" /> साथी जुटाते यूपी के सियासी सूरमा

साथी जुटाते यूपी के सियासी सूरमा

बिहार विधानसभा चुनावों के नतीजों ने खुद को खुदा समझ रहे यूपी के सियासी सूरमाओं को आईना दिखा दिया है। अब ये सूरमा बामुश्किल डेढ़ साल बाद होने वाली जंग में उतरने से पहले साथी योद्धा तलाश रहे हैं। इस बार उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में नए गठबंधन और प्रयोग दिख सकते हैं। जंग जीतने की तैयारी में जुटे राजनैतिक दल इसकी तैयारी में जुट गए हैं। आमतौर पर हाशिए पर बैठ असम्मानजनक समझौतों के दम पर मुट्ठी भर सीटों पर लड़कर वजूद बचाने वाले छोटे दलों की चांदी दिखती है। फिलहाल सबसे अहम असददुद्दीन औवैसी हो चले हैं जिन्हें पिछले यूपी चुनावों में किसी ने एक सीट देने लायक नहीं समझा था।
बिहार के प्रयोग के बाद यब स्वाभाविक माना जा रहा है कि यूपी विधानसभा चुनावों में ओवैसी बसपा सुप्रीमो मायावती के साथ गठजोड़ कर सकते हैं पर हालात बदल भी सकते हैं। यूपी में किसी से विधानसभा चुनाव पूर्व गठबंधन न करने पर अब तक आमादा रहीं मायावती ओवैसी को दर्जन भर सीटें देने को शायद तैयार हों। उधर ओवैसी को भी यूपी में मायावती को लेकर मुसलमानों में नाराजगी को देखते हुए शायद ये सौदा मुफीद न लगे। कांग्रेस में तेजी से ओवैसी के साथ गठबंधन की वकालत करने वालों की तादाद बढ़ी है। ओवैसी को भी कांग्रेस के साथ गठबंधन में न केवल कुछ दर्जन सीटें मिल सकती हैं बल्कि मुसलमानों का भरपूर साथ भी।
बिहार में छोटे-छोटे दलों को बड़े दलों के साथ गठबंधन में मिली सफलता के बाद उत्तर प्रदेश में दलितों और पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व करने वाले छोटे-छोटे दलों के हौसले बुलंद हैं। बिहार के परिणामों के बाद देश के सबसे बड़े राज्य में भी बड़े राजनीतिक दलों ने इन छोटे दलों को केंद्र में रख अपनी चुनावी रणनीति का खाका तैयार करना शुरू कर दिया है। इस रणनीति का अहम किरदार वो छोटे दल होने जा रहे हैं जिनकी अब तक पूछ नहीं थी। राज्य में विधानसभा के चुनाव २०२२ में होने हैं लेकिन हाल में हुए उप चुनावों में वोटों के बिखराव के चलते भारतीय जनता पार्टी को मिली एकतरफा बढ़त ने राजनीतिक दलों को छोटे दलों की ओर देखने और नए सिरे से रणनीति बनाने को मजबूर किया है।
उत्‍तर प्रदेश में मुख्‍य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी मुखिया अखिलेश यादव ने पिछले सप्‍ताह इसके साफ संकेत देते हुए कहा कि उनकी पार्टी अब छोटे दलों से ही गठबंधन कर चुनाव लड़ेगी। कम से कम यह तो तय हो गया है कि समाजवादी पार्टी से विद्रोह कर प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) बनाने वाले अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव अब भतीजे के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ेंगे।
गौरतलब है कि पिछले विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव कांग्रेस के साथ समझौता कर चुनाव मैदान में उतरे थे और बुरी तरह फेल रहे थे। इसके बाद २०१९ में हुए लोकसभा चुनावों में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा, लेकिन सपा को बहुत लाभ नहीं मिला। सपा सिर्फ पांच सीटों पर ही रह गई लेकिन बहुजन समाज पार्टी को १० सीटें जरूर मिल गर्इं। समाजवादी पार्टी ने पिछले उप चुनावों में राष्‍ट्रीय लोकदल के लिए एक सीट छोड़ी थी और यह संकेत है कि आगे भी वह रालोद से तालमेल कर सकती है। इसके अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सैनी बिरादरी में असर रखने वाले ‘महान दल’ के नेता केशव देव, अखिलेश यादव के साथ दिख रहे हैं। लोकसभा चुनाव में जनवादी पार्टी के संजय चौहान, सपा के चुनाव चिन्ह पर चंदौली में चुनाव लड़कर हार चुक‍े हैं और वह भी अखिलेश यादव के साथ सक्रिय हैं।
