सियासी आलाकमान अलगाववाद का मवाद

आजकल कश्मीर में देश विरोधी बयान देने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच एक तरह की प्रतिस्पर्धा चल रही है। घाटी के शीर्ष राजनीतिक नेताओं के बयानों का अध्ययन करें तो उनके और अलगाववादी नेताओं की बातों में कोई फर्क नहीं लग रहा है। चुनाव के माहौल में बयानबाजी तो होती है लेकिन देश की अखंडता को चुनौती दे रहे बयानों को अनदेखा कैसे किया जा सकता है।
जम्मू-कश्मीर के तीन पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती के पिछले कुछ महीनों में दिए गए बयानों को देखा जाए तो हैरानी होती है कि इनकी सोच किस ओर है। ८ अप्रैल, २०१९ को फारूक अब्दुल्ला ने कहा, ‘वे धारा ३७० को निरस्त करने की बात करते हैं। यदि आप ऐसा करते हैं, तो भारत में हमारा विलय निरस्त हो जाएगा। मैं अल्लाह की कसम खाता हूं, मुझे लगता है कि यह उसकी इच्छा है और हमें उनसे आजादी मिलेगी। अगर वो ऐसा करेंगे तो मैं देखूंगा कि कौन यहां भारत का झंडा फहराने के लिए तैयार होगा।’ इसी दिन घाटी में महबूबा मुफ्ती ने अपने चुनावी भाषण के दौरान कहा: ‘अगर संविधान के अनुच्छेद ३७० को खत्म कर दिया जाए तो यह भारत के साथ जम्मू-कश्मीर के संबंध को समाप्त करेगा।’ इससे पहले १ अप्रैल, २०१९ को फारूक अब्दुल्ला के सुपुत्र उमर अब्दुल्ला ने अपने भाषण में कहा कि वे राज्य में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के समकक्ष पद की पुनर्स्थापना करेंगे।
इन तीनों नेताओं की इस तरह की बयानबाजी करने के पीछे वोट बटोरने की मंशा हो सकती है लेकिन इनकी तरफ से दिए गए ऐसे बयानों से घाटी में अलगाव की सोच को और बढ़ावा मिल रहा है। अलगाववादी नेता घाटी में धर्म के नाम पर लोगों को गुमराह करते आए हैं और हिंदुस्थान विरोधी सोच को पैâलाने में पूरी ताकत झोंके हुए हैं। संवैधानिक पद पर रह चुके नेताओं की तरफ से आ रहे ऐसे बयानों से घाटी में लोगों की सोच पर गहरा असर पड़ रहा है। वैसे इन तीनों नेताओं ने कभी न कभी देश की अखंडता के लिए शपथ ली है। फारूक अब्दुल्ला राज्य के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं और यूपीए-२ के शासनकाल के दौरान केंद्रीय मंत्री भी रह चुके हैं। उमर अब्दुल्ला तो अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में विदेश राज्य मंत्री थे और बाद में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बने। अप्रैल २०१६ में महबूबा मुफ्ती राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं और लोकसभा की सदस्य रहीं। फारूक अब्दुल्ला और महबूबा वर्तमान में लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। तीनों को राज्य का शीर्ष नेता माना जाता है। अब्दुल्ला परिवार ने राज्य पर लगभग २५ साल राज किया और मुफ्ती परिवार ने लगभग ८ साल तक गद्दी संभाली और आज लोकसभा चुनाव में दोनों परिवारों की पार्टियों के बीच जबरदस्त टक्कर है। इस टक्कर में किसकी जीत होगी, यह घाटी की जनता तय करेगी।
घाटी में यह आम धारणा है कि जो नेता या पार्टी सत्ता में नहीं होते हैं वह अलगाववादियों की तरह बोलते हैं और अक्सर नेता दिल्ली में कुछ और कश्मीर में कुछ और बयान देते हैं। २० अगस्त, २०१८ को दिवंगत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित सर्वदलीय प्रार्थना सभा में बोलते हुए, फारूक अब्दुल्ला ने उनकी प्रशंसा की और भारत माता की जय के नारे और जय हिंद के साथ अपना भाषण समाप्त किया। १५ अगस्त २०१६ को अपने स्वतंत्रता भाषण के दौरान, महबूबा मुफ्ती ने अलगाववादियों को निशाना बनाते हुए यह भाषण दिया: ‘वे गुमराह कर रहे हैं और उनके नापाक मंसूबों के लिए बच्चों को एक ढाल बना रहे हैं, जबकि वे अपने बच्चों को हिंसा से दूर रख रहे हैं। मैं अलगाववादियों के बारे में नहीं बल्कि उन बिचौलियों के बारे में कह रही हूं, जिनके लिए यह (पथराव) एक व्यवसाय है। पता लगाएं कि उनके बच्चे कहां हैं जबकि मासूम बच्चों को विरोध प्रदर्शन के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।‘
