सोमवार १६ अप्रैल २०१८ से रविवार २२ अप्रैल, वैशाख मास शक १९४०, विक्रम संवत २०७५

सोमवार, १६ अप्रैल- वैशाख मास कृष्ण पक्ष की पूर्णिमा तिथि दिन में ७.११ तक, सोमवती अमावस्या।
मंगलवार, १७ अप्रैल- वैशाख मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि प्रात: ६.११ तक।
बुधवार, १८ अप्रैल- वैशाख मास शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि रात्रि ३.०३ तक, अक्षय तृतीया, श्री परशुराम जयंती, समुद्र स्नान।
गुरुवार, १९ अप्रैल- वैशाख मास शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि दिन में १ बजे से रात्रि १ बजे तक वैनायकी श्री गणेश चतुर्थी व्रत।
शुक्रवार, २० अप्रैल- वैशाख मास शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि रात्रि १०.४५ तक, आज जगतगुरु शंकराचार्य जयंती है।
शनिवार, २१ अप्रैल- वैशाख मास शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि रात्रि ८.२३ तक, श्री रामानुजाचार्य जयंती, चंदन षष्ठी (बंगाल), राष्ट्रीय वैशाख मास।
रविवार, २२ अप्रैल- वैशाख मास शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि शाम ५.५५ तक, भद्रा शाम ५.५५ से रात्रि ४.४३ तक, गंगा सप्तमी, भानु सप्तमी, श्री गंगा उत्पत्ति।

अक्षय फल देती है अक्षय तृतीया
बुधवार अक्षय तृतीया
तृतीया तिथि सूर्योदय पूर्व से लेकर रात्रि में ३.०३ बजे तक रहेगी। अक्षय तृतीया का पर्व वसंत और ग्रीष्म के संधिकाल का महोत्सव है। वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाया जानेवाला व्रत-पर्व लोक में बहुश्रुत एवं मान्य है। विष्णु धर्मसूत्र, मत्स्य पुराण, नारद पुराण तथा भविष्य पुराण में इसका विस्तृत उल्लेख किया गया है तथा इसकी कई कथाएं प्रचलित हैं। सनातन धर्मी जन गृहस्थजन इसे बड़े उत्साह से मनाते हैं। अक्षय तृतीया को दिए गए दान और किए गए स्नान, जप, हवन आदि कर्मों का शुभ और अनंत फल मिलता है। भविष्य पुराण के अनुसार सभी कर्मों का फल अक्षय हो जाता है, इसलिए इसका नाम अक्षय पड़ा है।
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया या आखातीज कहते हैं। अक्षय का शाब्दिक अर्थ है जिसका कभी क्षय न हो अर्थात जो स्थाई बना रहे। स्थाई वहीं रह सकता जो सर्वदा सत्य है। यह बातें निश्चित रूप से कही जा सकती हैं कि सत्य केवल परमात्मा ही है जो अक्षय, अखंड और व्यापक है। यह अक्षय तृतीया तिथि ईश्वर तिथि है। यह अक्षय तिथि परशुराम जी का जन्मदिन होने के कारण परशुराम तिथि भी कही जाती है। परशुराम जी की गिनती महात्माओं में की जाती है। अत: यह तिथि चिरंजीवी तिथि भी कहलाती है। चारों युगों सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग में से त्रेता युग का आरंभ इसी आखातीज से हुआ है। त्रेतायुग का आरंभ अक्षय तृतीया को हुआ है जिससे इस तिथि को युग की आरंभ की तिथि ‘युगादितिथि’ भी कहते हैं।
अक्षय तृतीया को चारों धामों में से उल्लेखनीय एक धाम भगवान श्रीबद्रीनारायण के पट खुलते हैं। दर्शनार्थियों एवं भक्तों की अपार भीड़ रहती है। भक्तों के द्वारा इस दिन किए हुए पुण्य कार्य, त्याग, दान-दक्षिणा, होम-हवन, गंगा स्नान आदि कार्य अक्षय की गिनती में आ जाते हैं। भगवान भक्तों का प्रसाद प्रेम से ग्रहण करते हैं।
