" /> सूफीवाद, सहअस्तित्व की शिक्षा

सूफीवाद, सहअस्तित्व की शिक्षा

कोरोना और लॉकडाउन के बीच मुस्लिम समुदाय का सबसे बड़ा पर्व ईद-उल-फित्र भी बीत गया। हर वर्ष ईद की तैयारियां, फिर ईद के दिन की चहल-पहल और कमोबेश तीन दिन तक रहने वाली ईद की खुमारी इस बार नदारद रही। मुस्लिम समाज ने इस बार सूझबूझ का सहारा लेते हुए बाजारों, मस्जिदों, ईदगाहों से खुद को दूर रखा। इक्का-दुक्का घटनाओं को छोड़ दें तो यह बात काफी हद तक संतोषजनक ही कही जाएगी कि मुसलमानों ने सरकार और प्रशासन की गाइडलाइन का मान रखा और ईद की नमाज घरों में ही अदा की। हालांकि ईद की नमाज को लेकर अलग-अलग गाइडलाइन जारी कर नमाज को अलग-अलग तरीके से पढ़ने की नसीहत की गई थी जिस से नमाज हो जाने तक काफी उहापोह की स्थिति भी बनी रही। यह बात काफी हद तक अखरने वाली थी, लेकिन जब मकसद बड़ा हो और नीयत साफ हो तो छोटे-मोटे वैचारिक मतभेद या धार्मिक पद्धतियों के तरीकों के विरोधाभास को दरकिनार कर दिए जाने चाहिए। हनफी, शाफई, मालिकी और हंबली के अलावा अहले हदीस, तटस्थ मुसलमानों का एक बड़ा बुद्धिजीवी वर्ग और हनफियों के ही दो मसलक देवबंदी और बरेलवी हजरात ने अपने अपने उलेमा की बताई तरकीबों से नमाज अदा की। यह सुकून वाली बात रही।
ईद-उल-फित्र की नमाज को लेकर चांद रात को अनेक मुस्लिम धर्मगुरुओं और दीन के जानकारों से चर्चा होती रही। सभी ने अपने-अपने तरीके को ही उचित और सही बताया। खैर, ईद की नमाजें तो अदा कर दी गयीं लेकिन एक सवाल अनुत्तरित रहा कि एक अल्लाह, एक रसूल, एक कुरआन होते भी आखिर ईद की नमाज को लेकर यह कन्फ्यूजन क्यों? एक सूफी विचारधारा से प्रभावित शिक्षित मुस्लिम मित्र से ईद के दिन चर्चा किये जाने पर उनका अलग ही तर्क सामने आया। उनके मुताबिक उन्होंने मय-जायद छः तकबीरों वाली ईद की नामाज भी पढ़ी, विशेष तरीके से अतिरिक्त सना, दरूद शरीफ के साथ पढ़ी जाने वाली चार रकअत वाली नमाज-ए-चाश्त भी पढ़ी और बिलकुल साधारण तरीके वाली २ रकअत नफिल नमाज-ए-चाश्त भी पढ़ी। उनके मुताबिक यह मेरे और मेरे अल्लाह के बीच का मामला है। न जाने अल्लाह को कौन सी अदा पसंद आ जाए। उनके मुताबिक शायद सब ही सही हों। या जो भी तरीका सही होगा अल्लाह उसे क़ुबूल करेगा। उनका तर्क था कि अल्लाह कोरोना महामारी और लॉकडाउन के बहाने ही शायद हमारा इम्तेहान ले रहा है। उनकी कई बातों से असहमत होते हुए भी बहुत हद तक कई बातों से मुत्तफिक होने की वजह यह थी कि ईश्वर भावनाएं देखता है।