उमर अब्दुल्ला ने १५ अगस्त, २०१२ को अपने भाषण में कहा, `आप (अलगाववादी) आगे आएं और बातचीत करें क्योंकि २० वर्षों में बंदूक कुछ नहीं दे पाया।’
इन बयानों को देखने के बाद विश्वास करना कठिन हो सकता है कि दृष्टिकोण वैâसे इतनी तेजी से बदल सकता है।
तीन नेताओं में से महबूबा मुफ्ती सबसे ज्यादा विभाजनकारी बयान दे रही हैं। अपने एक ट्वीट में वह कहती हैं: अगर लोगों के लिए खड़े होने से उन्हें अलगाववादी और राष्ट्रविरोधी करार दिया जाता है तो वह इसे सम्मान मानेंगी। महबूबा मुफ्ती ने वित्त मंत्री अरुण जेटली के उस लेख पर यह कहा जिसमें जेटली ने कहा था कि घाटी में नेताओं के बयानों से अलगाववादी सोच को पैâलाव मिल रहा है जो कि नए हिंदुस्थान को स्वीकार नहीं है। ४ अप्रैल, २०१९ को महबूबा मुफ्ती ने अपनी कश्मीर के बारामुला में चुनावी रैली के दौरान भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर हमला बोलते हुए धमकी दी और कहा, `अमित शाह सर, महबूबा मुफ्ती आपको बता रही हैं कि जिस दिन आप धारा ३७० को खत्म कर देंगे, उस दिन आप जम्मू कश्मीर में नाजायज कब्जा करनेवाली ताकत बनोगे जैसे इजरायल फिलिस्तीन में एक कब्जा करनेवाली शक्ति है।’
फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती की बातें मीडिया के सामने तो उजागर हो रही हैं, इनके अलावा घाटी में कई ऐसे नेता हैं जो हिंदुस्थान विरोधी बातें कर रहे हैं। नेशनल कॉन्प्रâेंस के नेता अकबर लोन बारामुला संसदीय क्षेत्र से पार्टी के उम्मीदवार हैं। वे अक्सर अपनी रैलियों के दौरान पाकिस्तान समर्थक नारे लगाते हैं। इस वर्ष २३ मार्च को कुपवाड़ा में एक रैली के दौरान उन्होंने कहा, ‘हमारा पड़ोसी मुस्लिम देश है; वह समृद्ध और सफल बना रहना चाहिए … अगर कोई उन्हें एक बार गाली देगा, तो मैं उसे यहां से दस बार गाली दूंगा।’ पिछले साल फरवरी में अकबर लोन ने पड़ोसी देश के खिलाफ भाजपा के नारों के जवाब में जम्मू-कश्मीर विधानसभा के अंदर पाकिस्तान समर्थक नारे लगाए। कोई कल्पना कर सकता है कि इस तरह के बयान आम लोगों की विचार प्रक्रिया को क्या कर सकते हैं। यह कहा जाता है कि नेताओं की समाज और देश को बनाने या बिगाड़ने में अहम भूमिका होती है। कश्मीर में इस तरह की बातें और बयान एक आम दृश्य बन चुका है।
यह पहली बार नहीं है कि घाटी में नेता देश विरोधी बयान दे रहे हैं। इतिहास में जाएं जो इस तरह की कई घटनाएं दर्ज हैं। पंडित नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच संबंध अच्छे बताए जाते थे लेकिन शेख अब्दुल्ला ने घाटी में एक प्लिबिसाइट प्रâंट बनवाया जिसका काम ही था जनता में आजादी के सपने को पैâलाना। इस प्रâंट ने घाटी के हर गांव और शहर में अलगाववाद की सोच का बीज बोया। १९७५ में इंदिरा गांधी ने इस प्रâंट को बंद करवाया था लेकिन तब तक इस प्रâंट की गतिविधियों से घाटी में अलगाववाद की सोच ने घर कर लिया था। धारा ३७० और ३५ए की आड़ में घाटी में नेता अलगाव की बात कर रहे हैं। भाजपा इन बयानों का इस्तेमाल अपने राष्ट्रवादी एजेंडे को आगे बढ़ाने में कर रही है तो दूसरी तरफ कांग्रेस समेत विपक्ष अपनी आंख और कान बंद रखे हुए हैं लेकिन इस सब से घाटी में अलगाववाद की भावना गहरी होती जा रही है। किसी भी समाज या समुदाय या क्षेत्र को जोड़ने के लिए राजनीतिक पार्टियों व्`ाâी महत्वपूर्ण भूमिका होती है लेकिन कश्मीर में भिन्नता की सोच को गढ़ा जा रहा है। शायद यह एक बहुत बड़ा कारण है, घाटी को इस हाल में पहुंचाने का।