" /> सौ घोड़े – पांच सौ पहियोंवाला रथ

सौ घोड़े – पांच सौ पहियोंवाला रथ

कोरोना संकट के दौर में देश के उद्योग मंत्री निश्चित तौर पर क्या कर रहे हैं इसका तो पता नहीं है लेकिन महाराष्ट्र के उद्योग मंत्री सुभाष देसाई ने उद्योग, व्यापार और रोजगार वृद्धि के लिए ‘ोस कदम बढ़ा दिए हैं। इसके परिणाम जल्द ही दिखने लगेंगे, ऐसा मानने में कोई हर्ज नहीं है। दुनिया भर में मंदी छाई है, ऐसा ही महाराष्ट्र में भी है परंतु इससे हताश होकर बै’ना व्यर्थ है। हाथ-पांव चलाने होंगे। श्री राहुल गांधी ने दो दिन पहले महाराष्ट्र के संदर्भ में अपने विचार व्यक्त किए थे कि महाराष्ट्र आर्थिक गतिविधियों का केंद्र है और औद्योगिक राज्य है इसलिए महाराष्ट्र को खड़ा करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा अधिक मदद की आवश्यकता है। राज्य के उद्योग मंत्री सुभाष देसाई ने प्रमुख उद्योगपतियों का एक वेबीनार आयोजित किया। इसमें दोनों पक्षों के बीच चर्चा हुई। चर्चा में निराशा के चिन्ह बिल्कुल भी नहीं थे, यह महत्वपूर्ण है। उद्योगपतियों को उनके कारखाने, व्यवसाय शुरू करने हैं। उन्हें एक बार उड़ान भरनी है। कुछ दिक्कतें हैं, जो सरकार को हल करनी होंगी। विगत ३ महीनों से कम-से-कम १० से १५ लाख लोग रोजगार गंवा चुके हैं। कपड़ा उद्योग, निर्माण कार्य, औद्योगिक कंपनियां, होटल उद्योग, पर्यटन, परिवहन, मनोरंजन, मॉल्स, सेवा उद्योग ‘प हो गए हैं। इन क्षेत्रों में काम करनेवाले लाखों मजदूर वर्ग प्रवासी मजदूर होने के कारण कोरोना के डर से वे अपने राज्य लौट गए। वह कम-से-कम साल दो साल तो लौटकर नहीं आएगा। ऐसे समय में यह तमाम काम भूमि पुत्र स्वीकार कर लेंगे तो उनकी मेहनत से राज्य के उद्योग तथा वित्त चक्र को गति मिल जाएगी। प्रवासी मजदूर चले गए। उनकी खाली जगहों पर भूमिपुत्र को नियुक्त करो ऐसा सुझाव उद्योग मंत्री देसाई ने उद्योगपतियों को दिया लेकिन यह सब काम करने के लिए हमारे भूमिपुत्र तैयार हैं क्या? उन्हें मानसिक रूप से इसके लिए तैयार करना होगा। यह तमाम काम बहुत ज्यादा कार्यकुशलता वाले नहीं भी होंगे लेकिन राष्ट्र निर्माण में इन मजदूरों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। मजदूर पसीना बहाते हैं इसलिए कारखाने, इमारतें, सड़कें, पुल आदि तैयार होते हैं। महाराष्ट्र से कम-से-कम २० लाख मजदूर बाहर चले गए। भिवंडी इचलकरंजी यह एक तरह से हिंदुस्तान के मेनचेस्टर हैं, वहां कपड़ा उद्योग का अलग स्थान है। लूमों में कपास की कताई करनेवाला मजदूर प्रवासी ही था। महाराष्ट्र के विदर्भ में कपास का उत्पादन अच्छा होता है तथा कोरोना संकट के कारण महाराष्ट्र में कपड़ा उद्योग के अच्छे दिन आ सकते हैं। फिलहाल यूरोप सहित कई देशों में कोरोना ने जो तबाही मचाई है, उसके कारण वहां एक बार इस्तेमाल किए गए वस्त्र दोबारा इस्तेमाल नहीं किए जा रहे हैं। यूरोप और अमेरिका के अस्पतालों में चादरों, परदों, तकिए के खोल, तौलिए, दास्ताने, मरीजों के कपड़े आदि की भारी किल्लत निर्माण हो गई है। इन तमाम देशों ने राज्य की बड़ी