सूफीवाद की यही खासियत है। वह हर हाल में खुद को ढालना जानता है। उसे कट्टरवाद से परहेज होता है। सूफीवाद या तसव्वुफ हमेशा से ही लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करता रहा है और मुस्लिम समाज में यह विवादित भी रहा है। सूफीवाद पर सवाल उठते रहे हैं कि, सूफीवाद या तसव्वुफ क्या इस्लाम का ही एक अंग हैं या यह केवल अल्लाह को अपने तरीके से पाने का मध्यमार्गी रास्ता है? अक्सर देखा गया है कि किसी भी वली की दरगाह पर सूफीवाद पर यकीन करने वाले इकठ्ठा होते हैं, ढोलक की थाप पर संगीत का समा बनता है, लोग वज्द में आते हैं, कव्वाली की महफिल में शामिल होकर और सारी दुनिया से बेखबर होकर बस अपने में मस्त हो जाते हैं। कुल शरीफ का विर्द करते हैं, नातिया कलाम और पीर-ओ-मुर्शिद के रिश्तों पर लिखे गए कलाम को पढ़ा या गाया जाता है और अपनी अकीदत का इजहार किया जाता है। सवाल यही निकलकर आता है कि क्या यही सूफीवाद या तसव्वुफ़ है? क्या इस्लाम का लक्ष्य ये है कि आदमी इस समाज से भाग कर एकांत में जा बसे या फिर इस समाज में रह कर ही सही मूल्यों को अपनाने की कोशिश करे? इस्लाम में ईश्वर के करीब रहने के कई रास्ते बताए गए हैं उनमें से ही निश्चिन्त, अलमस्त और मलंग होकर अल्लाह के करीब रहने वाले खुद को सूफीवाद से जोड़ते हैं। लेकिन यहां यह सवाल भी उठता है कि क्या तसव्वुफ उदारवादी इस्लामी संदेश देता है या फिर ये एक ऐसा बहाना है जो हर मनमर्जी की बात मनवाने के लिए एक तर्क बन गया है। लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है। खुद पैगंबर मोहम्मद साहब का व्यक्तित्व सूफियाना था।नबूवत के एलान से पहले सूफी दर्शन उनकी दिनचर्या और स्वभाव से ज्ञात हो जाता है। मोहम्मद साहब गार-ए-हिरा में कई-कई दिन और कई-कई हफ्ते मुजाहेदे और मुराकबे में गुज़ारा करते थे, जैसा कि सभी सूफियों, ऋषियों और मुनियों की दिनचर्या का यह महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
इस्लामी परंपरा में खुदा के संदेशों का प्रचार करने वाले रसूलों और पैगंबरों की संख्या एक लाख चौबीस हजार (१,२४,०००) बयान की गई है, जिनमें से कुरआन में विभिन्न शिक्षाओं की वजाहत करते हुए केवल पच्चीस (२५) पैगम्बरों के नामों का ही उल्लेख किया गया है। इसलिए, खुदा की वहदानियत और पैगंबर मोहम्मद साहब की नबूवत पर ईमान लाने के साथ एक मुसलमान पिछले सभी नबियों और रसूलों पर भी ईमान लाता है। खुद कुरआन करीम अपने अनुयायियों को खुदा के सभी नबियों पर ईमान लाने का हुक्म देता है जिन्होंने मोहम्मद साहब से पहले अपने दौर में क्षेत्रीय भाषाओं में खुदा के पैगाम की तबलीग की, अब चाहे उन्हें जिस भी नाम से भी जाना जाता हो। इसीलिए किसी भी धर्म के किसी भी आराध्य देव को बुरा न कहने की इस्लाम ताकीद करता है कि संभवतः वो अपने दौर के पैगंबर रहे हों। इस्लाम की मान्यतानुसार अल्लाह द्वारा भेजे गए इनमें से कई पैगंबरों की शिक्षा से संवादहीनता की कमी कारण एक इलाके या मुल्क के लोग दूसरे इलाके के लोगो से ना-वाकिफ रहे। हालांकि सभी का संदेश एक ही था। जिस-जिस पयंबर या पैगंबर ने जो वहदानियत और इंसानियत का इल्म दिया वह उस दौर और उस इलाके का मजहब कहलाया। जिसे मुसलमान कलमा कहते हैं, ‘ला ईलाहा इल्लल्लाह’ यानि ‘नहीं है कोई माबुद सिवाय अल्लाह के’, उसे ही सनातन धर्म ‘एकं ब्रह्म द्वितीय नास्ति नेह ना नास्ति किंचन’ कहता है। इसी प्रकार ‘एक ओंकार सतनाम’ या ‘गॉड इज वन अदरवाइज नन’ जैसे अनेक उदहारण हैं।