अक्षय तृतीया को वृंदावन में श्री बिहारी जी के चरणों के दर्शन वर्ष में एक बार होते हैं। देश के कोने-कोने से श्रद्धालु भक्त चरण दर्शन के लिए वृंदावन पधारते हैं। आत्मविश्लेषण और आत्मनिरीक्षण का यह दिन हमें स्वयं का मंथन करने के लिए, आत्मानुशासन एवं अवलोकन की प्रेरणा देनेवाला है। यह दिन ‘निज मनु मुकुरु सुधारि’ का दिन है। क्षय के कार्यों के स्थान पर अक्षय कार्य करने का दिन है। अक्षय तृतीया का दिन सामाजिक पर्व का दिन है। इस दिन कोई दूसरा मुहूर्त न देखकर स्वयं सिद्ध अभिजीत शुभ मुहूर्त के कारण विवाह उत्सव आदि मांगलिक कार्य संपन्न किए जाते हैं। गीता स्वयं एक अक्षय, अमर निधि ग्रंथ है जिसका पठन-पाठन, मनन एवं स्वाध्याय करके हम जीवन की पूर्णता को पा सकते हैं। जीवन की सार्थकता को समझ सकते हैं और अक्षय तत्व को प्राप्त कर सकते हैं। अक्षय के समान हमारा संकल्प दृढ़, श्रद्धापूर्ण एवं हमारी निष्ठा अटूट होनी चाहिए। तभी हमें व्रत-उपवास का समग्र आध्यात्मिक फल प्राप्त हो सकता है। शास्त्र में उल्लेखित है कि आज के दिन स्वर्ण की खरीदारी भी करनी चाहिए। धन योग बनता है। धन-संपदा में वृद्धि का योग भी बनता है। आज के दिन जो भी कार्य मनुष्य करता है, वह अक्षय हो जाता है। इसलिए धार्मिक एवं शुभ कार्य आज के दिन जरूर करना चाहिए। मरणोपरांत व्यक्ति जीवन-मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर वैकुंठ लोक को प्राप्त कर लेता है।
परशुराम जयंती-भगवान परशुराम स्वयं भगवान विष्णु के अंशावतार हैं। इनकी गणना दशावतारों में होती है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में रात्रि के प्रथम प्रहर में उच्च के ग्रहों से युक्त मिथुन राशि पर राहु के स्थित रहते माता रेणुका के गर्भ से भगवान परशुराम का प्रादुर्भाव हुआ था। इस तिथि को प्रदोष व्यापिनी रूप में ग्रहण करना चाहिए क्योंकि भगवान परशुराम का प्राकट्य काल प्रदोष काल ही है।
भगवान परशुराम महर्षि जमदग्नि के पुत्र थे। पुत्रोत्पत्ति के निमित्त इनकी माता तथा विश्वामित्र जी की माता को प्रसाद मिला था जो देव शास्त्र द्वारा आपस में बदल गया था। इससे रेणुका का पुत्र परशुराम जी ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय स्वभाव के थे जबकि विश्वामित्र जी क्षत्रिय कुल में उत्पन्न होकर भी ब्रह्मर्षि हो गए। जिस समय इनका अवतार हुआ था उस समय पृथ्वी पर क्षत्रिय राजाओं का बाहुल्य हो गया था। उन्हीं में से एक राजा ने उनके पिता जमदग्नि का वध कर दिया था, जिससे क्रुद्ध होकर इन्होंने २१ बार दुष्टों राजाओं से पृथ्वी को मुक्त किया। भगवान शिव के दिए हुए परशु अर्थात फरसे को धारण करने के कारण इनका नाम परशुराम पड़ा। आज के दिन व्रती नित्य- कर्म से निवृत्त हो प्रात: स्नान करके सूर्यास्त तक मौन रहे और स्नान करके भगवान परशुराम की मूर्ति का षोडशोपचार पूजन करें तथा रात्रि जागरण कर इस व्रत में श्री राम-मंत्र का जप करना सर्वश्रेष्ठ होता है। ऐसा करने से पुण्य का भागी बना जा सकता है