साहित्यकार

मेरे विचार में साहित्य वह लेख या विचार या काव्य है, जिससे सबका हित हो। जिसे पढ़-सुनकर मनुष्य के जीवन में शुभ भावों का प्रस्फुटन हो और मनुष्य समाज कल्याण के हेतु प्रस्तुत हो सके। ऐसा सृजन करनेवाला साहित्यकार कहलाता है। विगत अनेक शताब्दियों में असंख्य साहित्यकारों ने हिंदी भाषा में प्रचुर और समाजोपयोगी सृजन किया है, जिससे आजतक लोग लाभ ग्रहण करते हैं। कालांतर में साहित्यकारों की एक बड़ी फौज खड़ी हो गई। अनेक ऐसे लोग इस क्षेत्र में कूद पड़े जिनका साहित्य से दूर-दूर का कोई नाता नहीं था। ये छद्म साहित्यकार हैं। ये बाहरी कलेवर से बड़े प्रबुद्ध और कलात्मक दिखलाई पड़ते हैं। खादी या लिनेन का कलफधारी कुर्ता-पायजामा पहने ये लोग हर सामाजिक जमावड़े की शान समझे जाते हैं। जैकेट पहनना भी इनके लिए अनिवार्य होता है। इनके मन में भले ही अपने स्वार्थों की पूर्ति का अंधड़ चल रहा हो, पर ये बाहरी रूप से बड़ी गंभीरतापूर्वक सामाजिक विषयों पर बहस करते हैं और अपने कुछ रटे-रटाए शेरों, मुक्तकों या सुवाक्यों द्वारा स्वयं की श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयास किया करते हैं। इनके पास अपना खुद का सृजन भले ही नगण्य हो, पर ये कलेक्शन के मामले में कुबेर को भी मात देने की क्षमता रखते हैं। जिनका दिमाग उस कोल्ड स्टोरेज की तरह होता है, जिसमें दूसरों के आलू-प्याज का भंडारण किया जाता है। इनकी वाकपटुता अद्भुत और स्मृति खूब तेज होती है। किसी भी काम के आदमी का दोहन वैâसे किया जा सकता है, इसका इन्हें खूब अनुभव होता है। ये छद्म साहित्यकार आजकल बादलों की तरह छाए हुए हैं।