कपड़ा मिलों को भारी आर्डर दिए हैं। मुंबई डाइंग, मफत लाल, टाटा, सियाराम आदि के ब्रांड बड़े हैं लेकिन इचलकरंजी भिवंडी जैसे कपड़ा उद्योग को भी इस सबका लाभ मिल सकता है। महाराष्ट्र के बड़े सरकारी अस्पतालों में भी इन सभी चीजों की आपूर्ति करनी होगी। कपड़ों के मास्क की भारी मांग है। मुंबई की कपड़ा मिलें ३५ साल पहले उनके मालिकों द्वारा बंद कर दी गर्इं। उन जगहों पर अब मॉल्स आदि खड़े हो गए हैं। यह मॉल्स कोरोना के कारण बंद हो गए हैं और कोरोना के कारण कपड़ों की मांग बढ़ गई है। परंतु मिले बंद हैं! इसे एक अजीबोगरीब संयोग मानना होगा। महाराष्ट्र में मुंबई, ‘ाणे, पुणे, नासिक, नागपुर जैसे शहरों में निर्माण कार्य व्यवसाय बड़े स्तर पर चलता है। क्षेत्र से सात-आ’ लाख मजदूर बाहर चले गए। क्षेत्र में बड़े पैमाने पर आर्थिक व्यवहार होता है और रोजगार का निर्माण होता है। निर्माण कार्य व्यवसाय से देश की विकास दर में अर्थात जीडीपी में भारी योगदान मिलता है। शरद पवार ने अभी केंद्र सरकार को एक सुझाव दिया है कि निर्माण कार्य व्यवसाय को संकट से उबारने के लिए सहूलियत दें। उनके कर्ज का पुनर्ग’न करें। उनके लिए निधि का प्रबंध करें तथा कुछ प्रमाण में ब्याज माफ करें, ऐसी मांग श्री पवार ने की है। अब उद्योगपतियों को सहारा दिए बिना वे खड़े नहीं हो सकते हैं। ऐसी अवस्था सिर्फ निर्माण कार्य व्यवसायियों की नहीं है, बल्कि कई व्यवसाय ऐसे ही संकटों से गुजर रहे हैं। धारावी जैसे स्थान पर महाराष्ट्र का सबसे बड़ा ‘चर्म उद्योग’ चलता है। चमड़े की वस्तुएं वहां से निर्यात की जाती हैं और घर-घर में इसके कारीगर काम करते हैं। महाराष्ट्र में लॉकडाउन खत्म हो भी गया तो धारावी का चर्म उद्योग खड़ा होगा क्या? होटल रेस्टोरेंट का ऐसा ही हाल है। महाराष्ट्र के पांच सितारा होटल आज ‘ंडे पड़े हैं। स्वाइन फ्लू का संकट दुनियाभर में कहर ढा रहा था, उस दौर में भी होटल व्यवसाय इस तरह से बंद नहीं हुआ था। इस क्षेत्र में बड़ा निवेश पहले ही कर दिया गया है, उन्हें सांत्वना देनी होगी। चीन से उद्योग बोरिया-बिस्तर समेटकर महाराष्ट्र में आएंगे यह सोच अच्छी है लेकिन महाराष्ट्र में स्थापित व जमे हुए उद्योग बोरिया-बिस्तर समेटकर बाहर न चले जाएं इसके लिए भी सतर्क रहना होगा। वित्त नीति व टर्नओवर वाले कई छोटे-मोटे व्यवसाय हैं। टाटा, बिरला, बजाज, महिंद्रा, अजीम प्रेमजी इतने तक ही यह सीमित नहीं है। वडापाव बेचनेवाले ‘ेलों की अपनी एक अलग अर्थ नीति है। वह भी ‘प हो गई है। मंत्रालय के सामने फुटपाथ पर खाने-पीने के सामान बेचनेवाले भी लॉकडाउन के कारण भुखमरी का संकट झेल रहे हैं। अखबार बेचनेवाले बच्चे अभी तक घर से बाहर नहीं निकले हैं। महाराष्ट्र के उद्योग मंत्री ने वित्त चक्र को गति देने के लिए कदम उ’ाए हैं। उद्योग का रथ दो-चार घोड़ों वाला नहीं है। १०० घोड़े और ५०० पहियों वाला यह रथ चल रहा था इसलिए महाराष्ट्र मजबूत बुनियाद के साथ खड़ा हो सका। वह अब कोरोना के कारण डगमगाने लगा है। लेकिन इसे एक बार फिर स्थिर करने का साहस दिखाना होगा।