" /> सामाजिक स्तर पर चरित्र निर्माण जरूरी!

सामाजिक स्तर पर चरित्र निर्माण जरूरी!

पिछले कुछ वर्षों में समाज में जिस तरह बलात्कार की घटनाओं में वृद्धि हुई है उससे पूरा देश चिंतित है। राजनैतिक बयानबाजियों से इतर सामाजिक स्तर पर बलात्कारियों को सजा देने की हमेशा से ही मांग होती रही है। पिछले दिनों हाथरस, बलरामपुर सहित देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी खबरें अखबारों की सुर्खियां बनीं, चैनल्स की स्क्रीन इन्हीं घटनाओं की गवाह बनीं और सोशल मीडिया तो खैर जैसे बहस का अखाड़ा बन गया। चिंताजनक बात यह रही कि कठुआ, उन्नाव, हाथरस और अन्य जगहों की बलात्कार की घटनाओं की पुष्टि के बावजूद बलात्कार करने वालों का साथ देने वाली खबरें भी आर्इं। हालांकि उन्हें जागरूक समाज की आवाज के सामने दबना पड़ा। फिर भी ऐसी स्थिति चिंताजनक है। अमूमन बलात्कार की घटना के बाद यह आवाज उठती रही है कि बलात्कारियों को फांसी दी जानी चाहिए। कई ऐसी आवाजें भी उठती हैं कि इस्लामी मुल्कों की तर्ज पर बलात्कारियों को सजा मिलनी चाहिए। ऐसी आवाजें उठाने वाले वह लोग भी होते हैं जिनकी पहचान अक्सर इस्लाम या मुस्लिम विरोधी की भी होती है। यह एक आश्चर्यजनक बात है कि कम से कम बलात्कार के मामले में इस्लाम की इस सजा पर बड़ी संख्या में सहमति नजर आती है।
समय की मांग है कि बलात्कार को अपराध की दुनिया में शीर्ष स्थान पर रखा जाए। सरकारी महकमों से जारी वार्षिक आंकड़ों और मीडिया द्वारा मिलने वाली सूचनाओं से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब पुलिस विभाग में दर्ज बलात्कार की घटनाओं की संख्या इतनी अधिक है तो फिर उनकी असल संख्या कितनी ज्यादा होगी। छेड़-छाड़, शारीरिक छेड़ख़ानी, बलात्कार, अपहरण और बलात्कार के बाद हत्या, नजदीकी रिश्तों में यौन उत्पीड़न, छ: महीने की बच्ची से लेकर अस्सी साल की वृद्धा तक के साथ दुष्कर्म, ब्लू फिल्में बनाकर अवैध धंधों और ब्लैकमेलिंग का कारोबार, बालिकाओं और युवतियों को देह-व्यापार के धंधे में फंसाने, विधवा आश्रमों की शरण में रहती महिलाओं के नियोजित यौन-व्यापार के रैकेट्स तथा सामान्य समाज में ‘स-सहमति व्यभिचार’ जैसी घटनाएं हमारे समाज के नैतिक अस्तित्व और चारित्रिक ताने-बाने के लिए धीमे जहर का काम कर रही हैं।
हालांकि अगर सही इस्लाम का गहराई से अध्ययन किया जाए तो ज्ञात होगा कि बलात्कार को लेकर इस्लाम ने बहुत ही सख्त नियम तय किए हैं। यौन-अपराध की समस्या को इस्लाम ने गंभीरता से लिया है। इस्लाम ने इस समस्या के हल की खातिर आध्यात्मिक और नैतिक स्तर पर, सामाजिक स्तर पर और कानूनी स्तर पर भी गहराई से काम किया है। इस्लाम की विचारधारा यह है कि समाज के चरित्रवान होने के लिए व्यक्ति का चरित्रवान होना पहली शर्त है। इस आधार पर अनेक नियम तय किये गए हैं जिस से इस्लाम को मानने वाला चरित्रवान बन सके। इस्लाम की एक और विशेषता यह है कि वह कानून का डंडा चलाने का काम बिल्कुल आखिर में करता है। इस्लाम कानूनी सक्रियता से पहले ज्यादातर काम अपराध हो जाने से बहुत पहले शुरू कर देता है। इस्लाम आध्यात्मिक और सामाजिक स्तरों पर चरित्रनिर्माण पर जोर देता है। अगर सचमुच उन शिक्षाओं का पालन किया जाए तो अपराध की घटनाएं आधी से अधिक खत्म हो सकती हैं। अगर ऐसा नहीं हो पाता है तभी बलात्कार या यौन उत्पीड़न की घटनाओं के लिए इस्लाम अत्यंत सख्त कानून और कठोरतम दंड का प्रावधान करता है। लेकिन समस्या यही है कि इन शिक्षाओं को आम मुसलमानों तक या समाज के अन्य हिस्सों तक पहुंचाने पर ध्यान नहीं दिया जाता।
