" /> सावित्री के पतिव्रत से हार गए थे यमराज : वट सावित्री व्रत आज

सावित्री के पतिव्रत से हार गए थे यमराज : वट सावित्री व्रत आज

हिंदू महिलाओं के लिए वट सावित्री व्रत का विशेष महत्‍व है। यह व्रत ज्येष्ठ महीने की अमावस्या को रखा जाता है, जो कि आज यानी 22 मई को मनाया जा रहा। मान्‍यता है कि इस व्रत को रखने से पति पर आए संकट चले जाते हैं और आयु लंबी हो जाती है। यही नहीं अगर दांपत्‍य जीवन में कोई परेशानी चल रही हो तो वह भी इस व्रत के प्रताप से दूर हो जाते हैं। सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुखद वैवाहिक जीवन की कामना करते हुए इस दिन वट यानी कि बरगद के पेड़ के नीचे पूजा-अर्चना करती हैं। इस दिन सावित्री और सत्‍यवान की कथा सुनने का विधान है। सावित्री अपने पति सत्यवान की मौत पर यमराज से भी टकरा गई थी और अपने पति की आयु लेकर ही वापस लौटी। उन्हीं सावित्री की याद में वट सावित्री व्रत रखा जाता है।

अपने पति की जान बचाने के लिए यमराज से टकराई थी सावित्री
वट सावित्री व्रत के पीछे मान्यता है कि इस दिन सावित्री ने यमराज के पाश से सत्यवान के प्राणों की रक्षा की थी इसी प्रकार हिंदू महिलाएं पति की लंबी आयु के लिए इस दिन व्रत रखती हैं। वटवृक्ष अर्थात बड़ या बरगद की आयु का मापदंड अभी तक विज्ञान में भी खोजा नहीं गया है। इसलिए विवाहिता महिलाएं इस व्रत के माध्यम से ये मांगती आई हैं कि उनके पति की आयु वट वृक्ष के जितनी ही हो जाए।

वट सावित्री व्रत का महत्‍व
वट का मतलब होता है बरगद का पेड़। बरगद एक विशाल पेड़ होता है। इसमें कई जटाएं निकली होती हैं। इस व्रत में वट का बहुत महत्व है। कहते हैं कि इसी पेड़ के नीचे स‍ावित्री ने अपने पति को यमराज से वापस पाया था। सावित्री को देवी का रूप माना जाता है। हिंदू पुराण में बरगद के पेड़े में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास बताया जाता है। मान्यता के अनुसार ब्रह्मा वृक्ष की जड़ में, विष्णु इसके तने में और शि‍व उपरी भाग में रहते हैं। यही वजह है कि यह माना जाता है कि इस पेड़ के नीचे बैठकर पूजा करने से हर मनोकामना पूरी होती है।
वट सावित्री पूजन सामग्री
सत्यवान-सावित्री की मूर्ति, धूप, मिट्टी का दीपक, घी, फूल, फल, 24 पूरियां, 24 बरगद फल (आटे या गुड़ के) बांस का पंखा, लाल धागा, कपड़ा, सिंदूर, जल से भरा हुआ पात्र और रोली।

व्रत की विधि
व्रत में महिलाएं प्रातः काल में स्नान के बाद ब्रह्माजी,सत्यवान सावित्री का पूजन करती हैं। वटवृक्ष की कच्चे धागे के साथ तीन बार परिक्रमा करती हैं। व्रत कथा सुनती है। इस दिन सास, जेठानी या घर की वरिष्ठ सदस्या के लिए बायना निकाला जाता है। पूजन समाप्ति पर बांस की टोकरी में ब्राह्मणों को यथासंभव दान देने का भी विधान है। पंडित संजीव ने अपील की कि पर्यावरण की रक्षा के लिए वटवृक्ष की डालिया तोड़कर ना लाएं बल्कि वटवृक्ष के निकट पहुंच कर पूजा अर्चना करें और अखंड सौभाग्य के लिए आशीर्वाद ग्रहण करें।

वट सावित्री व्रत की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार भद्र देश के राजा अश्वपति के कोई संतान न थी। उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए अनेक वर्षों तक तप किया जिससे प्रसन्न हो देवी सावित्री ने प्रकट होकर उन्हें पुत्री का वरदान दिया। फलस्वरूप राजा को पुत्री प्राप्त हुई और उस कन्या का नाम सावित्री ही रखा गया।

सावित्री सभी गुणों से संपन्न कन्या थी, जिसके लिए योग्य वर न मिलने के कारण सावित्री के पिता दुःखी रहने लगे। एक बार उन्होंने पुत्री को स्वयं वर तलाशने भेजा। इस खोज में सावित्री एक वन में जा पहुंची जहां उसकी भेंट साल्व देश के राजा द्युमत्सेन से होती है। द्युमत्सेन उसी तपोवन में रहते थे क्योंकि उनका राज्य किसी ने छीन लिया था। सावित्री ने उनके पुत्र सत्यवान को देखकर उन्हें पति के रूप में वरण किया।

