" /> सिंधिया का सियासी एनकाउंटर!

सिंधिया का सियासी एनकाउंटर!

बीते सप्ताह ‘दिल्ली की सियासत’ चर्चाओं में रही। चर्चा अब भी है और शायद लंबे समय तक होती भी रहेगी। राजधानी में दल-बदल के रूप में सियासत की एक बड़ी घटना घटी, जिसने एक दल को खुशी मनाने का मौका दिया तो दूसरे दल को मंथन करने का। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा। कहते हैं, अपनी दशकों पुरानी पार्टी छोड़कर जब कोई बड़े कद का नेता दूसरे दल में जाता है तो यह सियासत में एक बड़ी घटना कही जाती है। ज्योतिरादित्य सिंधिया का भारतीय जनता पार्टी में आना भी उसी घटना का परिचायक है। ज्योतिरादित्य िंसधिया को भाजपा में जोड़ने के पीछे पार्टी भविष्य में बड़ा फायदा देख रही है। उनके जुड़ने से निश्चित रूप से िंहदी पट्टी का बड़ा राज्य मजबूत होगा। लेकिन इस घटना के बाद राजनैतिक पंडित भाजपा को नए नाम से पुकारने लगे हैं। भाजपा की नई पहचान ‘जोड़तोड़’ की बन गई है। स्थिर राज्य सरकारों को अस्थिर करने में तो उसे महारत हासिल थी ही, अब विरोधी दलों के शीर्ष नेताओं को लोभ-लालच देकर अपने पाले में लाने का खेल भी शुरू कर दिया। ज्योतिरादित्य सिंधिया को बड़ी प्लािंनग के साथ भाजपा ने अपने साथ जोड़ा है।
सिंधिया भाजपा को किस तरह का फायदा दे सकते हैं? इस गणित को आसानी से समझा जा सकता है। दरअसल, मध्यप्रदेश की राजनीति में सिंधिया राजवंश का बड़ा रसूख रहा है। ज्योतिरादित्य िंसधिया से पहले उनके पिता माधवराव िंसधिया और दादी विजया राजे िंसधिया का पूरे प्रदेश में दबदबा रहा है। िंसधिया परिवार के सियासी िंलक को देखते हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया का भाजपा में आना, पार्टी अपने लिए मजबूती की गारंटी के तौर पर देख रही है। लेकिन इन सबके बीच एक सवाल सबके मन में कौंधने लगा है कि सिंधिया को भाजपा क्या साध पाएगी? उनका रुतबा कांग्रेस में वैâसा था, सभी जानते हैं? क्या वैसा रुतबा भाजपा उन्हें देगी या दूसरे नेता ऐसा होने देंगे? ऐसे कई सवाल हैं, जिनका उत्तर आनेवाले समय में खोजा जाएगा?
सभी जानते हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस में करीब दो दशक बिताए। उनकी पहुंच सीधे हाईकमान तक थी। उनके दरम्यान कोई ऐसा बिचौलिया नहीं होता था, जो उन्हें रोकने की जुर्रत भी करता हो। भाजपा में ज्योतिरादित्य सिंधिया वैसा ही रुतबा चाहेंगे क्योंकि वह राजवंश परिवार से ताल्लुक रखते हैं। राजशाही की ठसक उनमें कूट-कूट कर भरी है। उस ठसक को वह कम नहीं होने देना चाहेंगे, पर संदेह इस बात का है कि क्या भाजपा उन्हें उनके मनमुताबिक आजादी दे पाएगी? अगर पार्टी किसी व्यक्ति विशेष को ऐसा रुतबा मुहैया कराएगी तो निश्चित रूप से पार्टी के भीतर विरोध की िंचगारियां उठने लगेंगी। मध्यप्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता वैâलाश विजयवर्गीय और ज्योतिरादित्य िंसधिया के बीच वॉक युद्व के किस्से शायद ही कोई भूले। उन्होंने बीते विधानसभा चुनाव में कहा भी था कि ज्योतिरादित्य िंसधिया का सियासी एनकाउंटर एक दिन मैं ही करूंगा। पूर्व की ऐसी कई घटनाओं को देखकर लगता है कि क्या भाजपा उन्हें साध नहीं पाएगी। पर कहते हैं कि सियासत में ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ की कहावत आज के नेताओं पर सटीक रूप चरितार्थ होती है। उनके झगड़े मात्र दिखावा भर होते हैं, अंदरखाने सभी एक होते हैं? लेकिन हो सकता पार्टी है, हाईकमान की सख्ती के बाद वैâलाश विजयवर्गीय और ज्योतिरादित्य िंसधिया पुरानी रारें भूल जाएं।
