" /> सीमा से वापस लौटो!, वोट बैंक का कचरा बन गया!!

सीमा से वापस लौटो!, वोट बैंक का कचरा बन गया!!

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने स्थलांतरित मजदूरों के संदर्भ में जो ‘यू-टर्न’ लिया है, वह मानवतावादी नहीं है। अपने लोगों के साथ ही इस क्रूरता से पेश आना किसी को शोभा नहीं देता। साफ शब्दों में कहें तो इसे हाथ ऊपर उठाना कहते हैं और उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा हाथ ऊपर उठा देने के कारण ३०-३५ लाख हिंदीभाषी मजदूरों का जीवन बरबाद हो रहा है। कोरोना के कारण लॉकडाउन के दौरान मुंबई सहित राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में मजदूर वर्ग अटक गया। अब केंद्र सरकार ने उन्हें अपने राज्यों में लौटने की अनुमति दे दी है। उत्तर प्रदेश और बिहार के अधिकांश श्रमिक मुंबई सहित महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों में रहते हैं। यह आंकड़ा २५-३० लाख के आसपास होगा और इन लाखों लोगों की अपने गांव जाने के लिए भीड़ मची हुई है। सूरत शहर में उत्तर प्रदेश के हजारों मजदूर सड़कों पर उतर आए। उन पर लाठीचार्ज करना पड़ा। मुंबई में भी कुछ अलग स्थिति नहीं है लेकिन इन लाखों श्रमिकों को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री स्वीकार करने को तैयार नहीं। इन सभी श्रमिकों की कोरोना जांच करो और उसके बाद ही यहां भेजो, ऐसी टेढ़ी नीति अपनाकर योगी सरकार ने अपने ही लोगों को संकट में धकेल दिया है। दूसरे हिंदी भाषी राज्यों ने भी इसी प्रकार की नीति अपनाई है जिससे सिर्फ महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि अन्य राज्यों में अटके मजदूरों पर भी संकट है। महाराष्ट्र ने अब तक इन सभी का पालन-पोषण किया, सब-कुछ किया है। अब इस संकट के समय वे अपनी मातृभूमि वापस जाना चाहते हैं लेकिन उन्हें उनके गृह राज्य से ही अनुमति नहीं दी जा रही। योगी हों या बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उन्हें अपने लोगों के साथ ऐसा निर्दयी व्यवहार नहीं करना चाहिए। उस पर ये देखिए कि ये सरकारें अमीर और गरीब के बीच कैसे भेदभाव करती हैं। इसी योगी सरकार ने राजस्थान के कोटा में अटके हुए अपने विद्यार्थियों के लिए सैकड़ों बसें भेजीं और उन्हें बिना जांच के ही वापस ले आए क्योंकि वे अमीरों के बच्चे थे। लेकिन मजदूरों का कोई सहारा नहीं है। ये मजदूर अपने गृहराज्य में न आएं, यही ठीक है, यह भावना रखते हुए इसके लिए कई तरह के नियम व शर्तें बताई जा रही हैं। श्रमिकों को कैसे लाया जाए? उनके रेलवे और बस की टिकट कौन खरीदेगा? जैसे बड़े सवाल गूंजने लगे। रेलवे कहती है कि वह किसी को भी मुफ्त में नहीं छोड़ेगी। बस वाले भी यही कह रहे हैं और अपने श्रमिकों को वापस लाने के लिए राज्य सरकारें तैयार नहीं हैं। ऐसे में श्रीमती सोनिया गांधी इंसानियत के नाते आगे आर्इं और उन्होंने अपने-अपने राज्यों में जानेवाले श्रमिकों का किराया कांग्रेस पार्टी देगी, ऐसी घोषणा की। इस घोषणा के बाद कई लोगों को पेटदर्द शुरू हो गया। खुद काम करना नहीं है और दूसरा कोई करे तो ये भी उन्हें ठीक नहीं लगता। सोनिया गांधी ने श्रमिकों का यह भार उठाने के लिए जो कदम बढ़ाया है, इस पर अर्णब गोस्वामी महामंडल का क्या कहना है? उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों के मजदूर पूरे देशभर में फैले हुए हैं। महाराष्ट्र और गुजरात में इनकी संख्या ज्यादा है। कल तक ये मजदूर वर्ग कई राजनीतिक पार्टियों और नेताओं का ‘वोट बैंक’ बना हुआ था और मानो मुंबई-महाराष्ट्र का विकास इन्हीं के कारण हुआ है, ऐसा कहा जा रहा था। इसी क्रम में मुंबई में छठ पूजा और लाई-चना जैसे राजनीतिक भीड़ के सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हुए। अब इस मुंबई के बाहरी मालिक संकट के समय पलायन कर रहे हैं और उनके राजनीतिक मालिक और अभिभावक मुंह में मास्क का कपड़ा ठूंसकर घरों में बैठे हैं। इन श्रमिकों के लिए अब कोई नहीं खड़ा हो रहा। मुंबई सहित अन्य भागों में हिंदीभाषी वोटों के लिए प्रचार हेतु कई बार उत्तर हिंदुस्थान के मुख्यमंत्री आए हैं। अन्य हिंदीभाषी नेता भी घुसे हैं लेकिन आज हिंदी भाषियों के लिए उन्होंने अपने राज्यों के दरवाजे बंद कर लिए हैं। सीमा से ही लौट जाओ, ऐसी बात कहकर उन-उन राज्यों द्वारा ऐसा कहा जाना बेईमानी के लक्षण ही कहे जाएंगे। ३०-३५ लाख लोगों की कोरोना जांच करके उनका अभ्यंगस्नान कराकर हमारे राज्यों में भेजो, नहीं तो हम श्रमिकों को प्रवेश नहीं देंगे। ऐसा कहना बिल्कुल गलत बात है। दो देशों के बीच इस प्रकार का करारनामा हो सकता है लेकिन एक ही देश के दो राज्यों के बीच ऐसा नहीं होना चाहिए। ये श्रमिक भटके हुए कुत्ते-बिल्ली नहीं हैं। मानवता के नाते भी उनके राज्य उन्हें स्वीकार करने को तैयार नहीं। आखिर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने इन पलायनवादी मजदूरों से जो कहा वही सही लग रहा है, ‘महाराष्ट्र से तो चले जाओगे लेकिन अपने राज्य में जाकर क्या खाओगे?’ खाना छोड़ो, लेकिन तुम्हारे राज्य तो तुम्हें भीतर ही नहीं आने दे रहे। यह पालघर में हुए साधु हत्याकांड जितना ही अमानवीय और निर्मम मामला है। वोट बैंक का कचरा अब किसी को अपने आंगन में नहीं चाहिए।