सेनाप्रमुख का सत्यवचन!

गत एक सप्ताह से पुणे में हिंदुस्थान सहित ५ देशों का संयुक्त युद्धाभ्यास रविवार को पूरा हुआ। इस युद्धाभ्यास में श्रीलंका, म्यांमार, भूटान, बांग्लादेश और हिंदुस्थान ऐसे कुल ५ देशों ने भाग लिया। नेपाल और थाईलैंड के प्रतिनिधि इस संयुक्त सैन्य युद्धाभ्यास में उपस्थित अवश्य थे किंतु इन दोनों देशों की सेना ने प्रत्यक्ष युद्धाभ्यास में भाग नहीं लिया। विशेषकर नेपाली सेना का युद्धाभ्यास में अनुपस्थित रहना अवश्य आश्चर्यजनक था। कयास लगाया जा रहा है कि चीन के दबाव के कारण या चीन के रोष के कारण नेपाली सेना ने खुद को इस युद्धाभ्यास से दूर रखा। कभी एकमात्र ‘हिंदू राष्ट्र’ रहे नेपाल ने केवल अपने प्रतिनिधि को भेजकर हिंदुस्थान से ‘औपचारिकता’ निभाई। इस संयुक्त सैन्य युद्धाभ्यास के समापन समारोह में हिंदुस्थान के सेनाप्रमुख जनरल बिपिन रावत ने चीन से आर्थिक मदद लेनेवाले देशों की अच्छी खिंचाई की। जनरल रावत ने कहा कि ‘मुफ्त में कुछ नहीं मिलता।’ चीन से मदद लेनेवाले देशों को यह समझना चाहिए और ये सच्चाई उन्हें जल्द ही समझ में आ जाएगी। चीनियों का षड्यंत्र है कि हिंदुस्थान के सीमावर्ती देशों से दोस्ती कर, उन्हें आर्थिक मदद करके उन्हें कर्जदार बना दिया जाए और उन देशों को हिंदुस्थान से तोड़ा जाए। इसके लिए चीन उन्हें रास्ते से लेकर मूलभूत सुविधाएं देने तक और बंदरगाह बनाने से लेकर सैन्य सहायता तक भी देने को तैयार है। यह खतरा भांपकर ही सेनाप्रमुख ने पड़ोसी देशों को चीन से सावधान रहने का संदेश दिया है। चीन हमेशा इसे लेकर सतर्क रहता है कि विदेशी उद्योग ही नहीं कोई चींटी भी वहां प्रवेश न कर पाए। जमीन की सीमा हो या सागर की सरहद, सभी ओर चीन दादागीरी करता आया है। गत १०-२० वर्षों में चीन ने कुछ अलग प्रकार का काम शुरू किया है जैसे अपने देश की ‘बंद मुट्ठी’ दुनिया के सामने नहीं लाना, हर क्षेत्र में गुप्तता बरतना और गरीब पड़ोसी देशों में घुसकर विकास का नाम लेकर उन्हें आर्थिक मदद देते हुए वहां अपनी बस्तियां बसाना। हालांकि कोई परियोजना शुरू करने या विकास कार्य के लिए दी जानेवाली आर्थिक मदद आखिरकार कर्ज स्वरूप ही होती है और उसके भारी ब्याज के नीचे दबकर मदद लेनेवाले राष्ट्र आर्थिक दृष्टि से कंगाल हो जाते हैं। फिर चीन की गुलामी करने के अलावा उनके समक्ष कोई विकल्प नहीं बचता। जनरल बिपिन रावत यही बताना चाहते हैं। ‘बिमस्टेक’ अर्थात बंगाल की खाड़ी में पड़ोसी देशों में आतंकवाद विरोधी लड़ाई में परस्पर सहकार्य और समन्वय बढ़े, यही पुणे में हुए संयुक्त सैन्य युद्धाभ्यास का उद्देश्य था। इससे चीन को जो ‘संदेश’ मिलना था वो बराबर पहुंच गया। मुफ्त में कुछ नहीं मिलता और चीन जैसा देश बिना स्वार्थ के दमड़ी भी खर्च नहीं करता, यह सच है। पड़ोसी देशों के मन में यह बात डालना और वास्तविकता का आईना दिखाकर उन्हें चीन की मृग मरीचिका के पीछे दौड़ने से रोकने का काम आज तक की सरकारों को करना चाहिए था। आखिरकार, हिंदुस्थान के सेनाप्रमुख को यह कर्तव्य निभाना पड़ा। चीन जैसा देश किसी को कुछ भी मुफ्त में नहीं देगा, इसका अनुभव पाकिस्तान और श्रीलंका को मिल चुका है। पाकिस्तान आज पूरी तरह चीन के कर्ज और उपकारों तले दबा है। अमेरिका द्वारा टुकड़े फेंकना बंद कर दिए जाने से पाकिस्तान अकेला पड़ गया है। इसलिए अब पाकिस्तान पूरी तरह से चीन से मिलनेवाली मदद पर निर्भर है। पाकिस्तान के ‘इकोनॉमिक कॉरिडोर’ पर चीन ६० अरब डॉलर खर्च कर रहा है। इस परियोजना के अनुसार एक तरफ कर्ज की किस्त के चलते पाकिस्तान की कमर टूट गई है और दूसरी तरफ चीन से आनेवाली वस्तुओं के भारी आयात के कारण पाकिस्तान का विदेशी चलन प्रभावित हुआ है और तिजोरी खाली हो गई है। पाकिस्तान में पैर पैâलाने के बाद कांइयां चीन ने हिंदुस्थान को हर तरफ से घेरने का प्रयास शुरू कर दिया है। चीन की रणनीति है कि श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार आदि देशों में पाकिस्तान जैसा प्रयोग कर उन्हें कमजोर करना और कर्ज के बोझ तले दबाकर उन्हें गुलाम बनाना। सेनाप्रमुख रावत ने जो सही है वही कहा। मुफ्त में कुछ नहीं मिलता। चीन से तो बिल्कुल नहीं। पड़ोसी देशों को कम-से-कम अब तो चीन की धूर्तता का दांव-पेंच समझना चाहिए!