गौरतलब है भाजपा में ज्योतिरादित्य िंसधिया को राजशाही रुतबा इसलिए भी नहीं मिल सकता क्योंकि भाजपा में िंसधिया जैसे राजघरानों से ताल्लुक रखनेवाले नेताओं की लंबी कतार पहले से मौजूद है। ज्योतिरादित्य िंसधिया की बुआ और राज्यस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री महारानी वसुंधरा राजे िंसधिया भी पार्टी में हैं। उनको भी पार्टी के अन्य नेताओं की तरह सामान्य रहने की सख्त हिदायतें पहले से दी हुई हैं। स्पेशल रुतबे की चाह को लेकर एकाध बार वह भी रूठ चुकी थीं। एक बार पार्टी से भी किनारा कर चुकी थीं। लेकिन सियासी भविष्य की स्थिति को भांपकर शांत हो गर्इं थी। ज्योतिरादित्य िंसधिया का हाथ छोड़कर कमल पकड़ने के बाद सियासी पंडित एक और संदेह जता रहे हैं। उनका मानना है कि खुदा-न-खास्ता अगर ज्योतिरादित्य िंसधिया कमलनाथ सरकार नहीं गिरा पाए तो उनके लिए बड़ी मुसीबत खड़ी हो जाएगी। तब उनके समक्ष स्थिति ‘न घर की न घाट की’ जैसी हो जाएगी! फिर शायद भाजपा को भी इनकी जरूरत नहीं रहेगी। इसके अलावा दोबारा कांग्रेस में वापसी करना भी उतना आसान नहीं होगा।
ज्योतिरादित्य िंसधिया ने भाजपा को उस वक्त ज्वाइन किया है, जब कांग्रेस के दिन र्गिदश में हैं। भाजपा भी इस गणित को बखूबी समझ रही है। विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह। दोनों इस बात को भली-भांति समझ रहे हैं कि ज्योतिरादित्य िंसधिया कांग्रेस के गर्त के दिनों को मौकापरस्ती में बदल रहे हैं। खैर, भाजपा को मध्यप्रदेश की क्षेत्रीय राजनीति में और मजबूत पकड़ बनाने के लिए ज्योतिरादित्य िंसधिया नेता की जरूरत तो है ही। पर, एक बात यह भी सच है, अमित शाह के आंखों का तारा ज्योतिरादित्य िंसधिया तभी तक रहेंगे, जब तक उनके मन मुताबिक सब कुछ अच्छा होता रहेगा। िंसधिया अब से तीन महीने पहले भी कमलनाथ सरकार को गिराने की नाकाम कोशिश कर चुके हैं। तब नंबर गेमचेंजर में गच्चा खा गए थे। कमोबेश, ठीक उसी तरह जैसे महाराष्ट्र में अजित पवार ने भाजपा के साथ मिलकर गेम खेला था। कुछ घंटों के लिए भाजपा की सरकार बनवा भी दी थी लेकिन बाद में उनका पासा उल्टा पड़ गया। खैर, बाद में उनकी पार्टी में वापसी इसलिए हुई क्योंकि एनसीपी उनकी घरेलू पार्टी थी।
िंसधिया राज्यसभा सीट और केंद्रीय मंत्री पद पाने के लिए भाजपा में गए, इस गणित पर ज्यादा कोई विश्वास नहीं कर रहा। कहीं ऐसा तो नहीं इसके पीछे उनकी कोई गहरी सियासी चाल हो? कुछ ताजे उदाहरण सामने हैं। दिल्ली से ताल्लुक रखनेवाले कांग्रेस के कद्दावर नेता अरिंवदर िंसह लवली ने जब भाजपा का दामन थामा था तो एकाएक कोई विश्वास नहीं कर पा रहा था। उस वक्त उनपर आय से ज्यादा संपत्ति की जांच को लेकर तलवार लटकी थी। उससे बचने के लिए उन्होंने भाजपा ज्वाइन की थी। सूत्र बताते हैं कि ऐसा करने के लिए लवली ने बाकायदा कांग्रेस के बड़े नेताओं को बताया भी था। कमोबेश, हुआ भी वैसा ही। कुछ समय बाद लवली फिर कांग्रेस में आ गए थे। ज्योतिरादित्य िंसधिया के साथ भी ऐसी ही कुछ संभावनाएं जताई जा रही हैं। ज्योतिरादित्य िंसधिया और कमलनाथ के बीच टकराव शुरू से रहा है। हो सकता है िंसधिया अपने इस कदम से कमलनाथ को कमजोर करना चाहते हों।