इधर, यह बात जब ऋषिराज नारद को ज्ञात हुई तो वे अश्वपति से जाकर कहने लगे- आपकी कन्या ने वर खोजने में भारी भूल की है। सत्यवान गुणवान तथा धर्मात्मा हैं परंतु वह अल्पायु है और एक वर्ष के बाद ही उसकी मृत्यु हो जाएगी। नारद जी के वचन सुन राजा अश्वपति का चेहरा विवर्ण हो गया। ‘वृथा न होहिं देव ऋषि बानी’ ऎसा विचार करके उन्होने अपनी पुत्री को समझाया कि ऐसे अल्पायु व्यक्ति के साथ विवाह करना उचित नहीं है इसलिए अन्य कोई वर चुन लो।

इस पर सावित्री अपने पिता से कहती है कि पिताजी- आर्य कन्याएं अपने पति का एक बार ही वरण करती हैं तथा कन्यादान भी एक ही बार किया जाता है। अब चाहे जो हो, मैं सत्यवान को ही वर रूप में स्वीकार कर चुकी हूं। इस बात को सुन दोनों का विधि-विधान के साथ पाणिग्रहण संस्कार किया गया और सावित्री अपने ससुराल पहुंचते ही सास-ससुर की सेवा में रत हो गई. समय बदला, नारद का वचन सावित्री को दिन -प्रतिदिन अधीर करने लगा। उसने जब जाना कि पति की मृत्यु का दिन नजदीक आ गया है तब तीन दिन पूर्व से ही उपवास शुरू कर दिया। नारद द्वारा कथित निश्चित तिथि पर पितरों का पूजन किया। नित्य की भांति उस दिन भी सत्यवान अपने समय पर लकड़ी काटने के लिए चला गया तो सावित्री भी सास-ससुर की आज्ञा से अपने पति के साथ जंगल में चलने के लिए तैयार हो गई़।

सत्यवान वन में पहुंचकर लकड़ी काटने के लिए वृक्ष पर चढ़ गया। वृक्ष पर चढ़ते ही सत्यवान के सिर में असहनीय पीड़ा होने लगी। वह व्याकुल हो गया और वृक्ष से नीचे उतर गया। सावित्री अपना भविष्य समझ गई तथा अपनी गोद का सिरहाना बनाकर अपने पति को लिटा लिया। उसी समय दक्षिण दिशा से अत्यंत प्रभावशाली महिषारुढ़ यमराज को आते देखा। धर्मराज सत्यवान के जीवन को जब लेकर चल दिए तो सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ी। पहले तो यमराज ने उसे देवी-विधान समझाया परंतु उसकी निष्ठा और पति परायणता देख कर उसे वर मांगने के लिए कहा।

सावित्री बोली- ‘मेरे सास-ससुर वनवासी तथा अंधे हैं उन्हें आप दिव्य ज्योति प्रदान करें।’ यमराज ने कहा, ‘ऐसा ही होगा और अब तुम लौट जाओ।’ यमराज की बात सुनकर उसने कहा, ‘भगवान मुझे अपने पतिदेव के पीछे-पीछे चलने में कोई परेशानी नहीं है। पति के पीछे चलना मेरा कर्तव्य है।’ यह सुनकर उन्होने फिर से उसे एक और वर मांगने के लिए कहा। सावित्री बोली, ‘हमारे ससुर का राज्य छिन गया है, उसे वे पुन: प्राप्त कर सकें, साथ ही धर्मपरायण बने रहें।’ यमराज ने यह वर देकर कहा, ‘अच्छा अब तुम लौट जाओ परंतु वह न मानी।’

यमराज ने कहा कि पति के प्राणों के अलावा जो भी मांगना है मांग लो और लौट जाओ। इस बार सावित्री ने अपने को सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनने का वरदान मांगा। यमराज ने तथास्तु कहा और आगे चल दिए। सावित्री फिर भी उनके पीछे-पीछे चलती रही। उसके इस कृत से यमराज नाराज हो जाते हैं। यमराज को क्रोधित होते देख सावित्री उन्हें नमन करते हुए उन्हें कहती है, ‘आपने मुझे सौ पुत्रों की मां बनने का आशीर्वाद तो दे दिया लेकिन बिना पति के मैं मां किस प्रकार से बन सकती हूं, इसलिए आप अपने तीसरे वरदान को पूरा करने के लिए अपना कहा पूरा करें।’

सावित्री की पतिव्रत धर्म की बात जानकर यमराज ने सत्यवान के प्राण को अपने पाश से मुक्त कर दिया। सावित्री सत्यवान के प्राण लेकर वट वृक्ष के नीचे पहुंची और सत्यवान जीवित होकर उठ बैठे। दोनों हर्षित होकर अपनी राजधानी की ओर चल पडे। वहां पहुंच कर उन्‍होंने देखा कि उनके माता-पिता को दिव्य ज्योति प्राप्त हो गई है। इस प्रकार सावित्री-सत्यवान चिरकाल तक राज्य सुख भोगते रहे।

मान्‍यता है कि वट सावित्री व्रत करने और इसकी कथा सुनने से उपासक के वैवाहिक जीवन या जीवन साथी की आयु पर किसी प्रकार का कोई संकट आया भी हो तो टल जाता है।