" /> सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यम काल बन सकता कोरोना

सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यम काल बन सकता कोरोना

सूरत में मजदूरों का मिल मालिकों के खिलाफ विद्रोह कोरोना की तरह ही पहली चिंगारी है इसपर केंद्र के साथ-साथ देश के सभी राज्य सरकारों को ध्यान देने की जरूरत है। समय के साथ वेतन न मिलने की घटनाएं बढ़ती जाएंगी। जून माह में भयंकर संकट और भयंकर विद्रोह की भी आशंका है। मिल मालिकों को जून माह में मार्च से लेकर जून माह मतलब ४ माह का इकट्ठे कॅश क्रेडिट ऋण (सीसी) का एवं ओवरड्राफ्ट (ओडी) ऋण का ब्याज देना है, लगभग सारे टैक्स की तारीख जून कर दी गई है, तो उसी माह में टैक्स भी देना है। सरकार ने न तो टैक्स माफ किया है और ना ही ब्याज सिर्फ स्थगित किया है जिस पर ब्याज की लागत भी उद्यमी को ही वहन करना है। हालात ये है कि मार्च माह से अति जीवनावश्यक चीजों को छोड़ लगभग ९५ प्रतिशत उद्योगों की बिक्री शून्य है, एक पैसा खाते में नहीं आया है। मई तक भी आने की उम्मीद नहीं है, पुराना बकाया भी नही मिल रहा है, जून की बिक्री का पैसा भी तुरन्त नहीं मिलने वाला क्योंकि ज्यादातर खरीददार खुद नगदी संकट में होंगे, मार्च अप्रैल मई में एक भी पैसा खाते में क्रेडिट न होने के बाद मासिक वेतन व मजदूरी का भुगतान, फिर मार्च में एक साथ ४ माह का सीसी या ओडी का ब्याज, ज्यादातर टैक्स और कंप्लायंस का इकट्ठा बोझ उद्यमियों की कमर तोड़ेंगे, हो सकता है मजदूरों कर्मचारियों और उद्यमियों के बीच भी संघर्ष की जमीन तैयार हो जाये। मजदूरों के पलायन के बाद उच्च वेतन और पेशेवर वर्ग का भी पलायन हो सकता है। आज जिस घटना की शुरुआत हुई है सूरत में अगर इसे रोका नहीं गया तो भविष्य भयावह होने वाला है। हालांकि पलायन का दूसरा पहलू ये भी है कि तब केन्द्रीयकरण नहीं उद्यम और रोजगार का विकेंद्रीकरण देखने के साथ कस्बों का विकास देखने को मिलेगा।
यह संक्रमण अगर लम्बा चला तो सबसे अधिक मार खायेगा मध्य वर्ग और सूक्ष्म लघु एवं मध्यम सेक्टर। सूक्ष्म लघु एवं मध्यम वर्ग के सर्विस सेक्टर, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर एवं ट्रेडिंग सेक्टर के पास उतना शॉक अब्जोर्बेर नहीं होता की लगातार लग रहे इस झटके को वह उबार ले। जितने भी सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम हैं उनकी आयार्जन की क्षमता काफी घट गई है, सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम के कुछ स्थायी खर्च होते हैं जिन्हें आय हो न हो खर्च करने पड़ते हैं। ऐसे में जब जीवनावश्यक वस्तुओं के व्यापार को छोड़ किसी और व्यापार की बिक्री नहीं के बराबर है, सप्लाई चेन बुरी तरह रुकी पड़ी है, तब भी उन्हें ये खर्च करने हैं।

सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम के सामने सबसे बड़ी चिंता है की इस लॉकडाउन में वह अपने स्टाफ एवं मजदूरों को वेतन कहां से दे? जब बिक्री नगण्य है। जितने भी सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम हैं, कहीं न कहीं वह लार्ज इंटरप्राइजेज के ही वेंडर हैं और लार्ज इंटरप्राइजेज के ऊपर पड़ी मार का भार आज भी और आगे भी सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम पर ही आने वाला है, देनदारी वसूली के साथ साथ सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम के कॉन्ट्रैक्ट की साइज भी कम होने की सम्भावना है। लॉकडाउन में मजदूरों और सप्लाई चेन की समस्या तो है ही, लॉकडाउन के बाद मटेरियल और मजदूरों की अनुउपलब्धता, ग्राहक व्यवहार में परिवर्तन, रेट कट का दबाब, उत्पादन बंद करने की नौबत, नकदी संकट, एक साथ ब्याज और टैक्स पेमेंट का सनाक्त, सप्लाय चेन का संकट आदि से दो चार होना है। सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम का धंधा कम होने पर पहली मार ऐसे सूक्ष्म लघु एवं मध्यम वेतनभोगियों पर ही पड़ेगी।