यौन-अपराध न हों इसके लिए इस्लाम की शिक्षाओं और आदेशों को न मानने के बाद यदि कुछ लोग ऐसे यौन-अपराध कर बैठें तो इस्लाम की दृष्टि में ऐसे लोग इस्लाम की मान्यताओं की अवहेलना करने वाले मान लिए जाते हैं। इस्लाम फिर इस निर्णय पर पहुंचता है कि ऐसे लोगों की प्रकृति और चरित्र में इतना विकार आ चुका है कि न वे ख़ुदा से डरते हैं, न उन्हें जहन्नुम की सजा की चिंता है, न समाज में गंदगी पैâलाने से ऐसे लोग रुकेंगे। ऐसे लोग अपनी और परिवार की बदनामी की फिक्र भी नहीं करते। ऐसे लोगों को मानवीय मूल्यों के महत्व और गौरव-गरिमा की कोई चिंता होती है। इस्लाम की नजर में ऐसे लोग समाज के शरीर का नासूर और वैंâसर होते हैं। ऐसे में इस्लाम इस प्रकार के नासूर का ऑपरेशन कर या वैंâसरयुक्त अंग को काटकर समाज के शरीर से अलग कर देने की वकालत करता है। ऐसा करके वह बाकी शरीर यानि बकिया समाज को इस गुनाह से बचा लेने का प्रावधान करते हुए अपनी कानून व्यवस्था को क्रियान्वित करने पर जोर देता है।
सबसे पहले इस्लाम दोषी को पत्थर मार-मारकर हलाक कर देने अर्थात मार डालने की सज़ा देने को प्राथमिकता देता है। कुछ इस्लामी देशों में सर कलम कर दिया जाता है। अपराध की गंभीरता के हिसाब से कुछ मामलों में सौ कोड़े मारने की सज़ा भी निर्धारित की गई है। खास बात यह है कि जांच के बाद दोषी साबित होने वाले के प्रति फिर कोई नरमी नहीं बरती जाती, न ही इन सजाओं में कुछ काम-ज्यादा करने की गुंजाइश होती है। दया-याचना की सभी संभावना खत्म हो जाती है। न्यायाधीश या काजी को तो छोड़िये राष्ट्राध्यक्ष को भी दोषी की सजा में कमी करने या माफ करने का तनिक भी अधिकार नहीं होता क्योंकि यह ‘शरीयत का कानून’ है और इस्लाम की मान्यता है कि शरीयत अल्लाह के द्वारा बनाया गया कानून है। शरीयत की व्याख्या कुरआन शरीफ की आयतों और अनेक हदीसों में पैगंबर मोहम्मद साहब द्वारा की गई है। इस्लाम इस मामले में कितना सख्त है यह इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि, यह सारी सजाएं खुलेआम जनसामान्य के सामने देने का प्रावधान है, ताकि लोग दुष्कर्म करने से डरें। लोगों में इस्लामी कानून का डर बना रहे और यह खौफ दुराचारी लोगों की कामवासना की अनैतिक भावना पर असरकारक साबित हो।
सामान्यत: अनेक देशों में आपसी सहमति से किये व्यभिचार को अपराध नहीं माना गया है। लेकिन इस्लाम में इसे भी बराबर का अपराध माना गया है। सामान्य कानून ससहमति व्यभिचार को व्यक्तिगत मानव अधिकार मानता है, जबकि इस्लामी कानून उसे भी सामाजिक अपराध की श्रेणी में रखकर उसका सख्त विरोध करता है। इस्लाम का तर्क है कि जो व्यक्ति सहमति को आधार बनाकर व्यभिचार करे वह चरित्रहीनता की पस्ती में गिरता चला जाता है। उसका अगला कदम बलात्कार की ओर बढ़ जाने की संभावना हो सकती है। ऐसे में इस्लामी कानून के हिसाब से पहले कदम पर ही कड़ी सजा दे दी जाती है। आपसी सहमति के व्याभिचार पर भी सख्त सजा दी जाती है। सौ कोड़े की सजा अधिकतर ऐसे ही मामलों में देने का प्रावधान है।
सामान्यत: जब बलात्कारियों को सरेआम फांसी की मांग की जाती है तो बलात्कार के कारकों को पैदा करने, उसे बढ़ावा देने और इसके अवसरों की उपज बढ़ाने वाली व्यवस्था को दरकिनार कर दिया जाता है। इन परिस्थितियों में मृत्यु-दंड के औचित्य पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लग जाता है। पहले इसका निवारण आवश्यक है। इस्लाम अपनी व्यवस्था पर यह प्रश्नचिन्ह लगने ही नहीं देता, इसलिए उसका काम आसान हो जाता है। अभी तक हत्या सहित अनेक मामलों में ढील देने की वकालत अनेक मुस्लिम विद्वान कुछ तर्कों के आधार पर करते रहे हैं, लेकिन शायद ही किसी इस्लामी मुल्क से बलात्कारियों की सजा कम या माफ करने की मांग उठी हो। मुस्लिम विद्वानों को यह भी लगता है कि उनकी ऐसी मांग को कहीं महिला विरोधी, बलात्कार समर्थक या फिर शरीयत विरोधी न मान लिया जाए। यह डर एक तरह से अच्छा है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस्लामी कानून की तर्ज पर हमारे देश में संवैधानिक कानून बनाने की गुंजाइश है भी या केवल फांसी की सजा की मांग करना मात्र समय-समय पर छोड़ा जा रहा बस एक शगूफा है जिसकी वास्तविकता में कोई अहमियत नहीं है।