सामाजिक तिरस्कार की शिकार घरेलू कामवाली महिलाएं

आज लगभग हर घर में घरेलू कार्य करने वाली महिलाएं प्रतिदिन की आवश्यकता बनती जा रही हैं। बच्चे, बूढ़े और जवान सभी घर में दैनिक कार्य करनेवाली महिलाओं पर हर कार्य के लिए निर्भर हो गए हैं। वे सब भी अपना समझकर घर के सभी कार्य करती है लेकिन आज भी कई घर-परिवारों में उससे बड़े तिरस्कार और अछूत की तरह व्यवहार किया जाता है, उसी महिला से जो आपके झूठे बर्तन और कपड़े धोती है, आपके घर की साफ-सफाई करती है, उसी को हम दोयम दर्जा देते हैं। हमारा बचा हुआ खाना और पुराने कपड़े देकर हम यह दिखावा करते हैं कि हमने उन पर बड़ा अहसान किया। घर की साफ-सफाई करने, खाना बनाने, बच्चों को संभालने, उनके खाने-पीने का ध्यान रखने से लेकर बुजुर्गों की देखभाल का काम आज हर घर में वही तो कर रही है। धीरे-धीरे वह इन सभी कार्यों की इतनी अभ्यस्त हो जाती हैं कि उसे घर के लोगों को बोलने से पहले ही उनके काम कर देने की आदत सी हो जाती हैं। इसे ही सामंजस्यता कहते हैं। आपसी समझ और विश्वास ही उसका सम्मान है। जिस तरह वह हमारा ध्यान रखती है उसी तरह हमें भी उसका और उसकी पारिवारिक आवश्यकताओं का ध्यान रखना चाहिए लेकिन बड़े दुख की बात है कि अपवाद के अलावा मानवता के नाम पर उनका दुख-सुख समझने की हम कभी भी कोई कोशिश नहीं करते।
जिस तरह हमें शारीरिक, मानसिक और आर्थिक समस्याएं होती हैं, वैसी ही समस्याएं उन्हें भी तो होती हैं। जिसके लिए हमें उनकी मदद जरूर करनी चाहिए। उनके बच्चों को भी स्कूल जाने का अधिकार है इसलिए उसे यह समय दें कि वह यह कार्य अच्छी तरह से कर सकें। शारीरिक श्रम उन्हें भी थका देता है इसलिए उन्हें भी घर पर कभी थोड़ा खाने या एक कप चाय अवश्य देनी चाहिए। वे भी बीमार पड़ सकती हैं या उनके परिवार में कोई बीमार हो तो उन्हें भी अवकाश देना जरूरी है क्योंकि अगर वो मानसिक रूप से स्थिर होगा, तभी हमारे घर का काम अच्छी से कर पाएगी। इतने शारीरिक श्रम के बाद आराम के लिए उन्हें भी कुछ अवकाश मिलने चाहिए।
वे भी इंसान हैं ऐसे में उनकी गलतियों पर डांटना-चिल्लाना जरूरी नहीं है, उन्हें प्यार से भी समझाया जा सकता है। कई घरों में इन महिलाओं के एक-दो छुट्टी होने पर भी वेतन से पैसे काट लिए जाते हैं। आखिर उनका घर-परिवार भी तो छोटे से वेतन से ही चलता है इसलिए उनके साथ थोड़ी हमदर्दी भी रखना आवश्यक है। वैसे भी घर में काम करने के बाद भी वे कितना कमा लेती होंगी?
यदि आप की घरेलू कार्य करनेवाली महिला ईमानदार और अच्छे व्यवहारवाली है तो उसे उस व्यवहार के बदले भी अच्छा व्यवहार मिले, वरना अच्छे व बुरे में क्या फर्क रह जाएगा। तीज-त्योहार के समय इन्हें भी कुछ बोनस और मिठाई देना हमारा कर्तव्य है। इनके पास पीएफ या मेडिकल इंश्योरेंस जैसी कोई सुविधा तो होती नहीं जबकि दूसरे ऑर्गेनाइज्ड सैक्टर में यह सुविधा होती है इसलिए आवश्यकतानुसार कभी-कभार दवा आदि के पैसे देकर उनकी हमें मदद करनी चाहिए। कई बार इनके साथ घरों में हिंसा और उत्पीड़न के साथ-साथ, यौन-शोषण भी होता है। उसकी शिकायत करने पर उनका काम छिन जाएगा इसलिए वे डर से चुप रहती हैं।
आमतौर पर शहरों में घरेलू कामकाज करनेवाली इन कम उम्र की युवतियों को गरीबी से जूझ रहे माता-पिता स्वयं ही बड़े शहरों में काम के लिए भेजते हैं। गरीबी के दलदल में पहले से उलझी कम उम्र की बच्चियां दलालों के जाल में सरलता से फंस जाती हैं। इसका शिकार अधिकतर नाबालिग बच्चे और महिलाएं ही बनते हैं। घरेलू कामकाज करनेवाली महिलाओं पर अत्याचार के कई किस्से हैं, जिसका कारण परस्पर विश्वास की कमी को बताया जाता है। हालांकि कभी-कभी कुछ घरेलू कार्य करनेवाली महिलाएं घर पर चोरी करना जैसे गलत कार्य भी करती हैं अथवा अपना काम ठीक से नहीं करती हैं। ऐसे में उन पर नजर रखना भी जरूरी है।
हमारी अर्थव्यवस्था में इनके लिए न कोई कानून हैं न कोई विशेष सहूलियत। स्वास्थ्य खराब होने पर भी इनके लिए चिकित्सा-सुविधा भी उपलब्ध नहीं है, पर अभी हाल ही में भारत सरकार ने गरीब परिवारों को आयुष्मान भारत की सुविधा दी है, जिसमें इनको ५ लाख तक की रकम अस्पताल में भर्ती के दौरान इलाज के लिए मिलेगी। इन प्रावधानों को हमें इन गरीब महिलाओं को ज़रूर बताना चाहिए।
हम सबको जो कि आर्थिक रूप से सक्षम हैं उन्हें घरेलू कार्य करनेवालों की ओर मदद का हाथ बढ़ाना चाहिए। इनके लिए आखिर हम नहीं सोचेंगे तो और कौन सोचेगा? वे भी हमारी तरह इंसान हैं, उन्हें भी सम्मान मिलना जरूरी है।
‘सुबह होती जिनकी सफाई से हमारे झूठे बर्तन की,
उसे कहां महसूस होती है भूख और आग पेट की,
दूसरों के घर को साफ रखते, खुद मैली ही रहती वो,
यह व्यथा और मजबूरी कौन समझेगा उस महिला की????’