इतनी समानताओं के बावजूद यह स्वाभाविक बात है कि मुसलमानों ने अपनी पिछली मान्यताओं और संस्कृतियों और परंपरा से इस्लाम स्वीकार तो कर लिया लेकिन पूर्ण रूप से खुद को उनसे अलग करना आवश्यक नहीं समझा, जब तक उनसे इन नए इस्लामी सिद्धांत व मान्यताओं में बाधा पैदा होने का संदेह ना हो। पैगंबर के बाद का सहाबा का दौर हो, वली- अल्लाहों की बात हो या फिर अलग अलग मुल्कों में इस्लामी शासन हो उनमें सबका अपना-अपना दखल रहा है। इसीलिए सूफीवाद में हमें हर उस मुल्क से जुड़ी मान्यताएं मिलती हैं जहां सूफीवाद अपनी पहुंच बना पाया है। सूफीवाद की सबसे बड़ी खासियत रही है कि, जहां इस्लाम के चंद मसलक मजहब को लेकर बिलकुल सख्त रवैया रखते हैं वहीं सूफियों, औलियाओं ने अपनी करनी और कथनी दोनों के माध्यम से बहुलतावाद और सहअस्तित्व की शिक्षा दी है। मानवता के लिए उनकी सेवा और हर जाति, हर मजहब, हर वर्ग के लिए उनका सुलूक एक मिसाली नमूना है। इसलिए, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि हर धर्म के लोग वलियों की दरगाहों पर या वली सिफत लोगों के यहां जियारत के लिए पूरी श्रद्धा के साथ जाते हैं, मजारों की ज़ियारत करते हैं और सूफियों को अपना पीर मानते हैं।
कुल मिलाकर सारा मामला आस्था का है। मक्का-मदीना से लेकर कुंभ के मेले तक करोड़ों लोगों की सामूहिक आस्था देखने को मिलती है। हर साल वहां हादसों में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो जाती है फिर भी वहां जाने वालों की तादाद कम नहीं होती। यह एक तरह का प्रेम और आस्था है जो हर हाल में बनी रहती है। प्रेम को ईश्वर का दूसरा रूप भी शायद इसीलिए कहा गया है। दरअसल यह आस्था ही है जो किसी भी वस्तु के वजूद को महान बना देती है। सूफीवाद का जोर इसी शिक्षा पर अधिक होता है कि ईश्वर का साक्षात स्वरूप भावनाओं में नजर आए। यदि भावनाएं नहीं हैं और हम खूब ईश्वर को भज लें तब भी ईश्वर की हम पर कृपा नहीं हो सकती। तमाम ऋषियों, मुनियों, पैगंबरों, सूफियों, संतों ने यही तालीम दी है कि ईश्वर केवल और केवल भाव का भूखा होता है, भोग का नहीं। मन में बैर-भाव रखकर यदि हम ईश्वर आराधना करें, तो ऐसी आराधना औचित्यहीन होती है। इंसान अपनी पूजा, अर्चना, इबादत लाख करता रहे लेकिन अगर उसे इंसानियत का पाठ नहीं पता तो सब फिजूल है। इंसान हर हाल में अपने अखलाकी मयार यानि नैतिक मानकों से अफजल या हकीर ठहराया जाएगा और इसका हक सिर्फ़ अल्लाह पाक ने अपने जिम्मे रखा है। इसलिए किसी की इबादत पर किसी को ऊंगली उठाने से बचना चाहिए। इस बार की ईद की नमाज ने आम मुसलमानों को यह सीख तो जरूर दी होगी।