला प्रधान फिल्मों का एक खास ऑडियंस बन चुका है और विमेन ओरिएंटेड फिल्मे भी १००-२०० करोड़ का बिजनेस कर सकती हैं, ये `नीरजा’, `मणिकर्णिका’, `नो वन किल्ड जेसिका’, `इंग्लिश विंग्लिश’ की सफलता ने साबित किया। आज नायिका प्रधान कहानियां लिखनेवाले लेखक हैं पर मेरा कहना यही है कि उनकी भी तादाद बढ़नी चाहिए। महिलाओं में इनर स्ट्रेंग्थ है और इसी शक्ति के आधार पर वो आगे बढ़ सकती हैं। विपरीत स्थितियों का मुकाबला कर सकती हैं।’
प्रियंका चोपड़ा-जोनास
`शायद यह बात मैंने आप सभी से पहले भी शेयर की होगी। चोपड़ा परिवार के सदस्य सभी गोरे चिट्टे हैं। मैं बचपन में थोड़ी सांवली थी। मुझे छुपी जुबान में अग्ली डक्लिंग भी कहा जाता रहा। लेकिन मेरे मम्मी डैडी जो पेशे से डॉक्टर्स थे, उन्होंने मुझमें कूट-कूटकर आत्मविश्वास भरा। मैंने मुझ पर होनेवाली टीका-विडंबना पर ध्यान कम दिया और मुझ में क्या प्लस पॉइंट्स हैं, उस पर जोर दिया। हर स्त्री को उसकी खामियां नहीं, खूबियों पर ध्यान देना ही होगा। महिला सशक्तीकरण उस समय संभव है, जब महिलाएं कई परेशानियों के बावजूद खड़ी हो जाएं और आगे बढ़ें। महिलाओं के रास्ते में मुश्किलें पैदा करनेवाले होते हैं। कई बार उसके अपने होते हैं और कई बार समाज। लेकिन सिर्फ दृढ़ शक्ति के आधार पर महिलाओं के लिए शिखर हासिल करना होगा।’
सोनम कपूर आहुजा
`मेरे घर -परिवार में पापा (अनिल कपूर ) ने हम दो बहनों (सोनम और रिया) और बेटा (हर्षवर्धन ) को बिलकुल एक सी ट्रीटमेंट हमेशा दी है। जब हर्ष बड़ा हो गया तब पापा-मम्मी से यह जिद की कि उसे दीदी का कमरा (सोनम का कमरा ) चाहिए था। लेकिन पापा ने उसे समझाया दीदी परिवार में तुम सबसे बड़ी है और उसे उसकी पसंद का कमरा देना होगा। पापा ने पढ़ने के लिए हम सभी को विदेश भेजा। अच्छी शिक्षा दी और अपना करियर चुनने की आजादी भी। मुझे लगता है अगर किसी भी लड़की को उसके घर में ही सम्मान आदर मिले तो यह पारिवारिक सीख -संस्कार में बदल जाती है।’
दीपिका पादुकोण
`इक्वीसवीं सदी में ऐसा कौनसा देश होगा जो महिला दिन नहीं मनाता होगा? लेकिन मुझे लगता है कि महिला दिन मनाने का यह समय रहा नहीं है। हर दिन ही महिला दिन है और हर दिन ही महिलाओं के आत्मसम्मान का दिन है। जब यह महिला दिन मनाने की विशेष परम्परा शुरू हुई है यह जताना पड़ रहा है कि महिलाओं को विशेष अधिकार दो ल। उन्हें एक समान ट्रीटमेंट दो। स्त्री और पुरुष एक से हैं। मैं ही नहीं, मेरी मम्मी उज्ज्वला, मेरी बहन अनिशा और डैड (प्रकाश पादुकोण) यही मानते चले आए हैं। हम लोगों को महिलाओं के सम्मान और उसके अस्तित्व की रक्षा के लिए क्यों नवरात्र या महिला दिन मनाया जाना चाहिए? मैंने अपने डैड को बैडमिंटन खेलते जन्म से देखा। डैड ने मुझे भी कोचिंग दी और उनका कहना था कि मैं उनसे बेहतर परफॉर्मर हूं। उन्होंने चाहा कि मैं इंटरनेशनल प्लेयर बनूं लेकिन कॉलेज में जाने के बाद मुझे मॉडलिंग और अभिनय में रुचि हुई। उन्होंने मुझे अपनी पसंद का करियर चुनने की आजादी दी। सिर्फ मैं ही नहीं, दुनिया की हर स्त्री मल्टी टास्किंग है और जमाने को स्त्री की मानसिक क्षमताओं पर संदेह नहीं करना चाहिए। स्त्री प्रबल है और हमेशा रहेगी। ‘
तापसी पन्नू
`अब महिला दिन के मौके पर आंदोलन, रोड शो काफी कम हो चुके हैं पर आज से १०-१५ वर्ष पहले यह सब बहुत होता था। खासकर महिलाओं की मांगों को लेकर। नारी मुक्ति महज झंडा लहराने से नहीं होती। खुद की जगह बनानी पड़ती है, यह मेरी निजी राय है। अक्सर मुझसे यह सवाल किया जाता है कि क्या मैं फेमिनिज्म को मानती हूं? क्या मैं फेमिनिस्ट हूं? दरअसल मैं सिर्फ इक्वल राइट्स पर विश्वास करती हूं। अगर महिलाएं पुरुषों से कम नहीं तो उनसे ज्यादा अधिकार मांगे ही क्यों? इसीलिए मैं एक समान अधिकार चाहती हूं।’