विपक्षी दल ही नहीं भारतीय जनता पार्टी ने २०१७ में अपना दल (एस) और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के साथ गठबंधन का प्रयोग किया था। उत्‍तर प्रदेश में पिछड़े वर्ग में प्रभावी कुर्मी समाज से आने वाली सांसद अनुप्रिया पटेल इस दल की अध्‍यक्ष हैं जबकि अति पिछड़े राजभर समाज के नेता ओमप्रकाश राजभर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का नेतृत्‍व करते हैं। भाजपा ने २०१७ के विधानसभा चुनाव में सुभासपा को ८ और अपना दल को ११ सीटें दीं तथा खुद ३८४ सीटों पर मैदान में रही। भाजपा को ३१२, सुभासपा को ४ और अपना दल एस को ९ सीटों पर जीत मिली थी। योगी आदित्‍यनाथ के नेतृत्‍व में बनी भाजपा सरकार में इन दोनों दलों को शामिल किया गया लेकिन सुभासपा अध्‍यक्ष और योगी मंत्रिमंडल में पिछड़ा वर्ग कल्‍याण मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने पिछड़ों के हक के सवाल पर बगावत कर पिछले साल भाजपा गठबंधन से नाता तोड़ लिया। अब राजभर कांग्रेस व सपा दोनो के साथ दिख रहे हैं तो मायावती से भी उनका दुराव नहीं है। भारतीय जनता पार्टी ने २०१९ के लोकसभा चुनाव में अपना दल (एस) के अलावा निषाद पार्टी से भी गठबंधन किया था। निषाद पार्टी के अध्‍यक्ष डाक्‍टर संजय निषाद के पुत्र प्रवीण निषाद भाजपा के चुनाव चिन्ह पर लोकसभा का चुनाव लड़े और जीते। हाल के उपचुनावों में संजय निषाद भाजपा के साथ खुलकर सक्रिय थे।
ओमप्रकाश राजभर बिहार के विधानसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा की राष्‍ट्रीय लोक समता पार्टी के गठबंधन में शामिल हुए जिसमें बहुजन समाज पार्टी भी शामिल थी पर अभी तय नही है कि यूपी में वो किसके पाले में खड़े रहने वाले हैं। ओमप्रकाश राजभर ने भागीदारी संकल्‍प मोर्चा बनाया है जिसमें दर्जन भर से ज्‍यादा दल शामिल हैं। इस मोर्चा में पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा की जनाधिकार पार्टी, कृष्‍णा पटेल की अपना दल कमेरावादी, बाबू राम पाल की राष्‍ट्र उदय पार्टी, राम करन कश्‍यप की वंचित समाज पार्टी, राम सागर बिंद की भारत माता पार्टी और अनिल चौहान की जनता क्रांति पार्टी जैसे दल शामिल हैं। राजभर का दावा है, कि मोर्चे का विकल्‍प किसी से भी गठबंधन के लिए खुला है।
उत्‍तर प्रदेश में कांग्रेस भी इस बार नए प्रयोग की तैयारी में है और वह भी छोटे दलों से समझौता कर सकती है। इसको लेकर मंथन और बातचीत का दौर भी शुरू हो गया है। कांग्रेस के सामने गठबंधन के लिए ओवैसी, राजभर, संजय चौहान, अपना दल समेत कई विकल्प हैं। हालांकि हाल के विधानसभा उपचुनावों में जिस तरह से छह में से तीन सीटों पर उसके प्रत्याशी सपा से भी वोटों के लिहाज आगे रहे उसके चलते भी कुछ नया दिख सकता है। बीते चुनावों की तरह एक बार फिर से सपा-कांग्रेस गठजोड़ की वकालत शुरू हो गई है।
बिहार के चुनाव परिणामों से उत्साहित असदुदीन ओवैसी की पार्टी आल इंडिया मजलिस-ए-इत्‍तेहादुल मुसलमीन की भी उत्‍तर प्रदेश में सक्रियता बढ़ने लगी है। ओवैसी ने २०१७ में अपने ३८ उम्‍मीदवार उतारे थे लेकिन उन्‍हें एक भी सीट पर कामयाबी नहीं मिली। इस बार पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश के उभरते दलित नेता चंद्रशेखर आजाद ने अपनी भीम आर्मी के राजनीतिक फ्रंट आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के बैनर तले उप चुनाव के जरिये दस्‍तक दे दी है। आजाद समाज पार्टी के उम्‍मीदवार को बुलंदशहर में खासे वोट मिले और अब ओवैसी के साथ उसके गठजोड़ की बातें चर्चा में हैं।
उत्तर प्रदेश में इन दिनों जहां भाजपा हमेशा की तरह जमीन पर काम करने में जुटी है तो उसके विरोध में खड़ी पार्टियां गठबंधन पर काम करने में जुटी हैं। बिहार की हालात को देखने के बाद कम से कम भाजपा समेत सभी दलों को लग गया है कि गठबंधन के बिना बेड़ा पार होना आसान नहीं है और चुनावी नैय्या में खेवैय्या की बड़ी भूमिका छोटे दल ही निभा सकते हैं।
(लेखक उत्तर प्रदेश अधिस्वीकृत पत्रकार संघ के अध्यक्ष हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति के जानकार और स्तंभकार हैं।)