सरकार को वेज सब्सिडी, बिजली की फिक्स्ड चार्ज की ६ माह तक माफी, सिर्फ प्रयोग में लाए गए बिजली पर ही बिल, भरे गए टैक्स के बराबर प्रतिभूति रहित ऋण नपा। एनसीएलटी की कठोरता को भी कम करे। सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम के बिक्री की चिंता को कम करने हेतु सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम से जो सरकारी खरीद की सीमा है, उसे ५० प्रतिशत तक किया जाए। वैधानिक टैक्स और कंपनी कानून की कई प्रक्रियाओं में तो राहत दी गई है लेकिन इस राहत की जून में समीक्षा कर फिर सितंबर तक बढ़ाया जाए। सूक्ष्म लघु एवं मध्यम को आसान ऋण, क्रेडिट रेटिंग के बिना और सिर्फ प्राथमिक प्रतिभूति के साथ सुगम बनाया जाय। दरअसल सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम को मौद्रिक राहत पैकेज की जगह बिजनेस चाहिए और सरकार इसके लिए सरकारी खरीद और लॉकडाउन में कैसे बिक्री बढ़े उस तरफ सोचना चाहिए।
ऐसा नहीं है की इस समस्या का इलाज नहीं है, इलाज है। सरकार को सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम के लिए कॅश फ्लो का इंतजाम बिना किसी अतिरिक्त भार के करना पड़ेगा। जब रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट, सीआरआर एवं एसएलआर के माध्यम से बैकों के पास तरलता पहुंच ही गई थी तो यह मोरेटेरियम सरकार कम से कम ६ माह कर सकती थी। साथ ही साथ जो ब्याज का भार भी पड़ रहा है, उसे सिर्फ ईएमआई राशि पर लेती बजाय पूरे बकाये राशि के, तो अच्छा रहता। क्योंकि राहत की राशि तो उतनी ईएमआई की राशि है। सरकार सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम के कर्जमाफी की जगह ब्याजमाफी तो सरकार कर ही सकती है। सरकार सभी तरह के ऋणों पर ब्याज दर कम करने का भी प्रस्ताव ला सकती है। बैंकों द्वारा अनावश्यक सुपर विजन, इंस्पेक्शन, न्यूनतम बैलेंस और पेनल जैसे चार्ज एवं पेनल ब्याज हटाने का भी प्रस्ताव ला सकती है। सबसे अधिक प्रभावित सेक्टर जैसे की टूरिस्ट, एविएशन, सप्लाई चेन पर सरकार चाहे तो विशेष पैकेज ला सकती है और जरुरत समझी जाए तो इंडस्ट्री के हिसाब से टैक्स हॉलिडे भी लाया जा सकता है।

यदि सरकार को लगता है की इससे राजकोषीय घाटा पर भार पड़ेगा तो वह कोरोना राहत फंड को टैक्स पेमेंट या सरकारी बांड से लिंक कर दे। देश के बड़े घराने जो सक्षम हैं और सैकड़ों करोड़ दे रहे हैं वही लोग जब इसे टैक्स देयता से एडजस्ट करने या सरकारी बांड में परिवर्तित करने के ऑफर से इस राशि को हजारों करोड़ में कर देंगे और ऐसे सरकार का टैक्स कलेक्शन भी  हो जायेगा तथा राजकोषीय घाटे की उस कमी की भी भरपाई हो जाएगी जो सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम से टैक्स न आने के कारण हो रही थी, सिर्फ कोरोना फंड पर ८०जी की छूट इसे आकर्षक बनाने के लिए काफी नहीं है, इस योजना से देश का राजकोषीय घाटा भी संभल जाएगा और सूक्ष्म लघु एवं मध्यम सेक्टर को भी बड़ी राहत हो जाएगी।