सात फेरों का साथ

सात फेरों का साथ मेरा तुम्हारा।
एक साथ चलने का प्रण हमारा।
सात बचन याद था हम दोनों को।
जन्मों के बंधन ने बांधा दोनों को।
तुम साथ-साथ चल भी रहे थे।
राहें भी तो एक थी हमारी।
मंजिल के करीब भी थे हम।
अचानक आया एक तूफान
चश्मे मोहब्बत में आया गुबार।
मझधार में साथ छोड़कर चले गए।
मुझे तन्हा, अकेला छोड़कर चले गए।
मुझे गुमान था उन सात फेरों पर।
मुझे गर्व था उन सात बचनों पर।
बचन दिया था तुमने मुझे।
मंजिल तक पहुंचंगे हम साथ साथ।
जिंदगी भर रहेंगे तुम हम साथ साथ।
मुझे गुमान था उन साथ फेरों पर।
मुझे गर्व था उन सात बचनों पर।
तुम जब तक मेरे माथे पर सजते रहे।
मेरा हाथ पकड़कर साथ-साथ चलते रहे।
मैं सारी दुनिया को हरा सकती थी।
हर मुसीबत का सामना कर सकती थी।
क्योंकि तुम्हें जीत लिया था मैंने।
तुमको मीत मान लिया था मैंने।
फिर भी तुमने छोड़ा है साथ मेरा।
तुम भूल गए वो सात फेरे।
पर मैं अब तुम्हारे हिस्से के।
बचन भी निभाऊंगी।
छोड़ गए हो तुम जो अपने पीछे
उनकी ढाल बन जाऊंगी।
अभी तक सिर्फ मैं ममता की मूरत थी।
अब तुम्हारे बिना मैं पत्थर भी बन जाऊंगी।
तुम इंतजार करना मेरा।
मैं तुम्हारी जिम्मेदारियां पूरी करके।
तुमसे उन सात फेरों का हिसाब करने आऊंगी।
उन सात फेरों का मैं ही वादा निभाऊंगी।
तुम्हारी गुड़िया मैं कहलाऊंगी।
-गुड़िया त्रिपाठी, लखनऊ

 

धरती की पुकार
धरती कह रही पुकार के
मत काटो जंगल और पहाड़ों को
मत पाटो पोखर और नालों को
मत दूषित करो नदियों और सागर को
न मानोगे तो ऐसा दंड दूंगी
भूकंप और आंधी-तूफानों से
इस दुनिया को डंस लूंगी
धरती कह रही पुकार के
फूलों से इस गुलशन को
मत बनाओ क्रांक्रीट का जंगल
कहां रहेंगे पशु-पक्षी और जानवर
सोचो तो जरा
विकास के नाम पर ऐ इंसान
तूने ये क्या कर डाला है?
प्लास्टिक की वस्तुओं का कर इस्तेमाल
नदी-नालों को प्लास्टिक के कचरे से भर डाला है
ये धरती कराह रही है
बाढ़ और तूफानी झंझावतों से
और भूकंप के झटकों से
इसी तरह तू करता रहा नादानी
तो बहुत पछताएगा
एक दिन तेरा अस्तित्व ही मिट जाएगा
धरती कह रही पुकार के
-विजय कुमार अग्रवाल, वसई, मुंबई

जीवन का सत्य
हमें जागना है तभी सजगता होगी।
लोग कहते हैं हम तो जागे हुए हैं।।
नहीं, नहीं, नहीं गहरी निद्रा में सोये हैं।
और वह निद्रा है अज्ञानता की माया की।।
भीतर से जागना है।।
स्व को जानकर है जागना।
जागना जीवन का सत्य है।।
ज्ञान के उछाल से भीतर का जागरण होता है।
विरोधाभास, विसंगतियों में हम जी रहे हैं।।
भीतर के जागने पर विसंगतियां दूर होंगी।
और तभी सही मायने में हम जी सकते हैं।।
नींद से जागना जीवन का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।
और इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए।।
स्व का जागरण बहुत जरूरी है।
भौतिकवादी ज्ञान से जीवन बेहतर नहीं होता।।
समस्याओं का समाधान नहीं मिलता।
सुख-सुविधाएं तो बहुत प्राप्त कर लीं।।
लेकिन फिर भी अशांति का वातावरण है।
‘स्व’ में जागना अपने आपको जानना है।।
अपने आप में होना ही जीवन का सत्य है।
सद्गुरु के मार्गदर्शन में जागना और।।
‘स्व’ की अनुभूति प्राप्त करना सहज, सरल और सुगम है।।
-आर.डी. अग्रवाल ‘प्रेमी’, खेतवाड़ी, मुंबई